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जानिए आख़िर क्यों भारत और रूस में होने जा रहे एस-400 समझौते से ‘नाराज़’ है अमेरिका?

Wednesday - October 3, 2018 10:30 am , Category : WTN HINDI
एस-400 समझौते से ‘खफ़ा’ अमेरिका भारत पर लगा सकता है ‘प्रतिबंध’
एस-400 समझौते से ‘खफ़ा’ अमेरिका भारत पर लगा सकता है ‘प्रतिबंध’

भारत और रूस के बीच एस-400 के समझौते से मिली अमेरिका के ‘प्रभुत्व’ को चुनौती

OCT 03 (WTN) – राफेल फाइटर जेट खरीदी पर मोदी सरकार पर लगे धांधली के आरोपों के बीच, भारत अपनी सामरिक क्षमता बढ़ने के लिए इसी सप्ताह रूस के साथ एस-400 मिसाइल के लिए एक अहम समझौते पर हस्ताक्षर करने जा रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह वही समझौता है जिसे लेकर अमेरिका भारत पर प्रतिबंध तक लगाने की धमकी दे चुका है।
 
कल यानि चार अक्टूबर को रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन भारत आ रहे हैं। इस दौरान पुतिन भारत को एस-400 एअर डिफेंस सिस्टम बेचने की इस डील को अंतिम रूप देंगे। मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़ भारत और रुस के बीच यह सैन्य समझौता क़रीब पांच अरब डॉलर का है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत काफ़ी लम्बे समय से एअर डिफेंस मिसाइल सिस्टम ख़रीदने की योजना बना रहा है। भारत और रूस के बीच पिछले कई महीनों से इस एअर डिफेंस सिस्टम को लेकर बातचीत चल रही है। पिछले साल 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति के बीच इसी एअर डिफेंस सिस्टम को लेकर बात हुई थी।
 
इधर, भारत ने वायु सेना के लिए रूस से एस-400 ट्रिम्फ वायु रक्षा मिसाइल प्रणाली की खरीदी के लिए क़ीमत सम्बन्धी बातचीत मई महीने में ही पूरी कर ली थी। उसी वक़्त यह कहा गया था कि इसकी घोषणा अक्टूबर के महीने में की जा सकती है। कहा जाता है कि यदि एस-400 सिस्टम भारतीय वायुसेना को मिल गया तो चीन और पाकिस्तान जैसे देशों से सैन्य क्षमता के मामले में भारत काफ़ी आगे निकल जाएगा।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अमेरिका ने क्रीमिया पर कब्ज़े और साल 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में कथित दख़ल के लिए सख़्त CAATSA क़ानून के तहत रूस के ख़िलाफ़ सैन्य प्रतिबंध लगा रखा है। CAATSA क़ानून के तहत डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन को रूस के रक्षा या खुफिया प्रतिष्ठान के साथ महत्वपूर्ण लेन-देन में संलिप्त देश और संस्था को दण्डित करने का अधिकार मिला हुआ है।
 
कहा जा रहा है कि भारत और रूस के बीच होने जा रहे इस समझौते को लेकर अमेरिका को चिंता इसलिए है क्योंकि उसे लगता है कि एस-400 का इस्तेमाल अमेरिकी फाइटर जेट्स की स्टील्थ (गुप्त) क्षमताओं को टेस्ट करने के लिए किया जा सकता है। अमेरिका को चिंता इस बात को लेकर भी है कि इस सिस्टम से भारत को अमेरिकी जेट्स का डेटा मिल सकता है और यह डेटा दुश्मन देश को लीक किया जा सकता है।
 
इतना ही नहीं, जानकारी के मुताबिक़ एस-400 सिस्टम का इस्तेमाल न सिर्फ अमेरिका के एफ़-35 से जुड़े रेडार ट्रैक्स की पहचान करने में किया जा सकता है, बल्कि इससे एफ़-35 के कॉन्फिगरेशन का भी बहुत हद तक पता लगाया जा सकता है। जानकारों के मुताबिक़ एस-400 सिस्टम के रेडार एफ़-35 को डिटेक्ट और ट्रैक कर सकते हैं।
 
लेकिन भारत जैसे शांतिप्रिय और ज़िम्मेदार देश के बारे में अमेरिकी की चिंता बेवज़ह है। भारत का इतिहास कभी भी ऐसा नहीं रहा है जो एक देश की डिफेंस टेक्नालॉजी को दूसरे देश को ट्रांसफ़र करता हो। अमेरिका ही नहीं दुनिया का कोई भी देश भारत पर ऐसे आरोप नहीं लगा सकता है। अमेरिका खुद जानता है कि वो पिछले 15 सालों से भारत को रक्षा उपकरण बेच रहा है और कोई भी तकनीक किसी दूसरे देश तक नहीं पहुंची है।
 
दरअसल मामला कुछ और ही है, जानकारों के मुताबिक़ अमेरिका की चिंता इस बात को लेकर ज़्यादा है कि भारत ही नहीं, कई और देश एस-400 सिस्टम को खरीदने की इच्छा ज़ाहिर कर रहे हैं। ऐसे में साफ़ है कि अमेरिका का ऐंटी-मिसाइल डिफेंस सिस्टम्स अब धीरे-धीरे दुनिया के सैन्य बाज़ार में अपनी वेल्यू खोता जा रहा है। कहा जाता है कि एस-400 की तुलना में अमेरिकी सिस्टम कमज़ोर हैं। अमेरिका एक व्यापारी देश है जहां उसका फ़ायदा होता है उसे वही सही लगता है। अब देखना होगा कि यदि भारत और रूस के बीच एस-400 का सौदा होता है तो अमेरिका का क्या रुख़ रहता है।
 
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