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भारत और ईरान के बीच हो सकता है ‘रुपये’ पर आधारित कच्चे तेल का व्यापार

Saturday - October 6, 2018 12:46 pm , Category : WTN HINDI
भारतीय रुपये में तेल व्यापार के लिए ईरान से हो रही ‘चर्चा’
भारतीय रुपये में तेल व्यापार के लिए ईरान से हो रही ‘चर्चा’

अमेरिकी प्रतिबंध के बावज़ूद भारतीय तेल कम्पनियों ने किया ईरान के साथ कच्चे तेल का ‘अनुबंध’

OCT 06 (WTN) – जैसा कि आप जानते हैं कि चार नवम्बर से ईरान पर अमेरिकी के ‘बाक़ी बचे’ प्रतिबंध लागू होने जा रहे हैं। ऐसे में हर ओर यही चर्चा है कि ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध लगने के बाद, क्या भारत ईरान से कच्चे तेल का आयात करेगा? इन्ही चर्चाओं के बीच भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कम्पनियों ने ईरान से 12.5 लाख टन कच्चे तेल के आयात के लिये अनुबंध किया है। इस अनुबंध की सबसे ख़ास बात यह है कि तेल का यह व्यापार डॉलर की जगह ‘रुपये’ में होगा।
 
मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, इण्डियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) और मैंगलोर रिफ़ाइनरी एण्ड पेट्रोरसायन लिमिटेड ने नवम्बर में ईरान से आयात के लिये 12.5 लाख टन कच्चे तेल के लिये अनुबंध किया किया है। इण्डियन ऑयल कॉरपोरेशन ईरान से जो तेल आयात कर रहा है वह सामान्य ही है। आईओसी ने साल 2018-19 में ईरान से 90 लाख टन कच्चे तेल के आयात की योजना बनाई है।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ईरान पर कुछ अमेरिकी प्रतिबंध छह अगस्त से लागू हो गए हैं, जबकि तेहरान के तेल एवं बैंकिंग सेक्टर से जुड़े प्रतिबंध चार नवम्बर से प्रभावी होंगे। इस बीच कहा जा रहा है कि भारत और ईरान चार नवम्बर के बाद कच्चे तेल का व्यापार रुपये में करने पर ‘चर्चा’ कर रहे हैं। पहले भी ईरान जब भारत को कच्चा तेल बेचता था तो उनसे कई बार रुपये में ही भुगतान लिया था और उन रुपयों का उपयोग वो भारत से सामान खरीदने में करता था। अमेरिकी बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली से ईरान के बहिष्कार के बाद भारतीय तेल कम्पनियां ईरान को भुगतान के लिए यूको बैंक या आईडीबीआई बैंक का उपयोग कर सकती हैं।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत की ईरान से क़रीब 2.5 करोड़ टन कच्चे तेल के आयात की ‘योजना’ है, जो 2017-18 में आयातित 2.26 करोड़ टन से ज़्यादा है। हालांकि वास्तविक आयात कम हो सकता है क्योंकि रिलायंस इण्डस्ट्रीज जैसी कम्पनियों ईरान से पूरी तरह से तेल खरीदी बंद कर चुकी हैं तो वहीं अन्य तेल कम्पनियां भी पाबंदी को देखते हुए खरीदी कम कर सकती हैं।
 
वैसे तो अमेरिका एक ‘विशुद्ध व्यापारिक’ देश है, लेकिन वो आज के समय में भारत की ‘महत्ता’ जानता है और धीरे-धीरे शक्तिशाली होते जा रहे चीन को ‘ध्यान’ में रखते हुए एशिया में ‘शक्ति संतुलन’ के लिए अमेरिका भारत को ‘नाराज़’ भी नहीं करना चाहता है। इस सबके बीच अमेरिका भारत के लिए तेल की ‘वैकल्पिक व्यवस्था’ की कोशिश कर रहा है ताकि भारत की अर्थव्यवस्था पर इसका खराब असर ना पड़े। अमेरिकी अब इस स्थिति में नहीं है कि वो भारत पर प्रतिबंध लगा सके, क्योंकि जिस तरह से भारत और रूस के बीच एस-400 डिफेंस सिस्टम का सौदा हुआ है उससे अमेरिका को डर है कि कहीं उसने भारत पर प्रतिबंध लगाया तो इस स्थिति का ‘फ़ायदा’ रूस ना उठा ले।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस साल मई में ईरान के साथ 2015 के परमाणु करार से पीछे हटने की घोषणा की थी। इसके साथ ही अमेरिका ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने की बात भी कही थी। अमेरिका का कहना है कि जो भी देश ईरान के साथ व्यापार करेगा, उसे अमेरिकी बैंकिंग प्रणाली और वित्तीय प्रणाली से बहिष्कृत कर दिया जाएगा। अमेरिका की ‘इच्छा’ है और वो ‘उम्मीद’ करता है कि भारत समेत सभी देश ईरान से तेल का आयात ‘शून्य’ तक ले आएंगे।
 
भारत को चूंकि कच्चे तेल की ज़रूरत है, ऐसे में भारत यदि ईरान के साथ डॉलर की जगह रूपये में व्यापार करता है तो इससे भारतीय डॉलर पर आधरित विदेश व्यापार में भारत को ‘काफ़ी राहत’ मिलेगी। भारत, ईरान के साथ पहले ‘अनाज के बदले तेल’ जैसा क़रार कर चुका है जिसमें भारत ने ईरान को कच्चे तेल के बदले अनाज का निर्यात किया था। अब देखना होगा कि अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव से अलग भारत कितने ‘स्वतंत्र’ और ‘साहसी’ निर्णय ले पाता है।
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