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विश्लेषण: मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की ‘नो गठबंधन’ की रणनीति

Friday - October 12, 2018 10:22 am , Category : WTN HINDI
कांग्रेस के बड़े नेताओं की साख दांव पर
कांग्रेस के बड़े नेताओं की साख दांव पर

बड़ा सवाल: क्या कांग्रेस ने रणनीति के तहत नहीं किया किसी भी पार्टी से गठबंधन ?

OCT 12 (WTN) – मध्य प्रदेश में लगभग साफ़ हो गया है कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अब किसी भी पार्टी से गठबंधन नहीं करेगी और अपने दम पर ही भाजपा को टक्कर देगी। पहले बसपा फ़िर सपा और उसके बाद गोण्डवाना गणतंत्र पार्टी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन को ना कह दिया है। तीनों ही पार्टियों ने गठबंधन ना होने के पीछे कांग्रेस को दोषी ठहराया है। लेकिन इस सबके बीच बड़ा सवाल यही है कि क्या गठबंधन ना करके कांग्रेस ने बहुत बड़ी ग़लती कर दी है क्योंकि यदि बसपा, सपा और गोण्डवाना गणतंत्र पार्टी साथ रहते तो भाजपा विरोधी वोटों का ध्रुवीकरण रोका जा सकता था, या फ़िर गठबंधन ना करना कांग्रेस की एक बहुत बड़ी रणनीति है।
 
सबसे पहले बात करते हैं बसपा की। पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा ने क़रीब 6 प्रतिशत वोट हासिल किये थे और चार सीटों पर जीत दर्ज की थी वहीं 11 सीटों पर वो दूसरे स्थान पर रही थी। इस बार लग रहा था कि भाजपा को हराने के लिए बसपा और कांग्रेस साथ आ सकते हैं। लेकिन ऐन मौके पर मायावती ने साफ़ कर दिया कि बसपा कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करेगी। मायावती ने गठबंधन ना होने के पीछे दिग्विजय सिंह समेत कुछ कांग्रेसी नेताओं पर आरोप लगाया था कि इनके कारण ही बसपा और कांग्रेस का गठबंधन नहीं हो पाया। इधर मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ का कहना है कि मायावती गठबंधन में क़रीब 50 सीटों की मांग कर रहीं थीं जो कि तार्किक नहीं था इसलिए गठबंधन नहीं हुआ।
 
दरअसल बसपा का जनाधार ग्वालियर-चम्बल क्षेत्र में ज़्यादा है और ये इलाका ज्योतिरादित्य सिंधिया का गढ़ माना जाता है। हो सकता है कि गठबंधन ना होने के पीछे सिंधिया की कोई रणनीति हो, क्योंकि यदि बसपा से गठबंधन होता तो बसपा इसे इलाके से सबसे ज़्यादा सीटें मांगती और यदि ऐसा होता तो इसमें सिंधिया कमज़ोर पड़ जाते।
  
इधर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी साफ़ कर दिया है कि कांग्रेस के लचीले रुख और देरी के कारण सपा मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करेगी। अखिलेश यादव ने तो छतरपुर में यह तक कह दिया था कि जिन भी कांग्रेसी नेताओं को कांग्रेस से टिकट नहीं मिल रहा है वे समाजवादी पार्टी में आएं, सपा उन्हें टिकट देगी। कहा जा रहा है कि सपा के साथ गठबंधन करने के मूड में कांग्रेस पहले से ही नहीं थी। यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-सपा के गठबंधन को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा था और मध्य प्रदेश में सपा का कोई जनाधार भी नहीं है ऐसे में कांग्रेस शुरू से ही सपा के साथ किसी भी तरह के गठबंधन के लिए तैयार नहीं दिख रही थी।
 
महाकौशल क्षेत्र में अच्छा जनाधार रखने वाली गोण्डवाना गणतंत्र पार्टी ने भी कांग्रेस के साथ गठबंधन ना होने के पीछे कांग्रेस को ही दोषी बताया है। पार्टी का कहना है कि क़रीब दो महीने तक कांग्रेस से गठबंधन के लिए चर्चा हुई लेकिन कांग्रेस ने किसी भी तरह का कोई भी सकारात्मक रूख नहीं दिखाया जिसके बाद गोण्डवाना गणतंत्र पार्टी ने अपने दम पर ही चुनाव लड़ने का फ़ैसला लिया है।
 
राजनीति के जानकारों का कहना है कि कांग्रेस दरअसल चाहती ही नहीं थी कि राज्य में वो किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़े। पार्टी के बड़े नेताओं का मानना था कि यदि कांग्रेस ने बसपा और सपा जैसी पार्टियों के साथ गठबंधन कर लिया तो जनता के बीच संदेश जाएगा कि कांग्रेस कमज़ोर हो गई है और भाजपा को अपने दम पर नहीं हरा सकती है, ऐसे में कांग्रेस के बड़े नेताओं ने किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन करने के बजाय अकेले ही चुनाव लड़ने की ठान ली।
 
कहा यह भी जा रहा है कि कांग्रेस को इस बात का यक़ीन है कि भाजपा के ख़िलाफ़ 15 सालों की सत्ता विरोधी लहर और एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के बाद भाजपा के परम्परागत वोट बैंक की उससे नाराज़गी के कारण इस बार कांग्रेस भाजपा को पराजित कर सकती है। वहीं पार्टी का मानना है कि बसपा और सपा के साथ गठबंधन करके वो अपने ज़िलास्तर के नेताओं को नाराज़ नहीं करना चाहती है, क्योंकि गठबंधन के बाद कांग्रेस को बसपा और सपा को क़रीब 30 से 35 सीटें देना पड़ती जिसके कारण टिकट ना मिलने से ज़िलास्तर के नेता नाराज़ हो सकते थे।
 
लगता है काफ़ी सोच समझकर ही कांग्रेस ने गठबंधन नहीं करने का फ़ैसला लिया है। यदि कांग्रेस बसपा के साथ जाती तो सवर्ण और पिछड़ा वर्ग उससे नाराज़ हो सकता था। वहीं सपा का मध्य प्रदेश में इतना जनाधार नहीं है कि उससे गठबंधन करके पार्टी के छोटे नेताओं को नाराज़ किया जाए। वहीं गोण्डवाना गणतंत्र पार्टी सिर्फ़ महाकौशल क्षेत्र में ही सक्रिय है और कमलनाथ के इस इलाके में वो नहीं चाहेंगे कि छोटी सी पार्टी के साथ गठबंधन करके वे ख़ुद को कमज़ोर साबित करें। इन तमाम समीकरणों को ध्यान में रखते हुए लगता है कि कांग्रेस ने किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करने और अपने दम पर चुनाव लड़ने का रणनीतिक फ़ैसला लिया है। यानि कि कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में ‘एकला चलो रे’ की नीति अपनाई है।
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