BrahMos WORLD INDIA MADHYA PRADESH BHOPAL WTN SPECIAL Astrology GOSSIP CORNER RELIGION SPORTS BUSINESS FUN FACTS ENTERTAINMENT LIFESTYLE TRAVEL ART & LITERATURE SCIENCE & TECHNOLOGY HEALTH EDUCATION DIASPORA OPINION & INTERVIEW RECIPES DRINKS BIG MEMSAAB 2017 BUDGET 2017 FUNNY VIDEOS VIRAL ON WEB PICTURE STORIES Mahakal Ke Darshan
WTN HINDI ABOUT US PRIVACY POLICY SITEMAP CONTACT US
logo
Breaking News

किसानों की कर्ज़ माफ़ी किसानों पर ही ‘भारी’!

Monday - December 31, 2018 2:48 pm , Category : WTN HINDI
पिछले वित्तीय वर्ष में बैंकों की कृषि ऋण वृद्धि दर में आई जोरदार ‘गिरावट’
पिछले वित्तीय वर्ष में बैंकों की कृषि ऋण वृद्धि दर में आई जोरदार ‘गिरावट’

कर्ज माफ़ी के ‘साइड इफेक्ट’: पिछले वित्तीय वर्ष में 12.4 से घटकर 3.8 प्रतिशत पर आई बैंकों द्वारा दिये जाने वाले कृषि कर्ज़ की वृद्धि दर

DEC 31 (WTN) – मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में किसानों की कर्ज़ माफ़ी की घोषणा की थी, जिसके बाद कड़े मुक़ाबले में कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में भाजपा को शिकस्त दी और गठबंधन की सरकार बनाई। चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी और राज्य के तमाम कांग्रेसी नेताओं ने कहा था कि कांग्रेस यदि सत्ता में आई तो सिर्फ़ 10 दिनों के अंदर किसानों की कर्ज़ माफ़ी की जाएगी।
 
विधानसभा चुनाव के बाद कैसे तो भी कांग्रेस ने सरकार बना ली और नियमों और शर्तों के साथ किसानों की कर्ज़ माफ़ी की घोषणा की कर दी। लेकिन किसानों की कर्ज़ माफ़ी की घोषणा से किसान नाराज़ बताए जाते हैं क्योंकि उनका आरोप है कि कांग्रेस ने वादा ख़िलाफ़ी की है और किसानों की कर्ज़ माफ़ी में नियमों की शर्तें डाल दी जिससे क़रीब 90 प्रतिशत किसान वास्तविक कर्ज़ माफ़ी के दायरे से बाहर हो गया।
 
मध्य प्रदेश के अलावा छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी कांग्रेस सरकार ने कर्ज़ माफ़ी की घोषणा की है जिसके बाद पूरे देश में चर्चाओं का दौर जारी है कि क्या कर्ज़ माफ़ी ही किसानों की समस्या का एकमात्र समाधान है ? लेकिन अब भारत के केन्द्रीय बैंक यानि कि रिज़र्व बैंक ऑफ़ इण्डिया ने कर्ज़ माफ़ी के साइड इफेक्ट बताते हुए राजनीतिक पार्टियों और सरकारों को चेतावनी दी है कि यदि इसी इसी तरह से किसानों की कर्ज़माफ़ी होती रही तो आने वाले समय में बैंक किसानों को कर्ज़ देने समय सौ बार सोचंगे।
 
दरअसल RBI के आंकड़ों के मुताबिक़ वित्तीय वर्ष 2016-17 में कृषि कार्य के लिए दिये जाने वाले कर्ज़ की वृद्धि दर 12.4 प्रतिशत थी, लेकिन वित्तीय वर्ष 2017-18 में यह घटकर सिर्फ़ 3.8 प्रतिशत रह गई है। जबकि चालू वित्तीय वर्ष के पहले छह महीने में यह दर 5.8 प्रतिशत थी। कृषि कार्य के लिए दिये जाने वाले ऋण में होने वाली कमी के लिए रिज़र्व बैंक ने कृषि माफ़ी को ज़िम्मेदार ठहराया है।
 
किसानों को कर्ज़ देने में बैंकों को कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि बैंकों को तो कर्ज़ देना ही है, लेकिन काफ़ी समय से देखा जा रहा है कि किसानों की कर्ज़ माफ़ी पर राजनीतिक बहस शुरू होते ही किसान अपना कर्ज़ चुकाना बंद कर देते हैं। वहीं किसानों की ओर से कर्ज़ नहीं मिलने की आशंका के बाद बैंक भी उन्हें कर्ज देने में आनाकानी करने लगते हैं। क्योंकि बैंकों को लगता है कि कर्ज़ माफ़ी की योजना के कारण उन पर बिना वजह बोझ बढ़ता है। बैंकों को भी अपना काम चलाना होता है ऐसे में यदि किसान डिफॉल्टर होते जाएंगे तो बैंकों को एक दिन बंद करने की नौबत आ जाएगी।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया की पूर्व चेयरपर्सन अरुंधती भट्टाचार्य समेत कई अर्थशास्त्रियों ने किसानों की कर्ज़ माफ़ी की आलोचना की है और कहा है कि इससे अर्थव्यवस्था पर साइड इफेक्ट पड़ते हैं। रघुराम राजन के मुताबिक़ किसानों की कर्ज़ माफ़ी के कारण राज्य और केन्द्र की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर होता है और इसका असर भविष्य में देखने को मिलेगा।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आरबीआई के पूर्व गवर्नर राजन ने किसानों की कर्ज़ माफ़ी के बारे में कहा था, "किसानों की कर्ज़ माफ़ी का सबसे बड़ा फ़ायदा साठगांठ वालों को मिलता है। इसका फ़ायदा ग़रीबों की जगह अमीर किसानों को मिलता है। जब भी कर्ज़ माफ़ किए जाते हैं, तो देश के राजस्व को भी नुकसान होता है।"

पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने तो किसानों की कर्ज़ माफ़ी के वादे पर ही प्रतिबंध लगाने की मांग कर डाली थी। यदि अर्थशास्त्रियों की बात पर यकीन किया जाए तो किसानों की कर्ज़ माफ़ी से किसानों को ही नुकसान है क्योंकि कर्ज़ माफ़ी की घोषणा के बाद किसान बैंकों का कर्ज़ नहीं चुकाते जिसके कारण बैंक किसानों को कर्ज़ देने से तौबा कर रहे हैं। जैसा कि हमने आपको पहले बताया कि वित्तीय वर्ष 2016-17 में कृषि कार्य के लिए दिये जाने वाले कर्ज़ की वृद्धि दर 12.4 प्रतिशत थी, लेकिन वित्तीय वर्ष 2017-18 में यह घटकर सिर्फ़ 3.8 प्रतिशत रह गई।
 
आंकड़ों से साफ़ ज़ाहिर होता है कि किसानों को कर्ज़ देने में बैंकों ने कंजूसी बरतना शुरू कर दिया है क्योंकि किसान समय पर कर्ज़ नहीं चुका रहे हैं और इसका ख़ामियाज़ा बैंकों को भुगतना पड़ रहा है। यदि देश के बैंकों की अर्थव्यवस्था पटरी पर रखना है तो ज़रूरी है कि राजनीतिक दलों को किसानों की कर्ज़ माफ़ी जैसे चुनावी वायदे नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि ये वायदे जारी रहे तो किसान बैंकों का कर्ज नहीं चुकाएगा और बैंक आशंकित होकर किसानों को ही कर्ज़ नहीं देंगे जिसका सबसे बड़ा नुकसान किसानों को ही होगा।