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दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार के सामने कई ‘आर्थिक चुनौतियां’!

Thursday - May 23, 2019 10:05 am , Category : WTN HINDI
प्रधानमंत्री मोदी की ‘इच्छाशक्ति’ के दम पर आर्थिक सुधारों की ‘आस’
प्रधानमंत्री मोदी की ‘इच्छाशक्ति’ के दम पर आर्थिक सुधारों की ‘आस’

क्या अर्थव्यवस्था की गति बनाए रखने मोदी लेंगे कड़े फ़ैसले?
 
MAY 23 (WTN) – विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में लोकसभा चुनाव के अन्तिम परिणामों के बाद तय है एक बार फिर से एनडीए सरकार बनने बनने जा रही है। एनडीए सरकार से देश की जनता को काफ़ी उम्मीदें रहेंगी। जाहिर है कि जो भी सरकार बनेगी उसे चुनौतियों का सामना निश्चित तौर पर करना होगा। नई एनडीए सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने क्या-क्या चुनौतियां अर्थव्यवस्था से जुड़ी हो सकती हैं, आइये जानते हैं।
 
कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने भूमि सुधार, श्रम सुधार और विदेशी व्यापार जैसे मुद्दे सबसे ज़्यादा प्राथमिकता में रहेंगे। सबसे पहले बात करें भूमि सुधार की, तो सालों से देश में भूमि सुधार की ज़रूरत महसूस की जा रही है। कहीं पर किसी के पास ज़्यादा ज़मीन है तो कहीं पर किसी के पास कम, ऐसे में चकबंदी के जरिये या फ़िर किसी अन्य तरीक़े से भूमि सुधार पर मोदी सरकार को ध्यान देना होगा।

श्रम सुधार भी नई सरकार के लिए एक चुनौती बड़ा काम है। श्रम संगठनों और उद्योग जगत की मांग है कि श्रम सुधार में श्रमिकों के हितों के साथ-साथ उद्योगों के हितों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए, क्योंकि दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। वहीं कम होते रोज़गार के अवसरों के कारण युवाओं को नौकरी के मौक़े उपलब्ध कराना भी मोदी सरकार के सामने एक बड़ा काम रहेगा।

बात करें विदेशी व्यापार की, तो मोदी सरकार को निर्यात संवर्धन पर काफ़ी ध्यान देने की ज़रूरत है। इस क्षेत्र के जानकारों के मुताबिक़, पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया जैसे नये बाज़ारों को लक्ष्य बनाकर यहां के देशों को निर्यात के लिए टारगेट पर रखना चाहिए। वहीं विश्व बाज़ार में भारतीय उत्पादों की साख के लिए निर्यात उत्पादों की ग्रेडिंग और प्रमाणीकरण के लिये एक बेहतर प्रणाली बनाने की आवश्यकता है। वहीं भारतीय उत्पादों की बेहतरीन तरीक़े से ब्रांडिंग भी किये जाने की ज़रूरत है।

जानकारों का मानना है कि मोदी सरकार को आर्थिक सुधारों से पीछे नहीं हटना चाहिए। क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो इसका जीडीपी पर विपरित असर पड़ेगा। कहा जा रहा है कि यदि मोदी सरकार देश की अर्थव्यस्था को सुधारने के लिए कड़े फ़ैसले लेती है और उनसे पीछे नहीं हटती है, तो 2020-2025 के दौरान वर्तमान जीडीपी जो कि 7.5 प्रतिशत है, उससे 2.5 प्रतिशत की वृद्दि देखी जा सकती है। वहीं यदि कड़े फ़ैसले लेने के बजाय मोदी सरकार ने क़दम पीछे हटाए गये, तो औसत जीडीपी में 2.5 प्रतिशत की कमी भी हो सकती है।

मोदी सरकार को विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि सुधारों की गति में तेज़ी बनाए रखने से भारत की जीडीपी दो अंकों तक जाकर 10 प्रतिशत तक भी पहुंच सकती है। वहीं यदि सुधारों से क़दम पीछे हटाए, तो जीडीपी 5 प्रतिशत तक के स्तर पर आ सकती है। वैसे साफ़ है कि सुधारों के लिए और कड़े फ़ैसले लेने के लिए सरकार के पास पर्याप्त बहुमत होना चाहिये। वहीं बहुमत के साथ-साथ सुधारों के लिए पर्याप्त इच्छाशक्ति की भी ज़रूरत होती है। लेकिन जिस तरह के फ़ैसले मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में लिये हैं, उससे साफ़ ज़ाहिर है कि इच्छाशक्ति के मामले में नरेन्द्र मोदी पीछे नहीं हैं।