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क्या एक देश, एकसाथ चुनाव पर बनेगी देश में सहमति?

Wednesday - June 19, 2019 1:52 pm , Category : WTN HINDI
देश में फ़िर छिड़ी एकसाथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव की बहस
देश में फ़िर छिड़ी एकसाथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव की बहस

क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में एकसाथ हो पाएंगे लोकसभा और विधानसभा चुनाव?

JUNE 19 (WTN) – जैसा कि आप जानते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। दुनिया के इसी सबसे बड़े लोकतंत्र में काफ़ी समय से बहस हो रही है कि क्या देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एकसाथ कराना चाहिए? आख़िर यह बहस क्यों हो रही है और लोकसभा और विधानसभा चुनाव एकसाथ कराने के क्या फ़ायदे और नुकसान है, आइये इस पर एक नज़र डालते हैं।

लोकसभा और विधानसभा चुनाव एकसाथ कराने का मुद्दा एक बार फ़िर से देश में सुर्खियों में है, क्योंकि खुद प्रधानमंत्री मोदी इसका समर्थन कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी काफ़ी समय से कहते रहे हैं कि भारत जैसे विशाल विकासशील देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की ज़रूरत है, क्योंकि ऐसा करने से देश के हज़ारों करोड़ रुपयों को बचत होगी।

लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ करने के मामले पर निर्वाचन आयोग, नीति आयोग, विधि आयोग और संविधान समीक्षा आयोग बातचीत कर चुके हैं। लेकिन राजनीतिक दलों की बात करें तो भाजपा समेत कुछ ही राजनीतिक पार्टियां इसके पक्ष में हैं, तो वहीं देश के ज़्यादातर राजनीतिक दल लोकसभा और विधानसभा चुनाव एकसाथ कराने के विरोध में है।

दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी चाहते हैं कि देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एकसाथ हो जिससे संसाधनों की काफ़ी बचत होगी। जैसा कि आप जानते हैं कि भारत जैसे विशाल देश में शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव कराना अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती निर्वाचन आयोग के सामने होती है। भारत में हर साल किसी ना किसी राज्य में विधानसभा चुनाव होते ही हैं, जिसके कारण हर साल देश हमेशा ही इलेक्शन मोड पर रहता है।

ऐसा नहीं है कि भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एकसाथ पहले कभी नहीं हुए हों। आज़ादी के बाद साल 1952, 1957, 1962 और 1967 में एकसाथ लोकसभा और विधानसभा के चुनाव हो चुके हैं। लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनाव एकसाथ होने का सिलसिला तब टूट गया, जब साल 1968-69 में कुछ राज्यों की विधानसभाएं समय से पहले ही भंग हो गईं।

कुछ जानकारों का इस बारे में मत है कि आज़ादी के बाद के पहले 20 साल और अब के समय में काफ़ी अन्तर है। उस समय देश की आबादी कम थी और जनता वोटिंग के लिए ज़्यादा जाती भी नहीं थी। ऐसे में उस समय लोकसभा औऱ विधानसभा चुनाव एकसाथ होना व्यवहारिक था। लेकिन अब जबकि देश की जनसंख्या बहुत ज़्यादा बढ़ गई है, ऐसे में दोनों चुनाव एकसाथ कराना धरातल पर सम्भव नज़र नहीं आ रहा है। वहीं कुछ लोगों का तर्क है कि दोनों चुनाव एकसाथ कराने से देश को हज़ारों करोड़ों रूपयों की बचत होगी। यह सही है कि देश की आबादी बढ़ी है, लेकिन उसके साथ ही टेक्नोलॉजी और संसाधनों का भी विकास हुआ है, जिसकी सहायता से एकसाथ चुनाव कराए जा सकते हैं।
 
प्रधानमंत्री मोदी कई बार कह चुके हैं कि लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव एकसाथ कराने से बार-बार आचार संहिता नहीं लगाने पड़ेगी, जिससे नीतिगत फ़ैसले लिये जा सकेंगे। वहीं ऐसा होने से विकास कार्य भी प्रभावित नहीं होंगे। वहीं हर साल किसी ना किसी राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव के कारण देश को भारी रक़म इस पर ख़र्च करना पड़ती है, जिससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

अर्थशास्त्र के जानकारों की इस बारे में राय है कि एकसाथ चुनाव होने से कालेधन और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने में काफ़ी हद तक मदद मिलेगी, क्योंकि चुनावों के दौरान ही कालेधन का जमकर इस्तेमाल होता है। वहीं पूर्व अधिकारियों का मानना है कि एकसाथ चुनाव कराने से सरकारी कर्मचारियों और सुरक्षा बलों को बार-बार चुनावी ड्यूटी पर लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

हालांकि, एकसाथ चुनाव कराने की प्रस्तावित योजना का काफ़ी राजनीतिक दल जमकर विरोध कर रहे हैं। विरोधियों का तर्क है कि संविधान में लोकसभा और विधानसभा चुनावों को लेकर पांच साल की अवधि तय है, और संविधान में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने को लेकर कोई प्रावधान नहीं है।

जैसा कि आप जानते हैं कि केन्द्र सरकार के पास राज्य सरकारों को आर्टिकल 356 के तहत भंग करने का अधिकार है। लेकिन यदि एकसाथ चुनाव कराने के लिए इस अधिकार का कथित दुरुपयोग हुआ तो इसका जमकर विरोध हो सकता है। वहीं लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एकसाथ कराने के लिए कुछ विधानसभाओं के कार्यकाल को बढ़ाया या घटाया जाएगा, इससे राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित होगी। विरोधियों द्वारा तर्क यह भी दिया जा रहा है कि एकसाथ चुनाव होने पर राष्ट्रीय मुद्दों के सामने क्षेत्रीय मुद्दे छोटे हो जाएं या फ़िर क्षेत्रीय मुद्दों के सामने राष्ट्रीय मुद्दे बड़े हो जाएं।

विरोधियों का कहना है कि देश में लोकसभा चुनाव और हर राज्य के विधानसभा चुनाव के अलग-अलग मुद्दे रहते हैं। यदि चुनाव एकसाथ होंगे तो राष्ट्रीय मुद्दे, क्षेत्रीय मुद्दों पर हावी हो जाएंगे जिससे राज्यों को और क्षेत्रीय दलों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। 

लोकसभा और विधानसभा चुनाव एकसाथ कराने के समर्थन के पीछे कई तर्क हैं तो उसके विरोध में भी उतने ही तर्क हैं। प्रधानमंत्री मोदी चाहते हैं कि दोनों चुनाव एकसाथ हों। अब देखना होगा कि प्रधानमंत्री मोदी लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराने के मिशन में सफल हो पाते हैं कि नहीं। लेकिन जब तक सभी राजनीतिक दलों का समर्थन इस मुहिम को नहीं मिलता है, दोनों चुनाव एकसाथ कराना फिलहाल तो सम्भव नज़र नहीं आ रहा है।