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आख़िर मोदी सरकार से क्यों नाराज़ हैं डॉक्टर्स?

Friday - August 2, 2019 1:09 pm , Category : WTN HINDI
मोदी सरकार करेगी एमसीआई की जगह पर एनएमसी का गठन
मोदी सरकार करेगी एमसीआई की जगह पर एनएमसी का गठन

मेडिकल काउंसिल ऑफ इण्डिया की जगह नेशनल मेडिकल कमीशन पर ‘तक़रार’!

AUG 02 (WTN) – कहा जाता है कि डॉक्टर्स पृथ्वी पर 'ईश्वर' का अवतार होते हैं। लेकिन आजकल धरती के यही 'ईश्वर' इन दिनों मोदी सरकार से नाराज़ चल रहे हैं। डॉक्टर्स की नाराज़गी का कारण है मोदी सरकार का मेडिकल काउंसिल ऑफ इण्डिया (एमसीआई) की जगह पर नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) का गठन करना। नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) के गठन के बहुचर्चित बिल को मोदी सरकार राज्यसभा में अल्पमत में होने के बाद भी पास कराने में कामयाब रही है। इसी बिल कि विरोध में देशभर में डॉक्टर्स सड़कों पर उतर आए हैं।
 
आप सोच रहे होंगे कि आख़िर वे क्या कारण हैं जिनके कारण देशभर के डॉक्टर्स एनएमसी बिल का विरोध कर रहे हैं। वहीं क्या कारण है कि मोदी सरकार एमसीआई की जगह पर एनएमसी लेकर आई है। इन सभी सवालों के जवाब हम आपको विस्तार से देते हैं।
 
इस बिल के बारे में सरकार का तर्क है कि काफ़ी निष्कर्ष के बाद ही इस बिल को लाया गया है। दरअसल, एमसीआई की जगह पर एनएमसी को लाने की ज़रूरत इसलिए पड़ गई, क्योंकि एनएमसी यानी कि नेशनल मेडिकल कमीशन बिल तैयार करने वाले नीति आयोग को ऐतराज था कि एमसीआई में ज़्यादातर डॉक्टर्स चुनाव चाहते हैं, जिससे डॉक्टर्स की लॉबी सक्रिय रहती है। डॉक्टर्स की लॉबिंग के कारण वे अपने मूल मक़सद पर ध्यान नहीं दे पाते हैं।

सरकार का तर्क है कि एमसीआई के पास मेडिकल एजुकेशन और डॉक्टर्स की प्रैक्टिस जैसे दोनों ही बड़े काम नहीं होने चाहिए। साल 2016 में एमसीआई पर बनी स्टैडिंग कमेटी ने कहा था कि एमसीआई का सारा फोकस कॉलेजों को लाइसेंस देने पर रहता है। इसी कारण से मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई प्रभावित होती है।
 
तमाम तरह की आपत्तियों के बाद मोदी सरकार ने साल 2017 में एमसीआई को भंग कर एनएमसी के गठन की तैयारियां शुरू कर दी थीं। साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने एमसीआई की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए एक निगरानी कमेटी बनाई थी। तब निगरानी कमेटी ने स्वास्थ्य मंत्रालय को बताया था कि एमसीआई सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना कर रहा है। इस तरह के घटनाक्रमों के बाद केन्द्र सरकार ने एक अध्यादेश लाकर एमसीआई की मैनेजमेंट कमेटी को भंग कर दिया था। इसके बाद ही एमसीआई, बोर्ड ऑफ गवर्नेंस के जरिए संचालित हो रही है।
 
सरकार का दावा है कि मेडिकल क्षेत्र में सिस्टम को सुधारने के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) बिल संसद में लाया गया है। अभी तक एमसीआई के पास मेडिकल कॉलेज में एडमिशन, मेडिकल शिक्षा, डॉक्टर्स के रजिस्ट्रेशन से जुड़े काम होते थे। अब इस बिल के पास होने के बाद यह सारा काम एनएमसी के पास चला जाएगा।

लेकिन सरकार के इस कद़म से डॉक्टर्स काफ़ी नाराज़ हैं। डॉक्टर्स कई कारणों से इस बिल का विरोध कर रहे हैं। डॉक्टर्स को आपत्ति है कि नेशनल मेडिकल बिल के 32वें प्रावधान के तहत कम्युनिटी हेल्थ प्रोवाइडर्स को मरीजों को दवाइयां लिखने और इलाज का लाइसेंस मिलेगा। डॉक्टर्स का कहना है कि इससे मरीजों की जान को ख़तरा हो सकता है। नेशनल मेडिकल कमीशन बिल में एक प्रावधान यह भी है कि आयुर्वेद-होम्योपैथी डॉक्टर अब ब्रिज कोर्स करने के बाद एलोपैथिक इलाज कर पाएंगे। इस पर भी डॉक्टर्स को आपत्ति है और उनका कहना है कि इससे चिकित्सा के स्तर में गिरावट आएगी।
 
नये बिल में प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को 50 प्रतिशत सीटों की फीस तय करने का हक़ दिया गया है। इस पर डॉक्टर्स को आपत्ति है कि इससे प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा। इस बिल में यह भी प्रावधान है कि मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रैक्टिस शुरू करने से पहले डॉक्टर्स को एक टेस्ट पास करना होगा। इस टेस्ट के विरोध में डॉक्टर्स का कहना है कि इस टेस्ट में एक बार फेल होने के बाद इसे दोबारा देने का कोई भी विकल्प नहीं है।
 
डॉक्टर्स के विरोध के बीच सरकार का तर्क है कि नेशनल मेडिकल कमीशन से देश में डॉक्टर्स की कमी को पूरा किया जा सकेगा। इस बिल के आने से प्राइमरी हेल्थ वर्कर्स को 6 महीने का मेडिकल कोर्स करने के बाद प्रैक्टिस करने का लाइसेंस मिल जाएगा, जिससे वे सामान्य इलाज के लिए दवाई लिख सकेंगे। ऐसा होने से ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को राहत मिलेगी।
 
प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के बारे में सरकार का तर्क है कि 50 प्रतिशत सीटों की फीस तय करने का हक़ देने से इन मेडिकल कॉलेजों के सामने आर्थिक तंगी नहीं आएगी और वे बंद होने से बच जाएंगे। सरकार ने साफ़ किया है कि देश में एमबीबीएस की मौजूदा 76 हज़ार सीटों में से 58 हज़ार सीटों पर फीस सरकार ही तय करेगी।

नये बिल के बारे में सरकार का दावा है कि यह बिल मरीजों और डॉक्टर्स दोनों के ही हित में है। इस समय देश में डॉक्टर्स की भारी कमी है, ऐसे में इस बिल के जरिये सरकार डॉक्टर्स की कमी को पूरा करना चाहती है। लेकिन डॉक्टर्स लगातार इस बिल का विरोध कर रहे हैं। डॉक्टर्स का तर्क है कि इस बिल के आने से चिकित्सकीय पेशे की गरिमा कम होगी। ख़ैर यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि नेशनल मेडिकल कमीशन के कानून बन जाने के बाद जो बदलाव के दावे मोदी सरकार कर रही है, वो सही साबित हो पाते हैं कि नहीं।