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​जानिए कि चीन कैसे बना इतनी बड़ी आर्थिक महाशक्ति?

Monday - October 14, 2019 2:22 pm , Category : WTN HINDI
दूनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है चीन
दूनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है चीन

सुनियोजित आर्थिक विकास के दम पर चीन बना 11 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी की अर्थव्यवस्था
 

OCT 14 (WTN) – इस समय जबकि पूरी दुनिया की अर्थव्यस्थाएं आर्थिक मंदी के कारण प्रभावित हो रही हैं, ऐसे में अर्थशास्त्री आर्थिक मंदी के कारणों पर अध्ययन कर रहे हैं कि वे कौन-कौन से कारण हैं, जिनके कारण पूरी दुनिया को आर्थिक मंदी ने अपने लपेटे में ले लिया है। जानकारों के मुताबिक़, आर्थिक मंदी के कई कारणों में एक कारण है अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर। चीन, जी हां वो चीन जिसकी अर्थव्यवस्था कुछ सालों पहले भारत की अर्थव्यवस्था से पीछे थी। और वो ही चीन जिसकी जीडीपी आज से क़रीब 40 साल पहले जाम्बिया जैसे ग़रीब देश की जीडीपी के बराबर थी, वो चीन आज दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति अमेरिका को टक्कर दे रहा है।

आईये आपको बताते हैं कि चीन आख़िर इतने कम समय में दुनिया की आर्थिक महाशक्ति अमेरिका से टक्कर लेने लायक कैसे बना? चीन अचानक ही आर्थिक रूप से इतना शक्तिशाली नहीं बना है। क़रीब 40 साल पहले चीन ने ख़ुद को आर्थिक रूप से मज़बूत करने के लिए योजनाबद्ध तरीक़े से काम करना शुरू किया था। जैसा कि आप जानते हैं कि चीन में एकदलीय वामपंथी शासन व्यवस्था है। ऐसे में विशाल जनसंख्या वाले देश की तरक्की के लिए वहां के वामपंथी शासन ने कड़े फ़ैसले लेने शुरू किये।
 
13 दिसम्बर, 1978 को कम्युनिस्ट पार्टी की एक ऐतिहासिक बैठक में चीन के नेता डेंग श्यापेंग ने चीन का कायापलट करने वाली नीतियों की आधारशिला रखी। डेंग ने चीन की बंद और नियंत्रित अर्थव्यवस्था को पूरी दुनिया के लिए खोलने का फ़ैसला किया, जिसके बाद आर्थिक तौर पर दुनिया से अलग-थलग पड़ा चीन पूरी दुनिया के लिए सस्ते सामान बनाने की फैक्ट्री बन गया।
 
एक समय दुनिया के सबसे ग़रीब देशों में शामिल रहा चीन क़रीब 11 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। 1978 में जब चीन में डेंग ने आर्थिक सुधारों को लॉन्च किया था तो चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिकी की तुलना में केवल 5 प्रतिशत थी, वहीं चीन की प्रति जीडीपी जाम्बिया के बराबर थी।

आज जबकि चीन 11 ट्रिलियन डॉलर वाली अर्थव्यवस्था है, आप शायद ये कल्पना भी ना कर पाएं कि आज से 40 साल पहले चीन की 88 प्रतिशत जनसंख्या 2 अमेरिकी डॉलर से भी कम में अपना जीवन बिताने को मजबूर थी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस समय चीन के पास 3.12 ट्रिलियन डॉलर के रूप में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भण्डार है। वहीं चीन में दुनिया का तीसरा सबसे ज़्यादा विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (170 अरब डॉलर) आता है।
 
1978 में चीन ने अपने देश में आर्थिक सुधार लागू किये तो उस समय पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में चीन की अर्थव्यवस्था का योगदान सिर्फ़ 1.8 प्रतिशत था, लेकिन आज की तारीख़ में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में चीन की अर्थव्यवस्था का योगदान क़रीब 19 प्रतिशत है। ज़ाहिर है कि ये सारे आंकड़े चीन की आर्थिक सफ़लता की सच्चाई बयां कर रहे हैं।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हाइटेक इण्डस्ट्रीज, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जेनेटिक इंजीनियरिंग, रोबोटिक्स, स्पेस और एविएशन समेत तमाम क्षेत्रों में चीन दुनिया के तमाम देशों को टक्कर दे रहा है। हालांकि, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि 1978 में चीनी नेता डेंग श्यापेंग ने जो आर्थिक सुधार लागू किए थे और सोशलिस्ट मार्केट अर्थव्यवस्था का विचार पेश किया था, उससे ही चीन की सम्पन्नता का रास्ता खुला।

दरअसल, चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को बाज़ार के भरोसे छोड़ने के बजाय घरेलू अर्थव्यवस्था में भी लगातार सुधार किया। आर्थिक सुधारों के तहत ख़राब प्रदर्शन कर रहीं सरकारी इंटरप्राइजेज को या तो बंद कर दिया गया या फिर उन्हें पुर्नगठित किया गया। इसी के कारण चीन की अर्थव्यवस्था ने एक बार जो रफ़्तार पकड़ी, उसके बाद उसने आज तक पीछे मुड़कर नहीं देखा।
 
यह तो था चीन में आर्थिक सुधारों का शुरूआती दौर। वहीं चीन में आर्थिक सुधारों का दूसरा दौर शेनजेन और शियामेन में विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) की स्थापना के साथ शुरू हुआ। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इन विशेष आर्थिक क्षेत्रों में विदेशी और घरेलू कम्पनियां बिना सरकारी हस्तक्षेप के व्यापार और निवेश कर सकती थीं। वर्तमान में दुनिया का आर्थिक हब कहलाने वाले शंघाई का भी कायापलट इसी दौरान हुआ। दरअसल, विशेष आर्थिक क्षेत्र स्थापित होने के बाद ही शंघाई समेत कई शहरों को विकसित होने का मौका मिला। आर्थिक क्रांति के बाद चीन में बड़े पैमाने पर मैन्यूफेक्चरिंग हब बने, जिसमें ज़रूरत की हर छोटी बड़ी वस्तु का उत्पादन होने लगा।
 
जैसा कि हमने आपको बताया कि डेंग ने चीन के आर्थिक विकास के लिए नीतिगत बदलाव किए, तो वहीं दूसरी तरफ उन्होंने नई कूटनीतिक शुरूआत भी की। डेंग ने माओ की पुरानी कूटनीति से अलग आर्थिक विकास के लिए बाहरी दुनिया के साथ अपने सम्बन्ध मजबूत किए। जानकारों के मुताबिक़, 1972 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के ऐतिहासिक चीन दौरे के बाद ही डेंग को पश्चिमी देशों द्वारा समर्थित बाज़ार सुधार और मुक्त अर्थव्यवस्था के लिए प्रेरणा मिली।
 
उसके बाद से चीन की विदेश नीति में बहुत बड़ा बदलाव आया। अपनी नई विदेश नीति में चीन ने अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों के साथ सम्बन्धों को मजबूत किया। डेंग ने 29 जनवरी 1979 को अमेरिका का दौरा किया, जो 1949 में कम्युनिस्ट शासन आने के बाद से किसी चीनी नेता का पहला अमेरिकी दौरा था। इसी दौरे में अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने 'पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना' को मान्यता भी दी और अमेरिका ने अपनी तमाम आधुनिक तकनीक पर निर्यात की पाबंदी हटाते हुए उसे चीन को सौंपा।
 
डेंग ने अमेरिका के अलावा जापान के साथ भी दोस्ती करने का फ़ैसला लिया। डेंग ने अक्टूबर 1978 में उस वक़्त दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जापान के साथ शांति और मित्रता संधि पर भी हस्ताक्षर किए और नवम्बर 1978 में सिंगापुर का दौरा किया, जिसमें बाद चीन की विकास प्रक्रिया में सिंगापुर मॉडल को साफ़तौर पर देखा जा सकता है।

जानकारों के मुताबिक़, डेंग की आर्थिक विकास की परम्परा को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी आगे बढ़ाया है और उनकी अति महत्वाकांक्षी बेल्ट एण्ड रोड परियोजना के तहत पूरी दुनिया में चीन अपनी आर्थिक ताक़त को बढ़ाने की कोशिश में है। तो साफ़ ज़ाहिर है कि आज से 40 साल पहले चीन जहां एक ग़रीब देश था, आज वहीं चीन 11 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी के साथ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और अमेरिका जैसे सुपर पावर देश को टक्कर दे रहा है।