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प्रधानमंत्री मोदी की ‘दूरदर्शिता’ से तबाह होने से बच गये भारतीय उद्योग

Tuesday - November 5, 2019 11:26 am , Category : WTN HINDI
भारत ने RCEP व्यापार समझौते से ख़ुद को किया अलग
भारत ने RCEP व्यापार समझौते से ख़ुद को किया अलग

चीन की चालाकी को मोदी सरकार ने दिया ज़ोर का झटका
 
NOV 05 (WTN) – तो आख़िरकार मोदी सरकार ने वो 'फ़ैसला' ले ही लिया, जिस पर सभी की निगाहें टिकी हुई थीं। मोदी सरकार के इस फ़ैसले से ज़ाहिर हो गया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक 'सफ़ल रणनीतिकार' हैं। यदि मोदी सरकार इस बड़े फ़ैसले को नहीं लेती तो आने वाला समय भारतीय उद्योगों की बर्बादी का गवाह होता!

दरअसल, भारत ने 16 देशों के RCEP व्यापार समझौते का हिस्सा नहीं बनने का 'अहम फ़ैसला' लिया है। आख़िर क्या कारण है कि मोदी सरकार ने ऐसा फ़ैसला लिया है कि भारत को RCEP व्यापार समझौते का हिस्सा नहीं बनना चाहिए? तो आपको विस्तार से बताते हैं कि आख़िर मोदी सरकार ने ऐसा फ़ैसला क्यों लिया और इससे भारत को क्या नुकसान होने वाले थे?

क्या है RCEP व्यापार समझौता? 
सबसे पहले आपको बताते हैं कि आख़िर RCEP व्यापार समझौता है क्या? दरअसल, RCEP (Regional Comprehensive Economic Partnership) यानी क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी में 10 आसियान देशों के अलावा 6 अन्य देश भारत, चीन, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, न्यूज़ीलैण्ड और  जापान शामिल हैं। RCEP व्यापार समझौते के मुताबिक़, समझौता करने वाले देशों के बीच मुक्त व्यापार को बढ़ावा मिलता है।

इस समझौते में शामिल देशों के बीच यह एक तरह से 'मुक्त व्यापार समझौता' है। इस समझौते में शामिल 16 देश एक-दूसरे को व्यापार में टैक्स कटौती समेत तमाम आर्थिक छूट देंगे। RCEP के 16 सदस्य देशों की जीडीपी पूरी दुनिया की जीडीपी की एक-तिहाई है और वहीं दुनिया की आधी आबादी इसमें शामिल है। इस समझौते में वस्तुओं और सेवाओं का आयात-निर्यात, निवेश, बौद्धिक सम्पदा जैसे विषय शामिल हैं।
 
भारत ने क्यों किया RCEP से बाहर रहने का फ़ैसला?
कहने को तो यह कई देशों के बीच एक सामान्य सी व्यापारिक डील है। लेकिन इस समझौते से भारत ने ख़ुद को बाहर रखा है। दरअसल, इस समझौते से भारत को काफ़ी नुकसान उठाना पड़ सकता था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि RCEP में शामिल देशों के साथ भारत का निर्यात से ज़्यादा आयात होता है। ऐसे में इस समझौते के तहत ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे यदि अगर आयात बढ़ता है तो उसे नियंत्रित किया जा सके। यानी कि चीन या किसी दूसरे देश के सामान को भारतीय बाज़ार में पर्याप्त अनुपात में अनुमति देने पर इस समझौत में कोई स्थिति स्पष्ट नहीं है।
 
RCEP में शामिल होने के लिए भारत को आसियान देशों,  दक्षिण कोरिया और जापान से आने वाले 90 प्रतिशत वस्तुओं पर से टैरिफ हटाना होता। इसके अलावा, चीन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से 74 प्रतिशत सामान को टैरिफ फ्री करना होता। वहीं भारत को RCEP पर कई तरह की शंकाएं थीं, लेकिन कई दौर की चर्चाओं में कई मामलों में भारत को यह विश्वास नहीं मिल पाया कि इस समझौते में आयात में वृद्धि होने पर उसे किस तरह से नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे घरेलू उद्योगों को संरक्षण दिया जा सके।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत का RCEP सदस्य देशों के साथ व्यापार लाभ की स्थिति में नहीं है, बल्कि 105 बिलियन डॉलर के घाटे में है। मोदी सरकार का RCEP समझौते से बाहर होने का सबसे बड़ा कारण है चीन। ऐसा इसलिए, क्योंकि यदि भारत इस समझौते पर हस्ताक्षर करता तो भारतीय बाज़ार सस्ते चीन सामान से भर जाते और इससे भारतीय उद्योगों की कमर टूट जाती।
 
RCEP समझौते में शामिल ना होने के पीछे की वजह का ख़ुलासा करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कहना है, “RCEP समझौते का वर्तमान मसौदा इस समझौते की बुनियादी भावना और मान्य मार्गदर्शक सिद्धांतों को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं करता है। यह समझौता मौजूदा परिस्थिति में भारत के दीर्घकालिक मुद्दों और चिंताओं का संतोषजनक रूप से समाधान भी पेश नहीं करता है।”

समझौते में ख़ामियां
जानकारों का मानना है कि इस समझौते में कई ख़ामियां हैं। इस समझौते में श्रम मानकों की अवहेलना होती है, इसमें भ्रष्टाचार की रोकथाम के उपाय नहीं है और ख़रीदारी प्रक्रिया भी पारदर्शी नहीं है। कहा जा रहा है कि यह समझौता सिर्फ टैरिफ फ्री ट्रेड पर ही केन्द्रित है। वहीं इस समझौते में शामिल देशों के बीच आर्थिक असमानता को लेकर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
 
चीन से ख़तरा!
RCEP समझौता एक तरह से चीन के लिए एक बहुत बड़ा व्यापारिक मौक़ा है, क्योंकि उत्पादन के मामले में बाक़ी 15 सदस्य देश उसके आगे कहीं नहीं टिकते हैं। स्वाभाविक है कि चीन इस समझौते के ज़रिए अपने आर्थिक दबदबे को और भी ज़्यादा बढ़ाने की कोशिश में है। आर्थिक विश्लेषकों को आशंका थी कि RCEP समझौता होने से भारतीय बाज़ारों में चीनी सामान का कब्जा सा हो जाता। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत का चीन के साथ पहले से ही 53 अरब डॉलर का व्यापार घाटा है। वित्त वर्ष 2014-15 में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 2600 अरब रुपये था, जो कि वित्त वर्ष 2018-19 में बढ़कर 3700 अरब रुपये हो गया है।
 
जैसा कि आप जानते हैं कि चीन का अमेरिका के साथ ट्रेड वॉर चल रहा है, जिससे उसे नुकसान उठाना पड़ रहा है। कहा जा रहा है कि चीन, अमेरिका से ट्रेड वॉर से हो रहे नुकसान की भरपाई भारत और अन्य देशों के बाज़ारों में अपना सामान बेचकर करना चाहता है। ऐसे में RCEP समझौते को लेकर चीन सबसे ज़्यादा उत्साहित और लालायित है।
 
दरअसल, इस समझौते को अमेरिका के ट्रांस-पैसेफिक पार्टनरशिप (TPP) का चीन की ओर से दिया गया जवाब भी कहा जा रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने TPP से अमेरिका को अलग कर लिया है, तो इसके बाद चीन ने एशियाई देशों के मुक्त व्यापार के सबूत के तौर पर RCEP का ड्राफ्ट तैयार किया है। चीन RCEP समझौते के तहत आसियान के सदस्य देशों के बाज़ारों पर कब्जा करने की रणनीति पर काम कर रहा है।
 
मोदी सरकार की दूरदर्शिता
जैसा कि आप जानते हैं कि भारत इस समय आर्थिक मंदी से बुरी तरह के प्रभावित है। आर्थिक मंदी के कारण ही भारत की निर्यात विकास दर 2019 के पहले आठ महीनों में 11.8 प्रतिशत से घटकर 1.4 प्रतिशत पर आ गई है। यदि यह गिरावट जारी रही तो भारत का व्यापार घाटा और बढ़ेगा, क्योंकि भारत दूसरे देशों को निर्यात करने से ज़्यादा आयात करता है। इन सारे आंकड़ों को देखते हुए RCEP समझौता भारत के लिए आत्मघाती साबित होता।
 
बता दें कि भारत का जिन भी देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौता रहा है, उसमें से श्रीलंका को छोड़कर भारत ज़्यादातर नुकसान की स्थिति में ही है। एफटीए (मुक्त व्यापार समझौते) के सहयोगी देश भारत के बाज़ार का फ़ायदा उठा लेते हैं, लेकिन भारत उन देशों में अपना निर्यात बढ़ाने में असफ़ल रहा है। ऐसे में कहा जा सकता है कि मोदी सरकार ने दूरदर्शी फ़ैसला लेते हुए RCEP समझौते से अलग होकर भारतीय उद्योगों को बर्बाद होने से बचा लिया है।