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हमारे लिये ख़ुदा की इबादत ही है क़व्वाली – वारसी ब्रदर्स

Saturday - February 29, 2020 11:06 am , Category : WTN HINDI
पीपुल्स विश्वविद्यालय में वारसी ब्रदर्स ने दी क़व्वालियों की शानदार प्रस्तुति
पीपुल्स विश्वविद्यालय में वारसी ब्रदर्स ने दी क़व्वालियों की शानदार प्रस्तुति

अपनी क़व्वालियों से दिल जीतने का हुनर रखते हैं वारसी ब्रदर्स

FEB 29 (WTN) – अपनी क़व्वालियों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध वारसी ब्रदर्स किसी भी परिचय के मोहताज नहीं हैं। हैदराबाद से ताल्लुक रखने वाले वारसी ब्रदर्स ने क़व्वाली को एक नई पहचान दी है। वारसी ब्रदर्स के लिए क़व्वाली एक तरह से ख़ुदा की इबादत है। भोपाल स्थित पीपुल्स विश्वविद्यालय में वारसी ब्रदर्स ने SPIC MACAY भोपाल चैप्टर के सहयोग से शाम-ए-क़व्वाली कार्यक्रम में पिछले दिनों अपनी क़व्वालियों से समां बांध दिया था। इस मौक़े पर WTN की टीम वारसी ब्रदर्स से रूबरु हुई और उनसे क़व्वाली और उसके विषय में विस्तार से जाना।
 
WTN – वैसे तो क़व्वाली भारतीय संगीत का एक अहम हिस्सा बन गई है। लेकिन फ़िर भी यदि क़व्वाली के इतिहास पर नज़र डाली जाए, तो आख़िर क़व्वाली की शुरूआत भारत में कब और कैसे हुई?
 
वारसी ब्रदर्स – देखिए ऐसा है कि क़व्वाली का इतिहास भारत में बहुत पुराना है। क़व्वाली का अर्थ होता है 'कहना' या 'प्रशंसा करना'। भारत में क़व्वाली गायन का आरम्भ ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के कारण हुआ बताया जाता है। जब ख्वाजा अजमेर पहुंचे थे, तो उन्होंने सबसे पहले फ़ारसी में ग़ज़लें कही थीं, जो कि उन्होंने क़व्वाली के अन्दाज़ में गाई थीं। वैसे कुछ लोगों का मानना है कि भारत में क़व्वाली गायन का प्रचलन अमीर ख़ुसरो के समय से प्रारम्भ हुआ है। हालांकि, इस पर एकराय नहीं बन पाई है कि भारत में क़व्वाली गायन का प्रचलन किसने शुरू किया, लेकिन इतना तो तय है कि क़व्वाली गायन की परम्परा भारत में सूफ़ी परम्परा के साथ ही अस्तित्व में आई है।

WTN – यूं तो क़व्वाली भारत के अलावा कई अन्य देशों में भी गाई जाती है। लेकिन भारत की क़व्वाली और अन्य देशों की क़व्वाली में बड़ा अन्तर क्या है?

वारसी ब्रदर्स – भारत की समृद्ध गायन परम्परा के कारण भारत में क़व्वाली गायन की परम्परा बाक़ी देशों से काफ़ी अलग है। भारत में राग और बन्दिशों के कारण क़व्वाली गायन का एक अलग मुकाम है। पुराने समय में क़व्वाली केवल आध्यात्मिक भावना से गाई जाती थी, लेकिन आजकल के आधुनिक समय में क़व्वाली में कई अन्य भावनाएं जैसे इश्क़ आदि पर भी गाया जाता है।

WTN – क़व्वाली गाने की प्रेरणा आपको कहां से मिली, और क़व्वाली गाते समय आपका ख़ास फोकस किस बात पर ज़्यादा रहता है?
 
वारसी ब्रदर्स – हमारे पिताजी और दादाजी दोनों को ही ख़ुदा के रहमोकरम से क़व्वाली गायन में महारत हासिल थी। अपने बुजुर्गों से ही हमें क़व्वाली गाने की प्रेरणा मिली है। घर में बचपन से ही क़व्वालियां सुनी और सीखते रहे। मेरे पिताजी और मेरे दादाजी ही मेरे उस्ताद थे, जिनसे मैंने क़व्वाली की बारीकियां सिखीं। जहां तक क़व्वाली गाते समय ख़ास फोकस की बात है, तो हमारी पूरी कोशिश रहती है कि ख़ुदा की इबादत में जो भी गाएं वो दिल से गाएं और राग और बन्दिशों का पूरा ख़्याल रखें।
 
WTN – कई बार लोगों को ग़ज़ल और क़व्वाली में अन्तर समझ नहीं आता है। आख़िर ग़ज़ल और क़व्वाली में क्या बेसिक अन्तर होता है?

वारसी ब्रदर्स – बढ़िया सवाल किया आपने। दरअसल, ग़ज़ल कविता की एक विधा है। जबकि क़व्वाली गायकी का एक तरीका है। ग़ज़ल असल में जज़्बात और अल्फाज़ का एक बेहतरीन संगम है, जिसमें तीन बातें, अल्फ़ाज़, तर्ज़ और आवाज़ काफ़ी मायने रखती हैं। वहीं क़व्वाली भारत की गंगा जमनी तहज़ीब का एक मुकम्मल उदाहरण है। क़व्वाली में गीत, भजन, दोहे, छंद, नज़्म और शेर के साथ और भी बहुत कुछ गाया जाता है।
 
WTN – इस समय देश में जिस तरह का तनाव का माहौल है, तो ऐसे में राष्ट्रीय एकता के लिए क्या आप अपनी क़व्वालियों के ज़रिये जनता को कुछ सन्देश देते हैं?
 
वारसी ब्रदर्स – हिन्दुस्तान में सभी को मिलकर भाईचारे से रहना चाहिए। हमारी भी कोशिश रहती है कि हम राष्ट्रीय एकता का पैगाम लोगों को दें। हमने भारत-इण्डिया-हिन्दुस्तान नाम से क़व्वाली की एक प्रस्तुति तैयारी की है, जिसके ज़रिये हमारी कोशिश रहती है कि हम देश में राष्ट्रीय एकता का सन्देश लोगों को दे सकें।