बीसीसीआई पर आरटीआई की तलवार !
Thursday - April 19, 2018 2:24 pm ,
Category : WTN HINDI
यदि केन्द्र सरकार ने विधि आयोग की सिफारिश मान ली तो बीसीसीआई भी सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत आ जाएगा। और ऐसा हुआ तो दुनिया की सबसे धनी क्रिकेट संस्था आरटीआई के घेरे में आ जाएगी। देश की आम जनता आरटीआई के द्वारा बीसीसीआई से उसके प्रशासन से लेकर खिलाड़ी चयन तक के बारे में सवाल कर सकेगी।
पूर्व जस्टिस बी.एस.चौहान की अध्यक्षता वाले 21वे विधि आयोग ने अपनी 275वीं रिपोर्ट में सिफारिश की है कि संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत बीसीसीआई को निजी के बजाय सार्वजनिक संस्था के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए। विधि आयोग की सिफारिशें मानना ना मानना सरकार का विशेषाधिकार है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2017 में बीसीसीआई की नेटवर्थ 1935 करोड़ रुपये थी। इतना ही नहीं बोर्ड भारतीय क्रिकेट टीम और आईपीएल के मैचों के प्रसारण के अधिकार पांच सालों के लिए 22 हजार करोड़ रुपयों में बेंच चुका है। दुनिया की सबसे धनी क्रिकेट संस्था यदि आरटीआई के दायरे में आती है तो यह अपने आप में काफी बड़ा कदम होगा।
ऐसा नहीं है कि बीसीसीआई को आरटीआई के दायरे में लाने की पहल पहले नहीं हुई हो, लेकिन जो भी कोशिशें थीं वो कामयाब नहीं हो सकीं। दरअसल देश के लगभग सभी खेल संस्थान सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत आते हैं, लेकिन अकेली बीसीसीआई ही ऐसी संस्था है जो कि सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत नहीं है। बीसीसीआई को आरटीआई में लाने का समर्थन करने वालों का तर्क है कि जब भारतीय क्रिकेट टीम भारत के राष्ट्रीय ध्वज का उपयोग करती है, देश के राष्ट्रीय चिन्ह अशोक चिन्ह का प्रयोग करती है और बीसीसीआई को करोड़ों रुपयों की टैक्स छूट भी मिलती है तो फिर क्यों नहीं बीसीसीआई को सूचना अधिकार अधिनिमय के अंतर्गत लाया जाना चाहिए।
अब इस मामले में गेंद केन्द्र सरकार का पाले में है। उसे ही फैसला लेना है कि आखिर बीसीसीआई को आरटीआई के दायरे में लाया जाना चाहिए की नहीं। लेकिन लगता नहीं है कि केन्द्र सरकार बीसीसीआई को आरटीआई के दायरे में लाएगी। ऐसा इसलिए क्योंकि बीसीसीआई और राज्यों के क्रिकेट संघों पर राजनेताओं की गहरी पैठ है। सत्ताधारी भाजपा ही नहीं कांग्रेस के भी कई नेता बीसीसीआई से जुड़े हुए हैं। अब देखना होगा की केन्द्र सरकार विधि आयोग की सिफारिश पर बीसीसीआई को आरटीआई के दायरे में लाती है की नहीं।
पूर्व जस्टिस बी.एस.चौहान की अध्यक्षता वाले 21वे विधि आयोग ने अपनी 275वीं रिपोर्ट में सिफारिश की है कि संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत बीसीसीआई को निजी के बजाय सार्वजनिक संस्था के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए। विधि आयोग की सिफारिशें मानना ना मानना सरकार का विशेषाधिकार है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2017 में बीसीसीआई की नेटवर्थ 1935 करोड़ रुपये थी। इतना ही नहीं बोर्ड भारतीय क्रिकेट टीम और आईपीएल के मैचों के प्रसारण के अधिकार पांच सालों के लिए 22 हजार करोड़ रुपयों में बेंच चुका है। दुनिया की सबसे धनी क्रिकेट संस्था यदि आरटीआई के दायरे में आती है तो यह अपने आप में काफी बड़ा कदम होगा।
ऐसा नहीं है कि बीसीसीआई को आरटीआई के दायरे में लाने की पहल पहले नहीं हुई हो, लेकिन जो भी कोशिशें थीं वो कामयाब नहीं हो सकीं। दरअसल देश के लगभग सभी खेल संस्थान सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत आते हैं, लेकिन अकेली बीसीसीआई ही ऐसी संस्था है जो कि सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत नहीं है। बीसीसीआई को आरटीआई में लाने का समर्थन करने वालों का तर्क है कि जब भारतीय क्रिकेट टीम भारत के राष्ट्रीय ध्वज का उपयोग करती है, देश के राष्ट्रीय चिन्ह अशोक चिन्ह का प्रयोग करती है और बीसीसीआई को करोड़ों रुपयों की टैक्स छूट भी मिलती है तो फिर क्यों नहीं बीसीसीआई को सूचना अधिकार अधिनिमय के अंतर्गत लाया जाना चाहिए।
अब इस मामले में गेंद केन्द्र सरकार का पाले में है। उसे ही फैसला लेना है कि आखिर बीसीसीआई को आरटीआई के दायरे में लाया जाना चाहिए की नहीं। लेकिन लगता नहीं है कि केन्द्र सरकार बीसीसीआई को आरटीआई के दायरे में लाएगी। ऐसा इसलिए क्योंकि बीसीसीआई और राज्यों के क्रिकेट संघों पर राजनेताओं की गहरी पैठ है। सत्ताधारी भाजपा ही नहीं कांग्रेस के भी कई नेता बीसीसीआई से जुड़े हुए हैं। अब देखना होगा की केन्द्र सरकार विधि आयोग की सिफारिश पर बीसीसीआई को आरटीआई के दायरे में लाती है की नहीं।