नरेन्द्र मोदी की 'रणनीति' में 'फंसा' विपक्ष
Thursday - July 19, 2018 11:23 am ,
Category : WTN HINDI
मोदी बनाम विपक्ष
JULY 19 (WTN) - कल यानि की 20 जुलाई को लोकसभा पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी, क्योंकि मौका रहेगा मोदी सरकार के खिलाफ़ पहले 'अविश्वास प्रस्ताव' का। लोकसभा में मोदी सरकार के पास 'पर्याप्त नम्बर' हैं, जिससे कि उन्हें अविश्वास प्रस्ताव से डरने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन सभी के मन में यही सवाल है कि आखिर मोदी सरकार ने अविश्वास प्रस्ताव को स्वीकार क्यों किया। राजनीति के जानकारों के मुताबिक अविश्वास प्रस्ताव स्वीकार कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विपक्ष को अपनी' रणनीति' के जाल में फंसा लिया है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इससे पहले कांग्रेस ने मोदी सरकार पर विफलताओं के आरोप लगाकर अविश्वास प्रस्ताव दिया था, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने इसे स्वीकार नहीं किया था। सुमित्रा महाजन ने टीडीपी द्वारा आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के मुद्दे पर 'अविश्वास प्रस्ताव' को मंजूरी दे दी है। माना जा रहा है कि मोदी सरकार ने 'सोची समझी रणनीति' के तहत ही अविश्वास प्रस्ताव को स्वीकार किया है।
जैसा कि आप जानते हैं कि लोकसभा चुनाव के लिए कुछ ही समय बाकी बचा है। ऐसे में माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अविश्वास प्रस्ताव के जरिए 'एनडीए की एकता' और 'विपक्ष की एकजुटता' को परखना चाहते हैं। विशेष राज्य के मुद्दे पर टीडीपी एनडीए से अलग हो चुकी है। वहीं भाजपा के शिवसेना और जेडीयू से राजनीतिक सम्बन्ध इस समय 'ऊहापोह' की स्थिति में हैं। ऐसे में नरेन्द्र मोदी अविश्वास प्रस्ताव के जरिए खासकर शिवसेना के 'मन की जान' लेंगे कि आखिर इस समय शिवसेना साथ देती है कि नहीं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने भाषणों के लिए जाने जाते हैं। माना जाता है कि नरेन्द्र मोदी अविश्वास प्रस्ताव के दौरान 'खुलकर' अपने मन की बातें करना चाहते हैं। वे लोकसभा में भाषण के दौरान चार सालों में अपनी सरकार के कामों पर अपनी बात रखेंगे साथ ही वे विपक्ष पर जमकर 'कटाक्ष' करेंगे।
पूरे देश की निगाहें अविश्वास प्रस्ताव के दौरान नरेन्द्र मोदी के 'भाषण' पर रहेगी। माना जा रहा है कि मोदी के 'निशाने' पर रहेंगे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, और जब नरेन्द्र मोदी राहुल गांधी पर 'तंज' कसेंगे तो इस बहस के बहाने मोदी देश के मतदाताओं को बताने का प्रयास करेंगे कि उनकी सरकार ने देश के लिए कितना काम किया है।
एक तरह है माना जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी ने इस अविश्वास प्रस्ताव को इसलिए स्वीकार किया है ताकि वे लोकसभा से पूरे देश को बता सकें कि उनकी सरकार ने देश के लिए क्या किया है। यानि की एक तरह से मोदी पूरे देश को 'चुनावी भाषण' देने वाले हैं। या कहें कि मोदी अपने चार सालों के कामों का 'प्रजेन्टेशन' देने वाले हैं।
नरेन्द्र मोदी राहुल गांधी ही नहीं, विपक्ष के कई नेताओं को अपने भाषण के दौरान 'आड़े हाथों' लेने वाले हैं। चुनाव में प्रचार के लिए नरेन्द्र मोदी को अलग-अलग राज्यों में जाकर विपक्ष की अलग-अलग पार्टियों के खिलाफ मोर्चा खोलना पड़ता था। लेकिन लोकसभा में नरेन्द्र मोदी अपने भाषण में 'सम्पूर्ण विपक्ष' पर निशाना साधेंगे। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधानमंत्री जब विपक्ष के नेताओं पर 'कटाक्ष' करेगा तो इस पर करोड़ों लोगों की निगाहें लगी होंगी।
यह तो तय है कि मोदी सरकार के खिलाफ 'अविश्वास प्रस्ताव' पास नहीं हो पाएगा। लेकिन नरेन्द्र मोदी और भाजपा के कद्दावर नेता जो भी बोलेंगे उसकी चर्चा काफी समय तक टीवी, समाचार पत्र, पत्रिकाओं, सोशल मीडिया और आम लोगों में होती रहेगी। चूंकि तय है कि मोदी सरकार को कोई खतरा नहीं है ऐसे में भाजपा के वक्ताओं में अलग ही 'आत्मविश्वास' होगा, जिसे देश की जनता देखगी तो एक अलग ही 'सकारात्मक' असर भाजपा के पक्ष में रहेगा।
भाजपा इस अविश्वास प्रस्ताव के बाद काफी 'आत्मविश्वास' के साथ जनता के बीच चुनाव में जाएगी। माना यह भी जा रह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत तमाम भाजपा वक्ताओं के निशाने पर सिर्फ और सिर्फ राहुल गांधी ही रहेंगे। राजनीति के पण्डितों के मुताबिक नरेन्द्र मोदी की भाषण कला के सामने राहुल गांधी कहीं नहीं ठहर पाते हैं। और जब राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी के सामने भाषण में कमजोर नजर आएंगे तो भाजपा के लिए यह काफी बड़ा मुद्दा होगा।
यानि की माना जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक 'सोची समझी रणनीति' के तहत ही अविश्वास प्रस्ताव को स्वीकार किया है ताकि वे अपनी बात पूरे देश के सामने रख सकें और विपक्ष की एकजुटता को परख सकें।
JULY 19 (WTN) - कल यानि की 20 जुलाई को लोकसभा पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी, क्योंकि मौका रहेगा मोदी सरकार के खिलाफ़ पहले 'अविश्वास प्रस्ताव' का। लोकसभा में मोदी सरकार के पास 'पर्याप्त नम्बर' हैं, जिससे कि उन्हें अविश्वास प्रस्ताव से डरने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन सभी के मन में यही सवाल है कि आखिर मोदी सरकार ने अविश्वास प्रस्ताव को स्वीकार क्यों किया। राजनीति के जानकारों के मुताबिक अविश्वास प्रस्ताव स्वीकार कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विपक्ष को अपनी' रणनीति' के जाल में फंसा लिया है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इससे पहले कांग्रेस ने मोदी सरकार पर विफलताओं के आरोप लगाकर अविश्वास प्रस्ताव दिया था, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने इसे स्वीकार नहीं किया था। सुमित्रा महाजन ने टीडीपी द्वारा आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के मुद्दे पर 'अविश्वास प्रस्ताव' को मंजूरी दे दी है। माना जा रहा है कि मोदी सरकार ने 'सोची समझी रणनीति' के तहत ही अविश्वास प्रस्ताव को स्वीकार किया है।
जैसा कि आप जानते हैं कि लोकसभा चुनाव के लिए कुछ ही समय बाकी बचा है। ऐसे में माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अविश्वास प्रस्ताव के जरिए 'एनडीए की एकता' और 'विपक्ष की एकजुटता' को परखना चाहते हैं। विशेष राज्य के मुद्दे पर टीडीपी एनडीए से अलग हो चुकी है। वहीं भाजपा के शिवसेना और जेडीयू से राजनीतिक सम्बन्ध इस समय 'ऊहापोह' की स्थिति में हैं। ऐसे में नरेन्द्र मोदी अविश्वास प्रस्ताव के जरिए खासकर शिवसेना के 'मन की जान' लेंगे कि आखिर इस समय शिवसेना साथ देती है कि नहीं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने भाषणों के लिए जाने जाते हैं। माना जाता है कि नरेन्द्र मोदी अविश्वास प्रस्ताव के दौरान 'खुलकर' अपने मन की बातें करना चाहते हैं। वे लोकसभा में भाषण के दौरान चार सालों में अपनी सरकार के कामों पर अपनी बात रखेंगे साथ ही वे विपक्ष पर जमकर 'कटाक्ष' करेंगे।
पूरे देश की निगाहें अविश्वास प्रस्ताव के दौरान नरेन्द्र मोदी के 'भाषण' पर रहेगी। माना जा रहा है कि मोदी के 'निशाने' पर रहेंगे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, और जब नरेन्द्र मोदी राहुल गांधी पर 'तंज' कसेंगे तो इस बहस के बहाने मोदी देश के मतदाताओं को बताने का प्रयास करेंगे कि उनकी सरकार ने देश के लिए कितना काम किया है।
एक तरह है माना जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी ने इस अविश्वास प्रस्ताव को इसलिए स्वीकार किया है ताकि वे लोकसभा से पूरे देश को बता सकें कि उनकी सरकार ने देश के लिए क्या किया है। यानि की एक तरह से मोदी पूरे देश को 'चुनावी भाषण' देने वाले हैं। या कहें कि मोदी अपने चार सालों के कामों का 'प्रजेन्टेशन' देने वाले हैं।
नरेन्द्र मोदी राहुल गांधी ही नहीं, विपक्ष के कई नेताओं को अपने भाषण के दौरान 'आड़े हाथों' लेने वाले हैं। चुनाव में प्रचार के लिए नरेन्द्र मोदी को अलग-अलग राज्यों में जाकर विपक्ष की अलग-अलग पार्टियों के खिलाफ मोर्चा खोलना पड़ता था। लेकिन लोकसभा में नरेन्द्र मोदी अपने भाषण में 'सम्पूर्ण विपक्ष' पर निशाना साधेंगे। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधानमंत्री जब विपक्ष के नेताओं पर 'कटाक्ष' करेगा तो इस पर करोड़ों लोगों की निगाहें लगी होंगी।
यह तो तय है कि मोदी सरकार के खिलाफ 'अविश्वास प्रस्ताव' पास नहीं हो पाएगा। लेकिन नरेन्द्र मोदी और भाजपा के कद्दावर नेता जो भी बोलेंगे उसकी चर्चा काफी समय तक टीवी, समाचार पत्र, पत्रिकाओं, सोशल मीडिया और आम लोगों में होती रहेगी। चूंकि तय है कि मोदी सरकार को कोई खतरा नहीं है ऐसे में भाजपा के वक्ताओं में अलग ही 'आत्मविश्वास' होगा, जिसे देश की जनता देखगी तो एक अलग ही 'सकारात्मक' असर भाजपा के पक्ष में रहेगा।
भाजपा इस अविश्वास प्रस्ताव के बाद काफी 'आत्मविश्वास' के साथ जनता के बीच चुनाव में जाएगी। माना यह भी जा रह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत तमाम भाजपा वक्ताओं के निशाने पर सिर्फ और सिर्फ राहुल गांधी ही रहेंगे। राजनीति के पण्डितों के मुताबिक नरेन्द्र मोदी की भाषण कला के सामने राहुल गांधी कहीं नहीं ठहर पाते हैं। और जब राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी के सामने भाषण में कमजोर नजर आएंगे तो भाजपा के लिए यह काफी बड़ा मुद्दा होगा।
यानि की माना जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक 'सोची समझी रणनीति' के तहत ही अविश्वास प्रस्ताव को स्वीकार किया है ताकि वे अपनी बात पूरे देश के सामने रख सकें और विपक्ष की एकजुटता को परख सकें।