मध्य प्रदेश कांग्रेस में टिकट के लिए मचा ‘घमासान’
Tuesday - July 31, 2018 11:45 am ,
Category : WTN HINDI
टिकट वितरण के बाद बढ़ सकता है ‘असंतोष’
JULY 31 (WTN) – मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए बस कुछ ही महीने बचें हैं। लगातार 15 सालों से सत्ता से दूर कांग्रेस, भाजपा को हराने के लिए हर ‘रणनीति’ पर काम कर रही है। लेकिन जीत सभी हासिल हो सकती है जब कांग्रेस के प्रत्याशी भाजपा प्रत्याशियों के सामने ‘दमदार’ हों।
कई ऐसे फैक्टर हैं जिसके आधार पर कांग्रेस नेताओं को ‘जीत की आशा’ इस बार दिख रही है। 15 सालों की एंटी इनकम्बेंसी, नोटबंदी, जीएसटी और किसानों की कथित नाराज़गी ऐसे मुद्दे हैं जिसके आधार पर कांग्रेस को इस बार विधानसभा चुनाव जीतने की आशा बंधी है। इसलिए विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस में टिकट के लिए नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं में ‘ज़ोर आज़माइश’ मची हुई है।
चुनाव के लिए टिकट की ‘दावेदारी’ के लिए काफ़ी संगठन पदाधिकारियों भी लाइन में हैं। मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक कांग्रेस संगठन से जुड़े क़रीब 40 से ज़्यादा पदाधिकारी हैं जिन्होंने टिकट के लिए दावेदारी की है। टिकट के लिए पार्टी नेताओं में मचे ‘घमासान’ को कांग्रेस ने एक 'अच्छा संकेत' बताया है।
माना जा रहा है कि यदि कांग्रेस का बसपा और सपा से चुनाव पूर्व गठबंधन होता है, तो क़रीब 25 से 30 सीटें इन दोनों पार्टियों को कांग्रेस को समझौते के तहत देना होंगी। बाक़ी बची क़रीब 205 से 200 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस के पास टिकट मांगने वालों की काफ़ी बड़ी तादात है।
मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक, कांग्रेस से जुड़े कई संगठनों जैसे महिला कांग्रेस, युवक कांग्रेस और किसान कांग्रेस समेत कई संगठनों और मोर्चों के पदाधिकारियों ने चुनाव के लिए टिकट की मांग की है। कहा जा रहा है कि यदि इन सभी को टिकट देने पर ‘सहमति’ बनती है, तो 170 से 185 सीटों पर संगठनों और मोर्चों के पदाधिकारी ही चुनाव लड़ेंगे।
यदि सभी कुछ ‘सही’ रहा, तो माना जा रहा है कि 2013 के विधानसभा चुनाव में जीते विधायकों का टिकट मिलना ‘तय’ है। यदि ऐसा होता है तो कहा जा सकता है कि टिकट वितरण के बाद कांग्रेस में फूट, विद्रोह और घमासान हो सकता है। बसपा-सपा गठबंधन को सीटें देने के बाद उन सीटों पर टिकट की ‘आस’ लगाए कांग्रेस नेताओं में ‘असंतोष’ भी फैल सकता है। ऐसे में इन सीटों पर ‘विद्रोह’ और ‘भीतरघात’ को रोकने के लिए कांग्रेस के बड़े नेताओं को काफ़ी मेहनत करनी पड़ेगी।
वहीं गठबंधन के बची हुईं सीटों पर टिकट वितरण भी पार्टी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। जीत की आस लगाए बैठे कांग्रेस नेता इस बार टिकट के लिए कोई भी कसर छोड़ना नहीं चाहेंगे। लेकिन जिन्हें टिकट नहीं मिलेगा उनके असंतोष को शांत करने कांग्रेस के आला नेताओं के पास क्या रणनीति है? यह तो वक़्त आने पर ही पता चलेगा।
JULY 31 (WTN) – मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए बस कुछ ही महीने बचें हैं। लगातार 15 सालों से सत्ता से दूर कांग्रेस, भाजपा को हराने के लिए हर ‘रणनीति’ पर काम कर रही है। लेकिन जीत सभी हासिल हो सकती है जब कांग्रेस के प्रत्याशी भाजपा प्रत्याशियों के सामने ‘दमदार’ हों।
कई ऐसे फैक्टर हैं जिसके आधार पर कांग्रेस नेताओं को ‘जीत की आशा’ इस बार दिख रही है। 15 सालों की एंटी इनकम्बेंसी, नोटबंदी, जीएसटी और किसानों की कथित नाराज़गी ऐसे मुद्दे हैं जिसके आधार पर कांग्रेस को इस बार विधानसभा चुनाव जीतने की आशा बंधी है। इसलिए विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस में टिकट के लिए नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं में ‘ज़ोर आज़माइश’ मची हुई है।
चुनाव के लिए टिकट की ‘दावेदारी’ के लिए काफ़ी संगठन पदाधिकारियों भी लाइन में हैं। मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक कांग्रेस संगठन से जुड़े क़रीब 40 से ज़्यादा पदाधिकारी हैं जिन्होंने टिकट के लिए दावेदारी की है। टिकट के लिए पार्टी नेताओं में मचे ‘घमासान’ को कांग्रेस ने एक 'अच्छा संकेत' बताया है।
माना जा रहा है कि यदि कांग्रेस का बसपा और सपा से चुनाव पूर्व गठबंधन होता है, तो क़रीब 25 से 30 सीटें इन दोनों पार्टियों को कांग्रेस को समझौते के तहत देना होंगी। बाक़ी बची क़रीब 205 से 200 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस के पास टिकट मांगने वालों की काफ़ी बड़ी तादात है।
मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक, कांग्रेस से जुड़े कई संगठनों जैसे महिला कांग्रेस, युवक कांग्रेस और किसान कांग्रेस समेत कई संगठनों और मोर्चों के पदाधिकारियों ने चुनाव के लिए टिकट की मांग की है। कहा जा रहा है कि यदि इन सभी को टिकट देने पर ‘सहमति’ बनती है, तो 170 से 185 सीटों पर संगठनों और मोर्चों के पदाधिकारी ही चुनाव लड़ेंगे।
यदि सभी कुछ ‘सही’ रहा, तो माना जा रहा है कि 2013 के विधानसभा चुनाव में जीते विधायकों का टिकट मिलना ‘तय’ है। यदि ऐसा होता है तो कहा जा सकता है कि टिकट वितरण के बाद कांग्रेस में फूट, विद्रोह और घमासान हो सकता है। बसपा-सपा गठबंधन को सीटें देने के बाद उन सीटों पर टिकट की ‘आस’ लगाए कांग्रेस नेताओं में ‘असंतोष’ भी फैल सकता है। ऐसे में इन सीटों पर ‘विद्रोह’ और ‘भीतरघात’ को रोकने के लिए कांग्रेस के बड़े नेताओं को काफ़ी मेहनत करनी पड़ेगी।
वहीं गठबंधन के बची हुईं सीटों पर टिकट वितरण भी पार्टी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। जीत की आस लगाए बैठे कांग्रेस नेता इस बार टिकट के लिए कोई भी कसर छोड़ना नहीं चाहेंगे। लेकिन जिन्हें टिकट नहीं मिलेगा उनके असंतोष को शांत करने कांग्रेस के आला नेताओं के पास क्या रणनीति है? यह तो वक़्त आने पर ही पता चलेगा।