व्याभिचार के अपराध में महिला भी पुरुष के समान जिम्मेदार: सुप्रीम कोर्ट
Thursday - August 2, 2018 3:14 pm ,
Category : WTN HINDI
आईपीसी की धारा 497 की चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “व्याभिचार अपराध की श्रेणी में रहे कि नहीं करेंगे पड़ताल”
AUG 02 (WTN) – भारतीय संविधान सभी को समानता का अधिकार देता है। विधि के समझ न्याय पाने के मामले में भी सभी को समानता का अधिकार है। लेकिन इन दिनों भारतीय दण्ड संहिता की धारा 497 को चुनौती दी जा रही है। इस संहिता के ख़िलाफ़ याचिका दायर करने वालों का तर्क है कि आईपीसी की धारा 497 समानता के सिद्धांत से अलग है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आईपीसी की धारा 497 व्याभिचार से सम्बन्धित है।
इधर, व्याभिचार को लेकर आईपीसी की धारा 497 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा है कि इसके लिए दोनों पक्ष समान रूप से ज़िम्मेदार हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का कहना है, “विवाहित महिला अगर किसी विवाहित पुरूष से सम्बन्ध बनाती है, तो सिर्फ़ पुरुष ही दोषी क्यों ? जबकि महिला भी अपराध की जिम्मेदार है।“
सुप्रीम कोर्ट ने आश्चर्य जताते हुए कहा, “अगर अविवाहित पुरुष किसी विवाहित महिला के साथ शारीरित सम्बन्ध बनाता है तो वो व्याभिचार नहीं होता।“ कोर्ट ने कहा, “शादी की पवित्रता बनाए रखना पति और पत्नी दोनों की जिम्मेदारी है।“ कोर्ट ने कहा, “आईपीसी की धारा 497 के तहत सिर्फ पुरुष को ही व्याभिचार का दोषी माना जाना IPC का एक ऐसा अनोखा प्रावधान है कि जिसमें केवल एक पक्ष को ही दोषी माना जाता है।“
वहीं कोर्ट ने हैरानी जताते हुए कहा, ”अगर विवाहित महिला के पति की सहमति से कोई विवाहित पुरुष सम्बन्ध बनाता है तो वो अपराध नहीं है। इसका मतलब क्या महिला पुरुष की निजी मिल्कियत है कि वो उसकी मर्जी से चले?”
इससे पहले मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा, “वह महिलाओं के लिये भी इसे अपराध बनाने के लिये कानून को नहीं छुएगी।“ पीठ ने कहा, “हम इस बात की जांच करेंगे कि क्या अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता) के आधार पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 497 अपराध की श्रेणी में बनी रहनी चाहिये या नहीं?”
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सात न्यायाधीशों की पीठ को सौंपने की अतिरिक्त सॉलीसीटर जनरल पिंकी आनंद की मांग को ख़ारिज कर दिया। पीठ ने कहा, “ये मुद्दे, पांच न्यायाधीशों की पीठ ने जिस मुद्दे पर 1954 में विचार किया था, उससे बिल्कुल अलग हैं।“ पीठ ने कहा, “पांच न्यायाधीशों की पीठ ने 1954 में इस मुद्दे पर विचार किया था कि क्या किसी महिला को दुष्प्रेरक माना जा सकता है? लेकिन मौजूदा याचिका इससे बिल्कुल अलग है।“ पीठ ने कहा, “व्यािभिचार तलाक का भी आधार है और इसके अतिरिक्त विभिन्न कानूनों में अन्य दीवानी उपचार भी उपलब्ध हैं।“ पीठ ने कहा, “इसलिये, हम इस बात की पड़ताल करेंगे कि क्या व्याभिचार के प्रावधान को अपराध की श्रेणी में बने रहने की जरूरत है।“
AUG 02 (WTN) – भारतीय संविधान सभी को समानता का अधिकार देता है। विधि के समझ न्याय पाने के मामले में भी सभी को समानता का अधिकार है। लेकिन इन दिनों भारतीय दण्ड संहिता की धारा 497 को चुनौती दी जा रही है। इस संहिता के ख़िलाफ़ याचिका दायर करने वालों का तर्क है कि आईपीसी की धारा 497 समानता के सिद्धांत से अलग है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आईपीसी की धारा 497 व्याभिचार से सम्बन्धित है।
इधर, व्याभिचार को लेकर आईपीसी की धारा 497 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा है कि इसके लिए दोनों पक्ष समान रूप से ज़िम्मेदार हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का कहना है, “विवाहित महिला अगर किसी विवाहित पुरूष से सम्बन्ध बनाती है, तो सिर्फ़ पुरुष ही दोषी क्यों ? जबकि महिला भी अपराध की जिम्मेदार है।“
सुप्रीम कोर्ट ने आश्चर्य जताते हुए कहा, “अगर अविवाहित पुरुष किसी विवाहित महिला के साथ शारीरित सम्बन्ध बनाता है तो वो व्याभिचार नहीं होता।“ कोर्ट ने कहा, “शादी की पवित्रता बनाए रखना पति और पत्नी दोनों की जिम्मेदारी है।“ कोर्ट ने कहा, “आईपीसी की धारा 497 के तहत सिर्फ पुरुष को ही व्याभिचार का दोषी माना जाना IPC का एक ऐसा अनोखा प्रावधान है कि जिसमें केवल एक पक्ष को ही दोषी माना जाता है।“
वहीं कोर्ट ने हैरानी जताते हुए कहा, ”अगर विवाहित महिला के पति की सहमति से कोई विवाहित पुरुष सम्बन्ध बनाता है तो वो अपराध नहीं है। इसका मतलब क्या महिला पुरुष की निजी मिल्कियत है कि वो उसकी मर्जी से चले?”
इससे पहले मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा, “वह महिलाओं के लिये भी इसे अपराध बनाने के लिये कानून को नहीं छुएगी।“ पीठ ने कहा, “हम इस बात की जांच करेंगे कि क्या अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता) के आधार पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 497 अपराध की श्रेणी में बनी रहनी चाहिये या नहीं?”
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सात न्यायाधीशों की पीठ को सौंपने की अतिरिक्त सॉलीसीटर जनरल पिंकी आनंद की मांग को ख़ारिज कर दिया। पीठ ने कहा, “ये मुद्दे, पांच न्यायाधीशों की पीठ ने जिस मुद्दे पर 1954 में विचार किया था, उससे बिल्कुल अलग हैं।“ पीठ ने कहा, “पांच न्यायाधीशों की पीठ ने 1954 में इस मुद्दे पर विचार किया था कि क्या किसी महिला को दुष्प्रेरक माना जा सकता है? लेकिन मौजूदा याचिका इससे बिल्कुल अलग है।“ पीठ ने कहा, “व्यािभिचार तलाक का भी आधार है और इसके अतिरिक्त विभिन्न कानूनों में अन्य दीवानी उपचार भी उपलब्ध हैं।“ पीठ ने कहा, “इसलिये, हम इस बात की पड़ताल करेंगे कि क्या व्याभिचार के प्रावधान को अपराध की श्रेणी में बने रहने की जरूरत है।“