क्या अब लंगर और धार्मिक पुस्तकों की बिक्री पर लगेगा जीएसटी ?
Tuesday - September 4, 2018 2:47 pm ,
Category : WTN HINDI
एक केस में महाराष्ट्र की जीएसटी कोर्ट ने धार्मिक पुस्तकों की बिक्री और लंगर को रखा जीएसटी के दायर में
SEP 04 (WTN) – आपको याद हो तो अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में होने वाले लंगर पर जीएसटी का लोगों ने काफ़ी विरोध किया था। जिसके बाद पंजाब की कांग्रेस सरकार ने स्वर्ण मंदिर में होने वाले लंगर पर जीएसटी से अपना हिस्सा छोड़ दिया था। लेकिन अब महाराष्ट्र में जीएसटी कोर्ट के फैसले के बाद नया विवाद खड़ा हो सकता है। हम ऐसा क्यों कह रहे हैं आइये आपको बताते हैं।
दरअसल महाराष्ट्र में जीएसटी कोर्ट ने एक केस में फैसला दिया है कि धार्मिक ग्रंथ, धार्मिक पुस्तकें और डीवीडी, धर्मशाला और लंगर जीएसटी के दायरे में होंगे। कोर्ट ने उस केस में अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि चूंकि इन वस्तुओं और सेवाओं की बिक्री एक व्यापार है और इन्हें खैरात मानते हुए टैक्स से मुक्त नहीं किया जा सकता है।
मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक, महाराष्ट्र की कोर्ट के पास टैक्स सम्बन्धी यह मामला श्रीमद राजचंद्र आध्यात्मिक सत्संग साधना केन्द्र के खिलाफ आया था। इस पूरे मामले में कोर्ट के सामने संस्था ने दलील दी थी कि उसका मुख्य काम धार्मिक और आध्यात्मिक शिक्षा का प्रसार है, इसलिए उसके काम को कारोबार का नाम नहीं जाना चाहिए।
अपनी दलील के साथ संस्था ने दावा किया था कि धार्मिक प्रसार के अपने प्रमुख दायित्व को निभाने में वह धार्मिक ग्रंथ, मैगजीन, म्यूजिक सीडी समेत धर्मशाला और लंगर लगाने के काम को करता है, इसलिए उसे जीएसटी के दायरे से बाहर रखा जाए।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सीजीएसटी एक्ट के सेक्शन 2(17) के तहत, धर्म से जुड़े ट्रस्ट यदि ऐसे किसी काम का सहारा लेते हैं जहां किसी वस्तु या सेवा के लिए पैसा लिया जाता है, तो उसे व्यापार की श्रेणी ने रखा जाएगा और उस पर 18 प्रतिशत की दर से जीएसटी वसूला जाएगा।
इस पूरे मामले पर गौर करने के बाद महाराष्ट्र की जीएसटी कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि शिविर सत्संग धर्मार्थ संस्था के तौर पर इनकम टैक्स के सेक्शन 12 एए के अंतर्गत रजिस्टर्ड है। इसलिए धर्मार्थ कामों को जीएसटी के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जीएसटी एक्ट में सिर्फ धार्मिक किताबों का जिक्र किया गया है, लेकिन धार्मिक किताब को किसी तरह से वर्गीकृत नहीं किया गया है। यानि कि ऐसी स्थिति में साफ है कि महाराष्ट्र की जीएसटी कोर्ट के इस फैसले के बाद यदि कोई धार्मिक संस्था अथवा ट्रस्ट धार्मिक ग्रंथों की बिक्री करता है तो उसे जीएसटी देना होगा।
लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एक्ट में बाकायदा इस बात का जिक्र है कि यदि कोई संस्था ग्रंथ/किताब/मैजगीन को किसी पब्लिक लाइब्रेरी के तहत लोगों के उपयोग के लिए रखती है तो ऐसी स्थिति में उसे जीएसटी के दायरे से बाहर रखा जाएगा।
महाराष्ट्र के जीएसटी कोर्ट के फैसले के बाद कहा जा सकता है कि अब कोई धार्मिक संस्था गीता, कुरान अथवा बाइबल जैसे धार्मिक ग्रंथों की बिक्री करती है तो उसे जीएसटी के दायरे में रखा जाएगा। लेकिन यह इतना आसान नहीं लगता है। क्योंकि जिस तरह से लंगर पर लगने वाले जीएसटी का काफी विरोध हुआ था वैसे ही इसका भी विरोध होगा।
SEP 04 (WTN) – आपको याद हो तो अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में होने वाले लंगर पर जीएसटी का लोगों ने काफ़ी विरोध किया था। जिसके बाद पंजाब की कांग्रेस सरकार ने स्वर्ण मंदिर में होने वाले लंगर पर जीएसटी से अपना हिस्सा छोड़ दिया था। लेकिन अब महाराष्ट्र में जीएसटी कोर्ट के फैसले के बाद नया विवाद खड़ा हो सकता है। हम ऐसा क्यों कह रहे हैं आइये आपको बताते हैं।
दरअसल महाराष्ट्र में जीएसटी कोर्ट ने एक केस में फैसला दिया है कि धार्मिक ग्रंथ, धार्मिक पुस्तकें और डीवीडी, धर्मशाला और लंगर जीएसटी के दायरे में होंगे। कोर्ट ने उस केस में अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि चूंकि इन वस्तुओं और सेवाओं की बिक्री एक व्यापार है और इन्हें खैरात मानते हुए टैक्स से मुक्त नहीं किया जा सकता है।
मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक, महाराष्ट्र की कोर्ट के पास टैक्स सम्बन्धी यह मामला श्रीमद राजचंद्र आध्यात्मिक सत्संग साधना केन्द्र के खिलाफ आया था। इस पूरे मामले में कोर्ट के सामने संस्था ने दलील दी थी कि उसका मुख्य काम धार्मिक और आध्यात्मिक शिक्षा का प्रसार है, इसलिए उसके काम को कारोबार का नाम नहीं जाना चाहिए।
अपनी दलील के साथ संस्था ने दावा किया था कि धार्मिक प्रसार के अपने प्रमुख दायित्व को निभाने में वह धार्मिक ग्रंथ, मैगजीन, म्यूजिक सीडी समेत धर्मशाला और लंगर लगाने के काम को करता है, इसलिए उसे जीएसटी के दायरे से बाहर रखा जाए।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सीजीएसटी एक्ट के सेक्शन 2(17) के तहत, धर्म से जुड़े ट्रस्ट यदि ऐसे किसी काम का सहारा लेते हैं जहां किसी वस्तु या सेवा के लिए पैसा लिया जाता है, तो उसे व्यापार की श्रेणी ने रखा जाएगा और उस पर 18 प्रतिशत की दर से जीएसटी वसूला जाएगा।
इस पूरे मामले पर गौर करने के बाद महाराष्ट्र की जीएसटी कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि शिविर सत्संग धर्मार्थ संस्था के तौर पर इनकम टैक्स के सेक्शन 12 एए के अंतर्गत रजिस्टर्ड है। इसलिए धर्मार्थ कामों को जीएसटी के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जीएसटी एक्ट में सिर्फ धार्मिक किताबों का जिक्र किया गया है, लेकिन धार्मिक किताब को किसी तरह से वर्गीकृत नहीं किया गया है। यानि कि ऐसी स्थिति में साफ है कि महाराष्ट्र की जीएसटी कोर्ट के इस फैसले के बाद यदि कोई धार्मिक संस्था अथवा ट्रस्ट धार्मिक ग्रंथों की बिक्री करता है तो उसे जीएसटी देना होगा।
लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एक्ट में बाकायदा इस बात का जिक्र है कि यदि कोई संस्था ग्रंथ/किताब/मैजगीन को किसी पब्लिक लाइब्रेरी के तहत लोगों के उपयोग के लिए रखती है तो ऐसी स्थिति में उसे जीएसटी के दायरे से बाहर रखा जाएगा।
महाराष्ट्र के जीएसटी कोर्ट के फैसले के बाद कहा जा सकता है कि अब कोई धार्मिक संस्था गीता, कुरान अथवा बाइबल जैसे धार्मिक ग्रंथों की बिक्री करती है तो उसे जीएसटी के दायरे में रखा जाएगा। लेकिन यह इतना आसान नहीं लगता है। क्योंकि जिस तरह से लंगर पर लगने वाले जीएसटी का काफी विरोध हुआ था वैसे ही इसका भी विरोध होगा।