विश्लेषण: क्या समाज स्वीकार करेगा समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
Thursday - September 6, 2018 1:38 pm ,
Category : WTN HINDI
सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला, एकांत में सहमति से बने समलैंगिक सम्बन्ध अपराध नहीं
SEP 06 (WTN) – आज भारत की सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है जिसकी चर्चा सालों तक होती रहेगी। भारत के उच्चतम न्यायालय के 5 जजों की संवैधानिक पीठ ने समलैंगिक सम्बन्धों को अपराध मानने वाली धारा 377 पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि एकांत में सहमति से बने समलैंगिक सेक्स सम्बन्ध अपराध की श्रेणी में नहीं आते हैं। हालांकि, धारा 377 के अंतर्गत पशु से सम्भोग अभी भी अपराध बना रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा, “हर किसी को अपनी ज़िन्दगी अपनी मर्ज़ी से जीने का अधिकार है।“ अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ''हर व्यक्ति को गरिमा से जीने का हक है, सेक्सुअल रुझान प्राकृतिक है। इस आधार पर भेदभाव नहीं हो सकता है। हर व्यक्ति को गरिमा से जीने का हक है। सेक्सुअल रुझान प्राकृतिक है। इस आधार पर भेदभाव नहीं हो सकता है। निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है, और 377 इसका हनन करता है.''
अपने फैसले में मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ''देश में सबको समानता और सम्मान से जीने का अधिकार हासिल है। कुछ लोग समाज से बहिष्कार की स्थिति झेलते हैं। पहले हुई गलती को सुधारना ज़रूरी है। जो प्राकृतिक है उसको गलत कैसे ठहराया जा सकता है। समाज की सोच बदलने की ज़रूरत है। हमें कुछ पुरानी धारणाओं को अलविदा कहना होगा। बहुमतवाद से सभी काम नहीं चल सकते।''
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने आगे कहा, ''LGBT समुदाय को सभी मौलिक अधिकार हासिल हैं। किसी के साथ भेदभाव न हो ये देखना हमारी ज़िम्मेदारी है। अप्राकृतिक यौन सम्बन्धों को अपराध करार देना ग़लत।''
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आईपीसी की धारा 377 अप्राकृतिक यौन सम्बन्ध को अपराध मानती है। इसके तहत पशुओं के साथ ही नहीं, बल्कि दो व्यस्कों के बीच बने समलैंगिक सम्बन्ध को भी अप्राकृतिक कहा गया है। इसके लिए 10 साल तक की सज़ा का प्रावधान है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब धारा 377 दो व्यस्कों के सम्बन्ध पर लागू नहीं होगा।
इसके बारे में आपको विस्तार से बताएं तो दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2009 में दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से एकांत में बने समलैंगिक सम्बन्ध को अपराध मानने से मना कर दिया था। लेकिन साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने कानून में बदलाव को संसद का अधिकार बता कर मामले में दखल देने से मना कर दिया। इसी कारण से 2009 में आया दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला निरस्त हो गया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में 5 समलैंगिक लोगों ने याचिका दाखिल कर मामले पर नए सिरे से सुनवाई की मांग की। इस साल जनवरी में कोर्ट ने इस मसले को संविधान पीठ में भेज दिया था।
इस बारे में एलजीबीटी समुदाय के लोगों का कहना था, “सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि निजता एक मौलिक अधिकार है, लेकिन समलैंगिक लोगों को ये अधिकार हासिल नहीं है। वो अपनी प्राकृतिक जरूरत को पूरा करने में डरते हैं। उन्हें पुलिस और कानूनी कार्रवाई का डर सताता है। पुलिस समलैंगिकों को कानून की आड़ में परेशान करती है।“
एलजीबीटी समुदाय के साथ दे रहे लोगों का कहना है, “पुलिस के डर से समलैंगिक सामने नहीं आते हैं इससे उनके बीच एड्स को लेकर जागरुकता फैलाना मुश्किल होता है। चूंकि ये कानून 150 साल पुराना है जो कि अंग्रेजों का बनाया हुआ है। उन्होंने उस ज़माने में इंग्लैण्ड में चल रही व्यवस्था के अनुसार समलैंगिकता के लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान किया था, लेकिन अब इसे खत्म करने की ज़रूरत है।“
बात करें सरकार के रूख की तो कुछ धार्मिक संगठनों ने धर्म और सामाजिक मान्यताओं का हवाला देते हुए याचिका का विरोध किया था। लेकिन केंद्र सरकार ने इस पूरे मसले पर कोई भी स्टैण्ड नहीं लिया था। सरकार ने कहा था कि वो इस मसले को कोर्ट के विवेक पर छोड़ती है। सरकार ने सिर्फ इतनी गुजारिश की थी कि कोर्ट अपनी सुनवाई दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने सम्बन्धों तक ही सीमित रखे, पूरी धारा 377 की वैधता पर सुनवाई न हो।
इधर, सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद समलैंगिक समाज में खुशी की लहर है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इस समाज से जुड़े लोगों ने इस पर अपनी खुशी जाहिर की है।
वहीं सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर का कहना है, “सेक्शन 377 पर जो वो पहले कहा करते थे उस पर माननीय जजों ने मुहर लगाई है। वो मानते थे कि समलैंगिक समाज के साथ भेदभाव होता रहा है। ये बात अच्छी है कि अब एलजीबीटी समुदाय की मांग को कानूनी मान्यता मिल गई है।“ वहीं अभिनेत्री स्वरा भास्कर का कहना है, “इस फैसले का दूरगामी असर पड़ेगा।“
सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसला का जहां पर उस समलैंगिक समुदाय के लोग स्वागत कर रहे हैं, तो वहीं हो सकता है कि आने वाले समय में इसका विरोध धार्मिक संगठन करें। क्योंकि भारतीय समाज में समलैंगिकता को स्वीकार्य नहीं किया जाता है। ऐसे में देखना होगा कि समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद क्या प्रतिक्रिया समाज के दूसरे वर्ग से आती है।
SEP 06 (WTN) – आज भारत की सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है जिसकी चर्चा सालों तक होती रहेगी। भारत के उच्चतम न्यायालय के 5 जजों की संवैधानिक पीठ ने समलैंगिक सम्बन्धों को अपराध मानने वाली धारा 377 पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि एकांत में सहमति से बने समलैंगिक सेक्स सम्बन्ध अपराध की श्रेणी में नहीं आते हैं। हालांकि, धारा 377 के अंतर्गत पशु से सम्भोग अभी भी अपराध बना रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा, “हर किसी को अपनी ज़िन्दगी अपनी मर्ज़ी से जीने का अधिकार है।“ अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ''हर व्यक्ति को गरिमा से जीने का हक है, सेक्सुअल रुझान प्राकृतिक है। इस आधार पर भेदभाव नहीं हो सकता है। हर व्यक्ति को गरिमा से जीने का हक है। सेक्सुअल रुझान प्राकृतिक है। इस आधार पर भेदभाव नहीं हो सकता है। निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है, और 377 इसका हनन करता है.''
अपने फैसले में मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ''देश में सबको समानता और सम्मान से जीने का अधिकार हासिल है। कुछ लोग समाज से बहिष्कार की स्थिति झेलते हैं। पहले हुई गलती को सुधारना ज़रूरी है। जो प्राकृतिक है उसको गलत कैसे ठहराया जा सकता है। समाज की सोच बदलने की ज़रूरत है। हमें कुछ पुरानी धारणाओं को अलविदा कहना होगा। बहुमतवाद से सभी काम नहीं चल सकते।''
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने आगे कहा, ''LGBT समुदाय को सभी मौलिक अधिकार हासिल हैं। किसी के साथ भेदभाव न हो ये देखना हमारी ज़िम्मेदारी है। अप्राकृतिक यौन सम्बन्धों को अपराध करार देना ग़लत।''
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आईपीसी की धारा 377 अप्राकृतिक यौन सम्बन्ध को अपराध मानती है। इसके तहत पशुओं के साथ ही नहीं, बल्कि दो व्यस्कों के बीच बने समलैंगिक सम्बन्ध को भी अप्राकृतिक कहा गया है। इसके लिए 10 साल तक की सज़ा का प्रावधान है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब धारा 377 दो व्यस्कों के सम्बन्ध पर लागू नहीं होगा।
इसके बारे में आपको विस्तार से बताएं तो दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2009 में दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से एकांत में बने समलैंगिक सम्बन्ध को अपराध मानने से मना कर दिया था। लेकिन साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने कानून में बदलाव को संसद का अधिकार बता कर मामले में दखल देने से मना कर दिया। इसी कारण से 2009 में आया दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला निरस्त हो गया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में 5 समलैंगिक लोगों ने याचिका दाखिल कर मामले पर नए सिरे से सुनवाई की मांग की। इस साल जनवरी में कोर्ट ने इस मसले को संविधान पीठ में भेज दिया था।
इस बारे में एलजीबीटी समुदाय के लोगों का कहना था, “सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि निजता एक मौलिक अधिकार है, लेकिन समलैंगिक लोगों को ये अधिकार हासिल नहीं है। वो अपनी प्राकृतिक जरूरत को पूरा करने में डरते हैं। उन्हें पुलिस और कानूनी कार्रवाई का डर सताता है। पुलिस समलैंगिकों को कानून की आड़ में परेशान करती है।“
एलजीबीटी समुदाय के साथ दे रहे लोगों का कहना है, “पुलिस के डर से समलैंगिक सामने नहीं आते हैं इससे उनके बीच एड्स को लेकर जागरुकता फैलाना मुश्किल होता है। चूंकि ये कानून 150 साल पुराना है जो कि अंग्रेजों का बनाया हुआ है। उन्होंने उस ज़माने में इंग्लैण्ड में चल रही व्यवस्था के अनुसार समलैंगिकता के लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान किया था, लेकिन अब इसे खत्म करने की ज़रूरत है।“
बात करें सरकार के रूख की तो कुछ धार्मिक संगठनों ने धर्म और सामाजिक मान्यताओं का हवाला देते हुए याचिका का विरोध किया था। लेकिन केंद्र सरकार ने इस पूरे मसले पर कोई भी स्टैण्ड नहीं लिया था। सरकार ने कहा था कि वो इस मसले को कोर्ट के विवेक पर छोड़ती है। सरकार ने सिर्फ इतनी गुजारिश की थी कि कोर्ट अपनी सुनवाई दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने सम्बन्धों तक ही सीमित रखे, पूरी धारा 377 की वैधता पर सुनवाई न हो।
इधर, सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद समलैंगिक समाज में खुशी की लहर है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इस समाज से जुड़े लोगों ने इस पर अपनी खुशी जाहिर की है।
वहीं सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर का कहना है, “सेक्शन 377 पर जो वो पहले कहा करते थे उस पर माननीय जजों ने मुहर लगाई है। वो मानते थे कि समलैंगिक समाज के साथ भेदभाव होता रहा है। ये बात अच्छी है कि अब एलजीबीटी समुदाय की मांग को कानूनी मान्यता मिल गई है।“ वहीं अभिनेत्री स्वरा भास्कर का कहना है, “इस फैसले का दूरगामी असर पड़ेगा।“
सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसला का जहां पर उस समलैंगिक समुदाय के लोग स्वागत कर रहे हैं, तो वहीं हो सकता है कि आने वाले समय में इसका विरोध धार्मिक संगठन करें। क्योंकि भारतीय समाज में समलैंगिकता को स्वीकार्य नहीं किया जाता है। ऐसे में देखना होगा कि समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद क्या प्रतिक्रिया समाज के दूसरे वर्ग से आती है।