BrahMos WORLD INDIA MADHYA PRADESH BHOPAL WTN SPECIAL GOSSIP CORNER RELIGION SPORTS BUSINESS FUN FACTS ENTERTAINMENT LIFESTYLE TRAVEL ART & LITERATURE SCIENCE & TECHNOLOGY HEALTH EDUCATION DIASPORA OPINION & INTERVIEW RECIPES DRINKS BIG MEMSAAB 2017 BUDGET 2017 FUNNY VIDEOS VIRAL ON WEB PICTURE STORIES Mahakal Ke Darshan
WTN HINDI ABOUT US PRIVACY POLICY SITEMAP CONTACT US
logo
Breaking News

भारत की बड़ी कूटनीतिक ‘हार’, चीन ने दी नेपाल को अपने बंदरगाहों के ‘इस्तेमाल’ की इजाज़त

Saturday - September 8, 2018 12:10 pm , Category : WTN HINDI

दक्षिण एशिया में भारत को ‘अकेला’ करने की चीन की ‘रणनीति’

SEP 08 (WTN) - भारत को अपनी विवेकहीन विदेश नीति का ख़ामियाज़ा एक बार फिर से भुगतना पड़ा है। कभी भारत के सबसे क़रीबी देशों में एक रहा नेपाल अब चीन के इतने क़रीब जा चुका है कि अब चीन ने उसे अपने बंदरगाह उपयोग करने की इजाज़त दे दी है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि फिलहाल नेपाल ज़रूरी वस्तुओं और ईंधन के आयात के लिए काफी हद तक भारत पर निर्भर है। दूसरे देशों से व्यापार करने के लिए नेपाल भारत के बंदरगाहों का इस्तेमाल करता है।
 
चीन अपनी विस्तारवादी नीति के तहत पूरी कोशिश करता है कि भारत को किसी ना किसी तरह से घेरा जा सके। पाकिस्तान के बाद अब नेपाल पर चीन की नज़र है। भारत को अलग-थलग करने के लिए चीन ने नेपाल को सहूलियतें देकर उसे अपनी तरफ़ करने की एक बड़ी चाल चली है।
 
नेपाल को भारत से दूर करने की कोशिश में चीन, उसे अपने चार बंदरगाहों के इस्तेमाल की इजाज़त देगा। चीन के इस कदम के साफ़ संकेत है कि वो भारत और नेपाल के प्राचीन सम्बन्धों को ख़त्म करना चाहता है और वहां की राजनीति और व्यापार में अपनी घुसपैठ बढ़ाना चाहता है।
 
इस पूरे प्रकरण पर गौर करें तो इसके पीछे नेपाल की अपनी रणनीति और मजबूरी भी है। नेपाल चारों तरफ़ से ज़मीन से घिरा हुआ देश है और उसके पास कोई बंदरगाह नहीं है जिसके कारण उसे ईंधन समेत बाकी सामान के आयात के लिए बहुत कुछ भारत पर निर्भर रहना पड़ता है। साल 2015 और 2016 में भारत ने कई महीनों तक नेपाल को तेल की आपूर्ति रोक दी थी, इसके कारण भारत और नेपाल दोनों ही देशों के सम्बन्धों में तनाव बढ़ गया था।
 
आगे भविष्य में ऐसी कोई भी परेशानी का सामना ना करने पड़े, इसलिए नेपाल ने भारत के बंदरगाहों पर निर्भरता कम करते हुए चीन के बंदरगाहों को प्राथमिकता देने का फ़ैसला लिया है। चीन और नेपाल के बीच हुए समझौते के तहत नेपाल, चीन के शेनजेन, लियानयुगांग, झाजियांग और तियानजिन बंदरगाह का इस्तेमाल कर सकेगा।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि तियानजिन बंदरगाह नेपाल की सीमा से सबसे नज़दीकी बंदरगाह है, जिसकी दूरी नेपाल से क़रीब 3,000 किलोमीटर है। इतना ही नहीं, चीन ने लंझाऊ, ल्हासा और शिगाट्स लैंड पोर्ट (ड्राई पोर्ट्स) के इस्तेमाल की भी इजाज़त नेपाल को दे दी है।
 
नेपाल भारतीय बंदरगाहों पर निर्भरता धीरेःधीरे कम करना चाह रहा था, जिसका फ़ायदा चीन ने उठाया है। इस समझौते में नेपाल और चीन दोनों ही देशों का फ़ायदा है। समझौते के तहत, चीनी अधिकारी तिब्बत में शिगाट्स के रास्ते सामान लेकर नेपाल जा रहे ट्रकों को परमिट देंगे।
 
चीन एक बार फिर से भारत को घेरने में सफ़ल हो गया है। चीन ने पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और मालदीप के ज़रिये भारत को घेरने का जो प्लान बनाया है, उसी की रणनीति के तहत वो काम करता जा रहा है। जिसके तहत इन सभी देशों को चीन ने कर्ज़े के जाल में फंसा लिया है।
 
कहा जा रहा है कि चीन, भारत के पड़ोसी देशों के साथ भारत के व्यापारिक सम्बन्धों को धीरे-धीरे ख़त्म करने की बहुत बड़ी रणनीति पर काम कर रहा है। यदि समय रहते भारत ने अपनी विदेश नीति पर ध्यान नहीं दिया, तो भारत दक्षिण एशिया में अकेला पड़ जाएगा और इसका बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान भारत को होगा।

भारत सरकार को अपनी विदेश नीति में काफ़ी परिवर्तन करने की ज़रूरत है। नेपाल से सबसे पास बंदरगाह कोलकाता है, जिसकी दूरी 774 किलोमीटर है, लेकिन नेपाल ने कोलकाता के बजाय चीन के तियानजिन बंदरगाह को तरज़ीह दी है जो कि नेपाल से क़रीब 3,300 किलोमीटर दूर है। नेपाल आर्थिक रूप से इतना सशक्त देश नहीं है कि वो चार गुना दूरी का खर्च उठा सके। साफ़ है कि चीन उसकी पूरी सहायता कर रहा है। धीरे-धीरे चीन अपनी रणनीति में सफ़ल हो रहा है, और पाकिस्तान के बाद नेपाल अब जल्द ही उसकी एक ‘कॉलोनी’ बन जाएगा
 
Leave a Comment
* Name
* Email (will not be published)
*
* - Required fields