मोदी करेंगे देश के आर्थिक हालात पर 'महामंथन', महंगाई से बढ़ी चिंता
Thursday - September 13, 2018 2:45 pm ,
Category : WTN HINDI
प्रधानमंत्री मोदी बढ़ती महंगाई से परेशान, ले सकते हैं कोई बड़ा फैसला
गिरते रुपये और महंगे तेल से प्रधानमंत्री मोदी चिंतित
SEP 13 (WTN) – डॉलर के मुक़ाबले लगातार कमज़ोर होते रुपये, और महंगे होते पेट्रोल-डीज़ल ने प्रधाममंत्री नरेन्द्र मोदी को चिंता में डाल दिया है। अब जबकि साल के आखिरी में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, तो वही अगले साल लोकसभा चुनाव हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि आखिर कैसे कमज़ोर होते रुपये को थामा जाए, और किस तरह से जनता को पेट्रोल-डीज़ल सस्ता मुहैया कराया जाए।
मोदी जानते हैं कि यदि अभी से बिगड़ती स्थितियों पर काबू नहीं पाया गया तो आने वाले दिनों में हालत अभी भी खराब हो सकती है। इसी कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को देश के आर्थिक हालत की समीक्षा करेंगे। गिरते रुपये और पेट्रोल- डीज़ल के बढ़ते दामों के बीच यह बैठक काफ़ी महत्वपूर्ण है।
मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक, इस बैठक में डॉलर के मुकाबले कमज़ोर होते रुपए और कच्चे तेल की बढ़ती कीमत पर चर्चा होगी। कहा जा रहा है कि इस बैठक में इस पर चर्चा और समीक्षा की जाएगी कि क्या सरकार को अब इसमें दखल देना चाहिए कि नहीं।
सबसे पहले बात करते हैं लगातार कमज़ोर होते रुपये की। रुपये इस समय अपने ऐतिहासिक निम्नतम स्तर पर है। अर्थशास्त्र के जानकारों के मुताबिक रुपए की गिरावट को रोकने के लिए ब्याज दरों में वृद्धि हो सकती है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस साल अभी तक रुपये में क़रीब 12.3 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है। यदि रुपया कमज़ोर होता चला गया तो इसका काफ़ी विपरित प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
यदि रुपया कमज़ोर होगा तो कच्चे तेल का आयात महंगा होगा, यदि कच्चे तेल का आयात महंगा होगा तो स्वाभाविक है कि पेट्रोल-डीज़ल के दामों में वृद्धि होगी। यदि ऐसा होगा तो इससे महंगाई और भी बढ़ेगी। गिरते रुपये के कारण सोना भी धीरे-धीरे महंगा होता जा रहा है। वहीं कई कंज्यूमर ड्यूरेबल कम्पनियों ने भी फ्रिज़, टीवी और वॉशिंग मशीन जैसे प्रोडक्ट के दाम बढ़ाने की भी तैयारी कर ली है। ऐसे में यदि सभी तरफ़ से महंगाई बढ़ेगी तो मोदी सरकार को जनता के सामने जवाब देना मुश्किल हो जाएगा।
वहीं इस बैठक में पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाने के मुद्दे पर चर्चा और समीक्षा हो सकती है। पेट्रोल के 90 रुपये प्रति लीटर होने के बाद विपक्ष समेत देश की जनता की मांग है कि पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाया जाए। लोगों की मांग है कि इसके लिए जीएसटी में एक नया रेट स्लैब बनाया जाए, और यदि उसे 40 प्रतिशत के स्तर पर भी रखा जाता है तो भी अभी जिस दर से पेट्रोल-डीज़ल बिक रहा है उससे तो सस्ता ही मिलेगा।
वहीं यदि जीएसटी में पेट्रोल-डीज़ल को नहीं लाया जाता है, तो बाकि अन्य क्या विकल्प हैं जिसके द्वारा ईंधन को सस्ता किया जा सके। क्योंकि चुनावी साल में प्रधानमंत्री मोदी पेट्रोल-डीज़ल के दाम को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार पर नहीं छोड़ सकते हैं। अब देखना होगा कि चुनावी रणनीति में माहिर मोदी अर्थव्यवस्था के इस कठिन दौर में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए क्या फ़ैसला लेते हैं।
यदि समय रहते प्रधानमंत्री मोदी ने इस तरफ़ ध्यान नहीं दिया तो आने वाले समय में विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव में जीत भाजपा के लिए कहीं सपना ही ना रह जाए। क्योंकि जिस तरह से एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के बाद सवर्ण और पिछड़ा वर्ग नाराज़ है, उसे भाजपा को सीरियसली लेना चाहिए। यही वो वोट बैंक है जो भाजपा का परम्परागत वोट बैंक रहा है, और विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने इसे नाराज़ नहीं करना चाहिए।
SEP 13 (WTN) – डॉलर के मुक़ाबले लगातार कमज़ोर होते रुपये, और महंगे होते पेट्रोल-डीज़ल ने प्रधाममंत्री नरेन्द्र मोदी को चिंता में डाल दिया है। अब जबकि साल के आखिरी में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, तो वही अगले साल लोकसभा चुनाव हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि आखिर कैसे कमज़ोर होते रुपये को थामा जाए, और किस तरह से जनता को पेट्रोल-डीज़ल सस्ता मुहैया कराया जाए।
मोदी जानते हैं कि यदि अभी से बिगड़ती स्थितियों पर काबू नहीं पाया गया तो आने वाले दिनों में हालत अभी भी खराब हो सकती है। इसी कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को देश के आर्थिक हालत की समीक्षा करेंगे। गिरते रुपये और पेट्रोल- डीज़ल के बढ़ते दामों के बीच यह बैठक काफ़ी महत्वपूर्ण है।
मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक, इस बैठक में डॉलर के मुकाबले कमज़ोर होते रुपए और कच्चे तेल की बढ़ती कीमत पर चर्चा होगी। कहा जा रहा है कि इस बैठक में इस पर चर्चा और समीक्षा की जाएगी कि क्या सरकार को अब इसमें दखल देना चाहिए कि नहीं।
सबसे पहले बात करते हैं लगातार कमज़ोर होते रुपये की। रुपये इस समय अपने ऐतिहासिक निम्नतम स्तर पर है। अर्थशास्त्र के जानकारों के मुताबिक रुपए की गिरावट को रोकने के लिए ब्याज दरों में वृद्धि हो सकती है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस साल अभी तक रुपये में क़रीब 12.3 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है। यदि रुपया कमज़ोर होता चला गया तो इसका काफ़ी विपरित प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
यदि रुपया कमज़ोर होगा तो कच्चे तेल का आयात महंगा होगा, यदि कच्चे तेल का आयात महंगा होगा तो स्वाभाविक है कि पेट्रोल-डीज़ल के दामों में वृद्धि होगी। यदि ऐसा होगा तो इससे महंगाई और भी बढ़ेगी। गिरते रुपये के कारण सोना भी धीरे-धीरे महंगा होता जा रहा है। वहीं कई कंज्यूमर ड्यूरेबल कम्पनियों ने भी फ्रिज़, टीवी और वॉशिंग मशीन जैसे प्रोडक्ट के दाम बढ़ाने की भी तैयारी कर ली है। ऐसे में यदि सभी तरफ़ से महंगाई बढ़ेगी तो मोदी सरकार को जनता के सामने जवाब देना मुश्किल हो जाएगा।
वहीं इस बैठक में पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाने के मुद्दे पर चर्चा और समीक्षा हो सकती है। पेट्रोल के 90 रुपये प्रति लीटर होने के बाद विपक्ष समेत देश की जनता की मांग है कि पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाया जाए। लोगों की मांग है कि इसके लिए जीएसटी में एक नया रेट स्लैब बनाया जाए, और यदि उसे 40 प्रतिशत के स्तर पर भी रखा जाता है तो भी अभी जिस दर से पेट्रोल-डीज़ल बिक रहा है उससे तो सस्ता ही मिलेगा।
वहीं यदि जीएसटी में पेट्रोल-डीज़ल को नहीं लाया जाता है, तो बाकि अन्य क्या विकल्प हैं जिसके द्वारा ईंधन को सस्ता किया जा सके। क्योंकि चुनावी साल में प्रधानमंत्री मोदी पेट्रोल-डीज़ल के दाम को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार पर नहीं छोड़ सकते हैं। अब देखना होगा कि चुनावी रणनीति में माहिर मोदी अर्थव्यवस्था के इस कठिन दौर में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए क्या फ़ैसला लेते हैं।
यदि समय रहते प्रधानमंत्री मोदी ने इस तरफ़ ध्यान नहीं दिया तो आने वाले समय में विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव में जीत भाजपा के लिए कहीं सपना ही ना रह जाए। क्योंकि जिस तरह से एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के बाद सवर्ण और पिछड़ा वर्ग नाराज़ है, उसे भाजपा को सीरियसली लेना चाहिए। यही वो वोट बैंक है जो भाजपा का परम्परागत वोट बैंक रहा है, और विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने इसे नाराज़ नहीं करना चाहिए।