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राफेल पर एक के बाद एक हो रहे ‘खुलासों’ से आया ‘सियासी तूफान’

Saturday - September 22, 2018 1:07 pm , Category : WTN HINDI
फ्रांस्वा ओलांद के बाद दसॉ एविएशन के बयान से चढ़ा ‘सियासी’ पारा
फ्रांस्वा ओलांद के बाद दसॉ एविएशन के बयान से चढ़ा ‘सियासी’ पारा

राफेल पर नये खुलासे के बाद राहुल गांधी ने साधा नरेन्द्र मोदी पर ‘निशाना’, कहा प्रधानमंत्री ने दिया देश को ‘धोखा’
 
SEP 22 (WTN) – राफेल पर हो रही राजनीति थमने का नाम नहीं ले रही है। एक के बाद एक स्पष्टीकरण राफेल डील पर फ्रांस की तरफ़ से आ रहे हैं, जिसके बाद भारतीय राजनीति में भी बयानों का सिलसिला जारी है। आइये आपको अभी तक के बयानों और उसके बाद की सियासी हलचलों के बारे में विस्तार से बताते हैं।
 
ताज़ा घटनाक्रम में फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के बयान के बाद, अब फ्रांस की वर्तमान सरकार ने कहा है कि वह राफेल फाइटर जेट डील के लिए भारतीय औद्योगिक भागीदारों को चुनने में किसी भी तरह से शामिल नहीं थी। फ्रांस सरकार ने साफ़ किया है कि फ्रांसीसी कम्पनियों को करार करने के लिए भारतीय कम्पनियों का चयन करने की पूरी आज़ादी है।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इससे पहले मीडिया में ख़बर आई थी कि फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने कहा है कि राफेल डील के लिए भारत सरकार की ओर से अनिल अम्बानी की कम्पनी रिलायंस का नाम प्रस्तावित किया गया था और दसॉ एविएशन कम्पनी के पास कोई और विकल्प नहीं था।
 
जैसे ही ओलांद का यह बयान भारत में आया, इसके बाद भारत में राफेल पर चल रही राजनीति फिर से गर्मा गई। ओलांद के बयान के बयान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर जमकर हमला बोला। राहुल गांधी ने ट्वीट के ज़रिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर काफ़ी तीखे प्रहार किये और उन्हें ‘धोखेबाज़’ तक कह दिया।
 
अपने ट्वीट में राहुल गांधी ने लिखा, “प्रधानमंत्री ने बंद दरवाजे के पीछे निजी तौर पर राफेल डील पर बात की और इसमें बदलाव कराया। फ्रांस्वा ओलांद को धन्यवाद। हम अब जानते हैं कि उन्होंने दिवालिया हो चुके अनिल अम्बानी के लिए बिलियन डॉलर्स की डील कराई। प्रधानमंत्री ने देश को धोखा दिया है। उन्होंने हमारे सैनिकों की शहादत का अपमान किया है।“
 
अब बात करते हैं फ्रांसीसी एविएशन कम्पनी दसॉ की। तो दसॉ ने राफेल सौदे पर रिलायंस समूह और भारत सरकार के रुख की ‘पुष्टि’ की है। इस डील के बारे में कम्पनी का कहना है कि उसने ‘खुद’ ही इस सौदे के लिए भारत की कम्पनी रिलांयस को ‘चुना’ है। एक बयान जारी कर कम्पनी ने कहा है कि रिलायंस समूह को रक्षा प्रक्रिया 2016 नियमों के अनुसार चुना गया है।
 
दसॉ एविएशन ने स्थिति का साफ़ करते हुए कहा है, राफेल का सौदा भारत और फ्रांस सरकार के बीच एक अलग तरह का अनुबंध था,  इसमें दसॉ एविएशन को ख़रीद मूल्य का 50 प्रतिशत निवेश भारत में करना था यानि कि तय नियमों के अनुसार निर्धारित राफेल फाइटर जेट भारत में बनाने थे। इसमें मेक इन इण्डिया की नीति के अनुसार दसॉ एविएशन ने भारतीय कम्पनी रिलायंस समूह के साथ साझेदारी करने का फैसला किया और यह दसॉ एविएशन की ‘पसंद’ थी। इस साझेदारी ने फरवरी 2017 में दसॉ रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड (डीआरएएल) नाम के संयुक्त उद्यम के निर्माण की शुरुआत की थी।
 
फ्रांसीसी विमानन कम्पनी दसॉ का कहना है कि उनसे और रिलायंस ने फाल्कन और राफेल विमान के निर्माण के लिए नागपुर में एक प्लांट स्थापित किया है। नागपुर को इसलिए चुना गया है क्योंकि यहां पर हवाई अड्डे से रनवे तक पहुंचने के लिए सीधा रास्ता है और पर्याप्त ज़मीन उपलब्ध है।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दसअसल यह नया विवाद फ्रेंच न्यूज़ वेबसाइट मीडियापार्ट में शुक्रवार को छपे एक लेख के बाद हुआ है। फ्रेंच भाषा में छपे इस लेख में फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के हवाले से कहा गया है कि अनिल अंबानी की कम्पनी रिलायंस के साथ करार करने में फ्रांस सरकार की कोई भूमिका नहीं थी और राफेल डील के लिए भारत सरकार ने अनिल अंबानी की रिलायंस कम्पनी का नाम प्रस्तावित किया था लिहाजा दसॉ एविएशन कम्पनी के पास कोई और विकल्प नहीं था।
 
अब देखना होगा कि इस नये विवाद में मोदी सरकार का क्या बयान सामने आता है। फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रास्वां ओलांद और एविएशन कम्पनी दसॉ के अपने-अपने दावे हैं। अब मोदी सरकार को भारत की जनता के सामने स्थिति साफ़ करना चाहिए कि क्या अनिल अम्बानी की कम्पनी का नाम मोदी सरकार ने ही प्रस्तावित किया था या नहीं।
 
यदि नाम प्रस्तावित नहीं किया था तो फिर एविएशन क्षेत्र की सार्वजनिक कम्पनी हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को क्यों नहीं इसमें शामिल किया गया। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने राफेल फाइटर जेट के बारे में कहा था कि हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के पास राफेल को बनाने की क्षमता नहीं है। जबकि एचएएल के पूर्व चीफ़ टीएस राजू का साफ़ कहना है कि जब वे चौथी पीढ़ी के 25 टन वजनी सुखोई-30 लड़ाकू विमान को बना सकते हैं तो फिर राफेल को क्यों नहीं बना सकते थे।
 
यदि समय रहते मोदी सरकार ने राफेल मुद्दे पर पूरी स्थिति साफ़ नहीं की तो आने वाले विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव में भाजपा को जनता के गुस्से का सामना करना पड़ सकता है। बोफोर्स विवाद के बाद 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था। ऐसे में यदि देश की जनता को समय रहते राफेल डील पर मोदी सरकार ने पूरी स्थिति साफ़ नहीं कि तो भाजपा का हाल भी कांग्रेस की तरह हो सकता है।
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