इस्माइल फ़ारूक़ी केस में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला, “मस्जिद में नमाज़ पढ़ना नहीं है इस्लाम का हिस्सा”
Thursday - September 27, 2018 4:14 pm ,
Category : WTN HINDI
इस्माइल फ़ारुक़ी केस को आगे ऊंची पीठ को नहीं भेजा जाएगा: सुप्रीम कोर्ट
29 अक्टूबर से मेरिट के आधार पर होगी अयोध्या टाइटल सूट की सुनवाई
SEP 27 (WTN) – 29 अक्टूबर से अब अयोध्या टाइटल सूट की सुनवाई मेरिट के आधार पर होगी। आज सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फ़ैसले का बरक़रार रखते हुए कहा कि नमाज़ पढ़ना मस्जिद का अभिन्न हिस्सा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने बहुमत के फ़ैसले में कहा कि इस्माइल फ़ारूक़ी केस में उसके फ़ैसले को वृहद पीठ के समक्ष नहीं भेजा जाएगा। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा और जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि यह केस राम मंदिर और बाबरी मस्जिद मामले से अलग है और मुख्य मामले पर इसका कोई असर नहीं होगा।
इस्माइल फ़ारूक़ी केस में फैसला पढ़ते हुए जस्टिस अशोक भूषण ने कहा, “इस मुद्दे पर दो विचार हैं, पहला विचार जस्टिस भूषण और सीजेआई दीपक मिश्रा का है, जबकि दूसरा विचार जस्टिस नज़ीर का है।“ जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि सभी धर्मों और धार्मिक स्थलों का बराबर सम्मान होना चाहिये। जस्टिस अशोक भूषण ने आगे कहा “सर्वधर्म संभाव ही इस देश की बुनियाद है। लेकिन इसके साथ ही इस देश में क़ानून का राज है। क़ानून की नज़र में मंदिर, मस्जिद और चर्च एक हैं। किसी भी धार्मिक संस्था की ज़मीन का अधिग्रहण किया जा सकता है।“
आइये आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आखिर क्या है 24 साल पुराना इस्माइल फ़ारुख़ी केस। अयोध्या में कारसेवकों ने 6 दिसम्बर, 1992 के दिन विवादित ढांचे को गिरा दिया था। मुस्लिमों का कहना है कि गिराया गया विवादित ढांचा मस्जिद थी, और कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद को गिरा दिया था।
इसके बाद केंद्र सरकार ने 7 जनवरी, 1993 को अध्यादेश लाकर अयोध्या में 67 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण कर लिया था। इसमें विवादित ज़मीन का 120x80 फिट हिस्सा भी अधिग्रहित कर लिया गया था जिसे बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि परिसर कहा जाता है।
केंद्र सरकार के इसी फ़ैसले को इस्माइल फ़ारूक़ी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए अपनी याचिका में कहा था कि धार्मिक स्थल का सरकार कैसे अधिग्रहण कर सकती है। इस पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा था कि मस्जिद में नमाज़ पढ़ना इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले पर मुस्लिम समुदाय सहमत नहीं था। वे चाहते थे कि सुप्रीम कोर्ट अपने फ़ैसले पर दोबारा विचार करें। मुस्लिम समुदाय यह भी चाहता था कि अयोध्या में विवादित ज़मीन के मालिकाना हक़ से जुड़े केस में फ़ैसले से पहले 1994 के इस्माइल फ़ारूक़ी मामले पर आए फ़ैसले पर नए सिरे से विचार हो।
लेकिन आज अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि मस्जिद में नमाज़ के मुद्दे को संविधान पीठ को नहीं भेजा जाएगा। 1994 में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने इस्माइल फ़ारुक़ी केस में फ़ैसला दिया था कि मस्जिद में नमाज़ पढ़ना इस्लाम का हिस्सा नहीं है। अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि इस्माइल फ़ारूक़ी केस और रामजन्म भूमि बाबरी मस्जिद दोनों अलग-अलग केस हैं तो अब सभी की निगाहें इसी पर टिकी हैं कि आख़िर अयोध्या टाइटल सूट पर फ़ैसला कब तक आता है।
SEP 27 (WTN) – 29 अक्टूबर से अब अयोध्या टाइटल सूट की सुनवाई मेरिट के आधार पर होगी। आज सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फ़ैसले का बरक़रार रखते हुए कहा कि नमाज़ पढ़ना मस्जिद का अभिन्न हिस्सा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने बहुमत के फ़ैसले में कहा कि इस्माइल फ़ारूक़ी केस में उसके फ़ैसले को वृहद पीठ के समक्ष नहीं भेजा जाएगा। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा और जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि यह केस राम मंदिर और बाबरी मस्जिद मामले से अलग है और मुख्य मामले पर इसका कोई असर नहीं होगा।
इस्माइल फ़ारूक़ी केस में फैसला पढ़ते हुए जस्टिस अशोक भूषण ने कहा, “इस मुद्दे पर दो विचार हैं, पहला विचार जस्टिस भूषण और सीजेआई दीपक मिश्रा का है, जबकि दूसरा विचार जस्टिस नज़ीर का है।“ जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि सभी धर्मों और धार्मिक स्थलों का बराबर सम्मान होना चाहिये। जस्टिस अशोक भूषण ने आगे कहा “सर्वधर्म संभाव ही इस देश की बुनियाद है। लेकिन इसके साथ ही इस देश में क़ानून का राज है। क़ानून की नज़र में मंदिर, मस्जिद और चर्च एक हैं। किसी भी धार्मिक संस्था की ज़मीन का अधिग्रहण किया जा सकता है।“
आइये आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आखिर क्या है 24 साल पुराना इस्माइल फ़ारुख़ी केस। अयोध्या में कारसेवकों ने 6 दिसम्बर, 1992 के दिन विवादित ढांचे को गिरा दिया था। मुस्लिमों का कहना है कि गिराया गया विवादित ढांचा मस्जिद थी, और कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद को गिरा दिया था।
इसके बाद केंद्र सरकार ने 7 जनवरी, 1993 को अध्यादेश लाकर अयोध्या में 67 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण कर लिया था। इसमें विवादित ज़मीन का 120x80 फिट हिस्सा भी अधिग्रहित कर लिया गया था जिसे बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि परिसर कहा जाता है।
केंद्र सरकार के इसी फ़ैसले को इस्माइल फ़ारूक़ी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए अपनी याचिका में कहा था कि धार्मिक स्थल का सरकार कैसे अधिग्रहण कर सकती है। इस पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा था कि मस्जिद में नमाज़ पढ़ना इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले पर मुस्लिम समुदाय सहमत नहीं था। वे चाहते थे कि सुप्रीम कोर्ट अपने फ़ैसले पर दोबारा विचार करें। मुस्लिम समुदाय यह भी चाहता था कि अयोध्या में विवादित ज़मीन के मालिकाना हक़ से जुड़े केस में फ़ैसले से पहले 1994 के इस्माइल फ़ारूक़ी मामले पर आए फ़ैसले पर नए सिरे से विचार हो।
लेकिन आज अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि मस्जिद में नमाज़ के मुद्दे को संविधान पीठ को नहीं भेजा जाएगा। 1994 में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने इस्माइल फ़ारुक़ी केस में फ़ैसला दिया था कि मस्जिद में नमाज़ पढ़ना इस्लाम का हिस्सा नहीं है। अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि इस्माइल फ़ारूक़ी केस और रामजन्म भूमि बाबरी मस्जिद दोनों अलग-अलग केस हैं तो अब सभी की निगाहें इसी पर टिकी हैं कि आख़िर अयोध्या टाइटल सूट पर फ़ैसला कब तक आता है।