सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फ़ैसला: सभी उम्र की महिलाओं के लिए खुले सबरीमला मन्दिर के दरवाज़े
Friday - September 28, 2018 1:08 pm ,
Category : WTN HINDI
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ रिव्यू पेटिशेन दायर करेगा सबरीमला मन्दिर प्रबंधन
पांच में से चार न्यायाधीशों ने किया सबरीमला मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश का समर्थन, महिला न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा ने किया विरोध
SEP 28 (WTN) – सुप्रीम कोर्ट ने आज अपने एक ऐतिहासिक फ़ैसले में केरल स्थित सबरीमाला मन्दिर में महिलाओं की एंट्री पर लगी रोक को ख़त्म कर दिया है। देश की सबसे बड़ी अदालत में पांच जजों की बेंच ने 4-1 के मत से महिलाओं के पक्ष में फ़ैसला सुनाया। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि क़रीब 800 साल पुराने इस मन्दिर में ये मान्यता पिछले काफ़ी समय से चली आ रही थी कि कुछ निर्धारित उम्र की महिलाओं को मन्दिर में प्रवेश ना करने दिया जाए।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस चंद्रचूड़, जस्टिस नरीमन, जस्टिस खानविलकर ने महिलाओं के पक्ष में एक मत से फ़ैसला सुनाया। जबकि जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने सबरीमाला मन्दिर के पक्ष में फ़ैसला सुनाया। फ़ैसला पढ़ते हुए चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा, “आस्था के नाम पर लिंगभेद नहीं किया जा सकता है। क़ानून और समाज का काम सभी को बराबरी से देखने का है। महिलाओं के लिए दोहरा मापदण्ड उनके सम्मान को कम करता है।“ आगे चीफ़ जस्टिस ने कहा, भगवान अयप्पा के भक्तों को अलग-अलग धर्मों में नहीं बांट सकते हैं।“
अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “अनुच्छेद 25 के मुताबिक़ सभी बराबर हैं। समाज में बदलाव दिखना ज़रूरी है, व्यक्तित्व की गरिमा अलग बात है, लेकिन पहले महिलाओं पर पाबंदी उनको कमज़ोर मानकर लगाई गई थी।“
वहीं जस्टिस नरीमन ने अपना फ़ैसला पढ़ते हुए कहा, “महिलाओं को किसी भी स्तर से कमतर आंकना संविधान का उल्लंघन करना ही है।“
वहीं जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा, “महिलाओं को मन्दिर में प्रवेश करने से केवल इस आधार पर रोकना कि वे प्रजनन की अवस्था में हैं, यह उनके लिए 'अपमानजनक' है। उन्होंने आगे कहा, ”10-से 50 साल की महिलाओं को मन्दिर से बाहर रखना उनकी गरिमा से इनकार करना है।“
इधर, जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने इस मामले पर सबरीमाला मन्दिर के पक्ष में अपना फैसला पढ़ा। उन्होंने कहा, “धार्मिक आस्थाओं को आर्टिकल 14 के आधार पर नहीं मापा जा सकता है।“ आगे जस्टिस मल्होत्रा ने कहा, “आस्था से जुड़े मामले को समाज को ही तय करना चाहिए ना की कोर्ट को। सबरीमाला श्राइन के पास आर्टिकल 25 के तहत अधिकार है, इसलिए कोर्ट इन मामलों में दखल नहीं दे सकता है। धार्मिक मान्यताएं भी बुनियादी अधिकारों की ही हिस्सा हैं।“
इधर सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद सबरीमाला मन्दिर की ओर से याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि वह इस पर रिव्यू पेटिशेन दायर करेंगे।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि केरल के पत्थनमथिट्टा ज़िले के पश्चिमी घाट की पहाड़ी पर स्थित सबरीमाला मन्दिर प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 10 से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर इसलिए प्रतिबंध लगाया गया है क्योंकि मासिक धर्म के समय वे शुद्धता बनाए नहीं रख सकतीं।
महिलाओं के मन्दिर में प्रवेश पर पाबंदी के मामले में सबरीमला मन्दिर प्रशासन का कहना था कि मन्दिर में विराजमान भगवान अयप्पा को ब्रह्मचारी माना जाता है, इसलिए, ऐसा नियम बनाया गया है कि वहां पर महिलाएं प्रवेश ना करें। यह महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला नहीं है।
बात करें केरल सरकार की तो इस मामले में 7 नवम्बर, 2016 को केरल सरकार ने कोर्ट को सूचित किया था कि वह ऐतिहासिक सबरीमाला मन्दिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में है। शुरुआत में राज्य की तत्कालीन एलडीएफ सरकार ने साल 2007 में मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश की हिमायत की थी, बाद में जिसे कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकार ने बदल दिया था।
इस मामले में यूडीएफ सरकार का कहना था, वह 10 से 50 साल की महिलाओं का प्रवेश वर्जित करने के पक्ष में है, क्योंकि यह परपम्परा अति प्राचीन काल से चली आ रही है। लेकिन बाद में केरल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए एक बार फिर मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश पर सहमति जताई।
इस मामले में सुनवाई के दौरान मुख्य पुजारी के वकील ने कहा, "इस बात को लेकर स्पष्टता होनी चाहिए कि एक विशेष आयु वर्ग की महिलाओं को आने से मना करने की वजह भेदभाव नहीं है। दूसरी वजह यह है कि हिन्दू धर्म में मन्दिर में स्थापित देवता का दर्जा अलग है, हर देवता की अपनी एक अलग विशेषता है। जब भारत का क़ानून उन्हें जीवित व्यक्ति का दर्जा देता है, तो उनके भी मौलिक अधिकार हैं। भगवान अयप्पा को ब्रह्मचारी रहने का अधिकार है। उन्हें निजता का मौलिक अधिकार हासिल है।"
सबरीमला मन्दिर में प्रवेश के लिए हर उम्र की महिलाओं को इजाज़त मिलने के बाद देखना होगा कि क्या रुख़ सबरीमला मन्दिर प्रबंधन का रहता है। प्रबंधन का कहना है कि मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी की परम्परा पुरानी है। ऐसे में यह एक धार्मिक परम्परा है जिसका पालन होना चाहिए। अब जबकि कोर्ट का कहना है क़ानून के मुताबिक़ महिलाओं को भी मन्दिर में जाने का पुरुषों के समान अधिकार है, तो सबरीमला मन्दिर की धार्मिक परम्परा कहती है कि 10 से 50 आयु वर्ष की महिलाओं को मन्दिर में जाने की इजाज़त नहीं है। देखना होगा कि क़ानून और धार्मिक परम्परा की इस जंग में आखिर में किसकी जीत होती है।
SEP 28 (WTN) – सुप्रीम कोर्ट ने आज अपने एक ऐतिहासिक फ़ैसले में केरल स्थित सबरीमाला मन्दिर में महिलाओं की एंट्री पर लगी रोक को ख़त्म कर दिया है। देश की सबसे बड़ी अदालत में पांच जजों की बेंच ने 4-1 के मत से महिलाओं के पक्ष में फ़ैसला सुनाया। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि क़रीब 800 साल पुराने इस मन्दिर में ये मान्यता पिछले काफ़ी समय से चली आ रही थी कि कुछ निर्धारित उम्र की महिलाओं को मन्दिर में प्रवेश ना करने दिया जाए।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस चंद्रचूड़, जस्टिस नरीमन, जस्टिस खानविलकर ने महिलाओं के पक्ष में एक मत से फ़ैसला सुनाया। जबकि जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने सबरीमाला मन्दिर के पक्ष में फ़ैसला सुनाया। फ़ैसला पढ़ते हुए चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा, “आस्था के नाम पर लिंगभेद नहीं किया जा सकता है। क़ानून और समाज का काम सभी को बराबरी से देखने का है। महिलाओं के लिए दोहरा मापदण्ड उनके सम्मान को कम करता है।“ आगे चीफ़ जस्टिस ने कहा, भगवान अयप्पा के भक्तों को अलग-अलग धर्मों में नहीं बांट सकते हैं।“
अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “अनुच्छेद 25 के मुताबिक़ सभी बराबर हैं। समाज में बदलाव दिखना ज़रूरी है, व्यक्तित्व की गरिमा अलग बात है, लेकिन पहले महिलाओं पर पाबंदी उनको कमज़ोर मानकर लगाई गई थी।“
वहीं जस्टिस नरीमन ने अपना फ़ैसला पढ़ते हुए कहा, “महिलाओं को किसी भी स्तर से कमतर आंकना संविधान का उल्लंघन करना ही है।“
वहीं जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा, “महिलाओं को मन्दिर में प्रवेश करने से केवल इस आधार पर रोकना कि वे प्रजनन की अवस्था में हैं, यह उनके लिए 'अपमानजनक' है। उन्होंने आगे कहा, ”10-से 50 साल की महिलाओं को मन्दिर से बाहर रखना उनकी गरिमा से इनकार करना है।“
इधर, जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने इस मामले पर सबरीमाला मन्दिर के पक्ष में अपना फैसला पढ़ा। उन्होंने कहा, “धार्मिक आस्थाओं को आर्टिकल 14 के आधार पर नहीं मापा जा सकता है।“ आगे जस्टिस मल्होत्रा ने कहा, “आस्था से जुड़े मामले को समाज को ही तय करना चाहिए ना की कोर्ट को। सबरीमाला श्राइन के पास आर्टिकल 25 के तहत अधिकार है, इसलिए कोर्ट इन मामलों में दखल नहीं दे सकता है। धार्मिक मान्यताएं भी बुनियादी अधिकारों की ही हिस्सा हैं।“
इधर सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद सबरीमाला मन्दिर की ओर से याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि वह इस पर रिव्यू पेटिशेन दायर करेंगे।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि केरल के पत्थनमथिट्टा ज़िले के पश्चिमी घाट की पहाड़ी पर स्थित सबरीमाला मन्दिर प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 10 से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर इसलिए प्रतिबंध लगाया गया है क्योंकि मासिक धर्म के समय वे शुद्धता बनाए नहीं रख सकतीं।
महिलाओं के मन्दिर में प्रवेश पर पाबंदी के मामले में सबरीमला मन्दिर प्रशासन का कहना था कि मन्दिर में विराजमान भगवान अयप्पा को ब्रह्मचारी माना जाता है, इसलिए, ऐसा नियम बनाया गया है कि वहां पर महिलाएं प्रवेश ना करें। यह महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला नहीं है।
बात करें केरल सरकार की तो इस मामले में 7 नवम्बर, 2016 को केरल सरकार ने कोर्ट को सूचित किया था कि वह ऐतिहासिक सबरीमाला मन्दिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में है। शुरुआत में राज्य की तत्कालीन एलडीएफ सरकार ने साल 2007 में मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश की हिमायत की थी, बाद में जिसे कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकार ने बदल दिया था।
इस मामले में यूडीएफ सरकार का कहना था, वह 10 से 50 साल की महिलाओं का प्रवेश वर्जित करने के पक्ष में है, क्योंकि यह परपम्परा अति प्राचीन काल से चली आ रही है। लेकिन बाद में केरल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए एक बार फिर मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश पर सहमति जताई।
इस मामले में सुनवाई के दौरान मुख्य पुजारी के वकील ने कहा, "इस बात को लेकर स्पष्टता होनी चाहिए कि एक विशेष आयु वर्ग की महिलाओं को आने से मना करने की वजह भेदभाव नहीं है। दूसरी वजह यह है कि हिन्दू धर्म में मन्दिर में स्थापित देवता का दर्जा अलग है, हर देवता की अपनी एक अलग विशेषता है। जब भारत का क़ानून उन्हें जीवित व्यक्ति का दर्जा देता है, तो उनके भी मौलिक अधिकार हैं। भगवान अयप्पा को ब्रह्मचारी रहने का अधिकार है। उन्हें निजता का मौलिक अधिकार हासिल है।"
सबरीमला मन्दिर में प्रवेश के लिए हर उम्र की महिलाओं को इजाज़त मिलने के बाद देखना होगा कि क्या रुख़ सबरीमला मन्दिर प्रबंधन का रहता है। प्रबंधन का कहना है कि मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी की परम्परा पुरानी है। ऐसे में यह एक धार्मिक परम्परा है जिसका पालन होना चाहिए। अब जबकि कोर्ट का कहना है क़ानून के मुताबिक़ महिलाओं को भी मन्दिर में जाने का पुरुषों के समान अधिकार है, तो सबरीमला मन्दिर की धार्मिक परम्परा कहती है कि 10 से 50 आयु वर्ष की महिलाओं को मन्दिर में जाने की इजाज़त नहीं है। देखना होगा कि क़ानून और धार्मिक परम्परा की इस जंग में आखिर में किसकी जीत होती है।