विश्लेषण: क्या नाराज़गी के चलते मध्य प्रदेश में चुनाव प्रचार नहीं करेंगे दिग्विजय सिंह
Tuesday - October 16, 2018 1:18 pm ,
Category : WTN HINDI
मेरे भाषण देने से कांग्रेस के वोट कट जाते हैं – दिग्विजय सिंह
चुनाव प्रचार से दूरी: कोई ‘रणनीति’ या फ़िर ‘हक़ीकत’ से रूबरु हो गये हैं दिग्विजय सिंह
OCT 16 (WTN) – मध्य प्रदेश की राजनीति में दिग्विजय सिंह एक ऐसा नाम है जिसे ना तो कांग्रेस और ना ही भाजपा ‘नकार’ सकती है। 1993 से 2003 तक लगातार दस सालों तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह हमेशा से ही अपने बयानों के कारण ‘सुर्खियों’ में रहते हैं, या फ़िर कहा जा सकता है कि इनके बयानों के कारण कांग्रेस को कई बार ‘फजीयत’ का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस में ही दिग्विजय सिंह के विरोधियों का कहना है कि दिग्विजय सिंह के ‘खराब शासन’ के कारण ही कांग्रेस की साल 2003 में इतनी करारी हार हुई थी और दिग्विजय सिंह के शासन को याद करते ही मध्य प्रदेश का मतदाता कांग्रेस को वोट नहीं देता, जिसके कारण लगातार तीन बार कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है।
2003 में कांग्रेस के चुनाव हारने के बाद दिग्विजय सिंह ने दस सालों तक राजनीति से ‘संन्यास’ की घोषणा की थी, ‘संन्यास’ के बाद वे फ़िर से ‘सक्रिय’ हुए और इस बार कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में ‘जीत’ दिलाने के लिए बाक़ायदा ‘एकता यात्रा’ कर रहे हैं। लेकिन इसी बीच उन्होंने मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रचार से ‘दूरी’ बना ली है। इस बारे में दिग्विजय सिंह का कहना है, “जिसको टिकट मिले, चाहे दुश्मन को मिले पर जिताओ। और मेरा काम केवल एक, कोई प्रचार नहीं, कोई भाषण नहीं। मेरे भाषण देने से तो कांग्रेस के वोट कट जाते हैं, इसलिए मैं जाता नहीं।”
जैसा कि आप जानते हैं कि मध्य प्रदेश में 28 नवम्बर को विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग होना है। लगातार 15 सालों से सत्ता से दूर कांग्रेस इस बार चुनाव जीतने के लिए ‘पूरी ताक़त’ लगा रही है। लेकिन इस बीच दिग्विजय सिंह का यह कहना कि वे चुनाव प्रचार नहीं करेंगे क्योंकि उनके भाषण से कांग्रेस के वोट कट जाते हैं, यह अपने आप में ‘काफ़ी बड़ी’ बात है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी मध्य प्रदेश में रोड शो और रैलियां कर रहे हैं जिसमें कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया तो नज़र आते हैं, लेकिन दिग्विजय सिंह ‘नदारद’ रहते हैं। कहा जाता है कि राहुल गांधी एक सोची समझी ‘रणनीति’ के तहत ही दिग्विजय सिंह को अपने से दूर रखे हुए हैं। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की बसपा से गठबंधन की बातचीत चल ही रही थी कि बसपा अध्यक्ष मायावती ने गठबंधन ना होने के लिए दिग्विजय सिंह को ‘ज़िम्मेदार’ बता दिया, जिसके बाद कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन नो हो सका।
लेकिन बड़ा सवाल यही है कि आख़िर क्यों दिग्विजय सिंह ने चुनाव प्रचार से दूरी बना ली है? कहा जाता है कि दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच पुरानी ‘राजनीतिक प्रतिद्वंदिता’ है। दिग्विजय सिंह अपनी ‘स्वतंत्र’ राजनीति के लिए जाने जाते हैं और वे किसी के ‘दबाव’ में या फ़िर ‘नियंत्रण’ में राजनीति करने में विश्वास नहीं रखते हैं। चूंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह से काफ़ी जूनियर हैं, ऐसे में प्रदेश के दस सालों तक मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह उनके नियंत्रण में काम करने में खुद को असहज महसूस कर रहे होंगे।
चूंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष हैं, ऐसे में कहा जा रहा है कि उनके समर्थकों को काफ़ी तादात में टिकट मिल सकते हैं, इसी कारण हो सकता है कि दिग्विजय सिंह ने चुनाव प्रचार से ‘दूरी’ बनाकर रखी हो। कुछ दिनों पहले जब भोपाल में राहुल गांधी कार्यकर्ता सम्मेलन में आए थे तो उस दौरान दिग्विजय सिंह के कटआउट नहीं लगने पर उनके समर्थक ‘नाराज़’ हो गये थे। कहा जा रहा है कि दिग्विजय सिंह इस समय कई कारणों से कांग्रेस से ‘खफ़ा’ चल रहे हैं और इसलिए उन्होंने चुनाव प्रचार समेत भाषण देने से ‘परहेज़’ कर लिया है।
वैसे दिग्विजय सिंह का कहना भी सही है कि उनके भाषणों और बयानों से कांग्रेस पार्टी को नुकसान होता है। यानि कि यह कहा जा सकता है कि दिग्विजय सिंह को इस बात का एहसास हो गया है कि उनके भाषणों और बयानों के कारण कांग्रेस को नुकसान उठना पड़ा है। कई बार तो दिग्विजय सिंह के बयानों के कारण कांग्रेस पार्टी को ‘सफ़ाई’ देना पड़ी है कि ये उनके निजी बयान हैं पार्टी के नहीं। वैसे यदि दिग्विजय सिंह ने चुनाव प्रचार से दूरी बनाई है तो इसके पीछे ज़रूर कोई ना कोई उनकी ‘राजनीतिक चाल’ होगी, क्योंकि दिग्विजय कोई भी फ़ैसला काफ़ी सोच समझकर लेते हैं। अब देखते हैं कि दिग्विजय सिंह के चुनाव प्रचार ना करने से कांग्रेस को कितना फ़ायदा होता है, या फ़िर अंदर ही अंदर दिग्विजय सिंह ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए कोई ‘रणनीति’ पर काम कर रहे हों।
OCT 16 (WTN) – मध्य प्रदेश की राजनीति में दिग्विजय सिंह एक ऐसा नाम है जिसे ना तो कांग्रेस और ना ही भाजपा ‘नकार’ सकती है। 1993 से 2003 तक लगातार दस सालों तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह हमेशा से ही अपने बयानों के कारण ‘सुर्खियों’ में रहते हैं, या फ़िर कहा जा सकता है कि इनके बयानों के कारण कांग्रेस को कई बार ‘फजीयत’ का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस में ही दिग्विजय सिंह के विरोधियों का कहना है कि दिग्विजय सिंह के ‘खराब शासन’ के कारण ही कांग्रेस की साल 2003 में इतनी करारी हार हुई थी और दिग्विजय सिंह के शासन को याद करते ही मध्य प्रदेश का मतदाता कांग्रेस को वोट नहीं देता, जिसके कारण लगातार तीन बार कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है।
2003 में कांग्रेस के चुनाव हारने के बाद दिग्विजय सिंह ने दस सालों तक राजनीति से ‘संन्यास’ की घोषणा की थी, ‘संन्यास’ के बाद वे फ़िर से ‘सक्रिय’ हुए और इस बार कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में ‘जीत’ दिलाने के लिए बाक़ायदा ‘एकता यात्रा’ कर रहे हैं। लेकिन इसी बीच उन्होंने मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रचार से ‘दूरी’ बना ली है। इस बारे में दिग्विजय सिंह का कहना है, “जिसको टिकट मिले, चाहे दुश्मन को मिले पर जिताओ। और मेरा काम केवल एक, कोई प्रचार नहीं, कोई भाषण नहीं। मेरे भाषण देने से तो कांग्रेस के वोट कट जाते हैं, इसलिए मैं जाता नहीं।”
जैसा कि आप जानते हैं कि मध्य प्रदेश में 28 नवम्बर को विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग होना है। लगातार 15 सालों से सत्ता से दूर कांग्रेस इस बार चुनाव जीतने के लिए ‘पूरी ताक़त’ लगा रही है। लेकिन इस बीच दिग्विजय सिंह का यह कहना कि वे चुनाव प्रचार नहीं करेंगे क्योंकि उनके भाषण से कांग्रेस के वोट कट जाते हैं, यह अपने आप में ‘काफ़ी बड़ी’ बात है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी मध्य प्रदेश में रोड शो और रैलियां कर रहे हैं जिसमें कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया तो नज़र आते हैं, लेकिन दिग्विजय सिंह ‘नदारद’ रहते हैं। कहा जाता है कि राहुल गांधी एक सोची समझी ‘रणनीति’ के तहत ही दिग्विजय सिंह को अपने से दूर रखे हुए हैं। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की बसपा से गठबंधन की बातचीत चल ही रही थी कि बसपा अध्यक्ष मायावती ने गठबंधन ना होने के लिए दिग्विजय सिंह को ‘ज़िम्मेदार’ बता दिया, जिसके बाद कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन नो हो सका।
लेकिन बड़ा सवाल यही है कि आख़िर क्यों दिग्विजय सिंह ने चुनाव प्रचार से दूरी बना ली है? कहा जाता है कि दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच पुरानी ‘राजनीतिक प्रतिद्वंदिता’ है। दिग्विजय सिंह अपनी ‘स्वतंत्र’ राजनीति के लिए जाने जाते हैं और वे किसी के ‘दबाव’ में या फ़िर ‘नियंत्रण’ में राजनीति करने में विश्वास नहीं रखते हैं। चूंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह से काफ़ी जूनियर हैं, ऐसे में प्रदेश के दस सालों तक मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह उनके नियंत्रण में काम करने में खुद को असहज महसूस कर रहे होंगे।
चूंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष हैं, ऐसे में कहा जा रहा है कि उनके समर्थकों को काफ़ी तादात में टिकट मिल सकते हैं, इसी कारण हो सकता है कि दिग्विजय सिंह ने चुनाव प्रचार से ‘दूरी’ बनाकर रखी हो। कुछ दिनों पहले जब भोपाल में राहुल गांधी कार्यकर्ता सम्मेलन में आए थे तो उस दौरान दिग्विजय सिंह के कटआउट नहीं लगने पर उनके समर्थक ‘नाराज़’ हो गये थे। कहा जा रहा है कि दिग्विजय सिंह इस समय कई कारणों से कांग्रेस से ‘खफ़ा’ चल रहे हैं और इसलिए उन्होंने चुनाव प्रचार समेत भाषण देने से ‘परहेज़’ कर लिया है।
वैसे दिग्विजय सिंह का कहना भी सही है कि उनके भाषणों और बयानों से कांग्रेस पार्टी को नुकसान होता है। यानि कि यह कहा जा सकता है कि दिग्विजय सिंह को इस बात का एहसास हो गया है कि उनके भाषणों और बयानों के कारण कांग्रेस को नुकसान उठना पड़ा है। कई बार तो दिग्विजय सिंह के बयानों के कारण कांग्रेस पार्टी को ‘सफ़ाई’ देना पड़ी है कि ये उनके निजी बयान हैं पार्टी के नहीं। वैसे यदि दिग्विजय सिंह ने चुनाव प्रचार से दूरी बनाई है तो इसके पीछे ज़रूर कोई ना कोई उनकी ‘राजनीतिक चाल’ होगी, क्योंकि दिग्विजय कोई भी फ़ैसला काफ़ी सोच समझकर लेते हैं। अब देखते हैं कि दिग्विजय सिंह के चुनाव प्रचार ना करने से कांग्रेस को कितना फ़ायदा होता है, या फ़िर अंदर ही अंदर दिग्विजय सिंह ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए कोई ‘रणनीति’ पर काम कर रहे हों।