चीन में ‘सुनियोजित’ तरीक़े से हो रहा है उइगर मुस्लिमों पर ‘अत्याचार’
Wednesday - October 17, 2018 3:20 pm ,
Category : WTN HINDI
चीन में उइगर मुस्लिमों पर हो रहे ‘अत्याचार’ पर ‘ख़ामोश’ हैं मुस्लिम देश
उइगर मुस्लिमों पर ‘अत्याचार’ की इंतेहा, लोगों ने लगाया शरीर के अंग निकालने का ‘आरोप’
OCT 17 (WTN) – ‘अनुशासन’ के नाम पर लोकतंत्र का समर्थन कर रहे सैकड़ों विद्यार्थियों की ‘हत्यारी’ चीन की कम्युनिस्ट सरकार अपने यहां के तुर्क मूल के उइगर मुस्लिमों पर ‘जुल्म’ की इंतेहा कर रही है। अपनी ‘विस्तारवादी’ नीति के लिए कुख्यात चीन ने लाखों की तादात में इस समुदाय के लोगों को ‘नज़रबंदी कैम्प’ में डालकर रखा हुआ है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीन के शिनजियांग प्रांत से आने वाले उइगर मुस्लिम चीन की आबादी का एक बेहद छोटा सा हिस्सा हैं, लेकिन बजाय इनका ‘संरक्षण’ करने के चीन सरकार इन पर ‘दमन चक्र’ चला रही है।
मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, चीन ने उइगर मुस्लिमों पर हो रहे ‘अत्याचार’ को 'व्यावसायिक शिक्षा' का नाम दिया है। इसके पीछे चीन का ‘तर्क’ है कि वो इसके जरिए आतंकवाद पर ‘लगाम’ लगा रहा है। शिनजियांग प्रांत के गवर्नर शोहरत ज़ाकिर का इस बारे में कहना है कि चीन अपने देश के उइगर और कज़ाक मुसलमानों की ‘रक्षा’ कर रहा है। ज़ाकिर का कहना है कि 'नज़रबंदी कैम्प' में 'व्यावसायिक शिक्षा' की ट्रेनिंग और चीन की आधिकारिक भाषा मंदारिन सिखा कर इस समुदाय के लोगों को आतंक के तरफ जाने से ‘बचाया’ जा रहा है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीन में ऐसे 'नज़रबंदी कैम्पों' में इस समुदाय के कम से कम 10 लाख लोगों को कैद कर रखा है। पहले तो चीन उइगर-कजाक मुस्लिमों पर हो रही ‘उत्पीड़न’ के आरोपों को पूरी तरह से ‘नकार’ गया, लेकिन बाद में ये ‘सफ़ाई’ दी कि इन नज़रबंदी कैम्पों में लोगों को एक साथ ‘जबरदस्ती’ कैद करके नहीं रखा गया है और ना ही उन्हें राजनीतिक रूप से फ़िर से शिक्षित करने की कोशिश की जा रही है।
पूरी दुनिया को मानवाधिकार के नाम पर ‘धोखा’ देने वाले चीन का कहना है कि 'नज़रबंदी कैम्पों' में उन दोषियों को भेजा गया है जिन्होंने छोटे मोटे अपराध किए हैं। आगे इस मामले में ‘सफ़ाई’ देते हुए चीन का तर्क है कि वो इन कैम्पों के ज़रिये ऐसे अपराधियों को नौकरी के मौके देने की कोशिश कर रहा है। इधर चीन की अधिकारिक न्यूज़ एजेंसी शिन्हुआ को दिए गए साक्षात्कार में गवर्नर शोहरत ज़ाकिर ने कहा कि इन कदमों की वजह से बीते 21 महीनों में शिनजियांग प्रांत में होने वाले हमलों पर लगाम लगाने में मदद मिली है।
ज़ाकिर ने ‘चतुराई’ से 'नज़रबंदी कैम्पों' में कैद लोगों को ‘ट्रेनी’ बुलाते हुए ये भी कहा कि उन्होंने 'शिक्षा समझौतों' पर दस्तखत किए हैं ताकि उन्हें वहीं रहते हुए केंद्रित प्रशिक्षण' दिया जा सके। इधर ज़ाकिर ने जो ‘बड़े दावे’ किए हैं वो उन तमाम बातों से मेल नहीं खाते हैं जो इन कैम्पों से निकले पीड़ितों ने अपनी आप बीती में बताई हैं। मीडिया के मुताबिक़, यहां समय गुज़ार चुके लोगों ने बताया कि इन कैम्पों के हालत ‘बेहद ख़राब’ हैं और यहां लाए जाने वाले लोगों को शारीरिक और मनोवैज्ञानिक ‘यातनाएं’ दी जाती हैं। वहीं, इनका सबसे बड़ा आरोप है कि जिन्हें यहां कैद किया जाता है उन्हें किसी तरह की 'व्यवसायिक शिक्षा' नहीं दी जाती है और उनकी किडनी, शरीर के अन्य अंग निकाल लेने के अलावा उन्हें गायब भी कर दिया जाता है।
लोगों का आरोप है कि रोज़ भोजन से पहले उन्हें 'पार्टी का शुक्रिया! मातृभूमि का शुक्रिया!' जैसे नारे लगाने को कहा जाता था। रोज़ाना की ज़रूरी कक्षा के दौरान उन्हें इस बात का 'ज्ञान' दिया जाता था कि 1950 में कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा 'मुक्त' कराए जाने के पहले उनके लोग ‘पिछड़े’ थे।
वहीं यातना झेल चुके कुछ लोगों का कहना है कि उन्हें इसलिए जेल में कैद कर दिया गया क्योंकि वो दाढ़ी रखते थे, बुर्क़ा पहनते थे और सोशल मीडिया पर इस्लामिक त्यौहारों की बधाईयां देते थे। चीन पूरी दुनिया को ‘अपने नज़रिये’ से देखने के लिए हमेशा बाध्य करने की कोशिश करता है। इसके लिए चीन अपने देश से लेकर विदेशी मीडिया के अख़बारों के लेखकों से इस पर ‘सकारात्मक विचार’ भी लिखवा रहा है। इतना ही नहीं, देश के आधिकारिक टीवी चैनल पर भी इसकी कुछ ‘अलग’ ही सच्चाई बताई जाती है।
चीन की ‘कारस्तानी’ यही ख़त्म नहीं होती। तुर्क मूल के उइगर मुसलमानों का कहना है कि उनके इलाके में चीनी सरकार हान चीनियों को बड़े पैमाने पर बसा रही है जिससे उनकी संस्कृति और सभ्यता ‘ख़तरे’ में है। इधर, संयुक्त राष्ट्र संघ की जिनेवा स्थित नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति का कहना है कि वह शिनजियांग क्षेत्र में उइगर और अन्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों की हिरासत से ‘चिंतित’ है और उन्हें तत्काल रिहा करने की मांग करती है।
दुनिया भर के मुस्लिम देश इज़रायल-फिलिस्तीन मुद्दे पर मुस्लिम ब्रदरहुड की बात करते हैं, लेकिन चीन सालों से उइगर मुस्लिमों पर अत्याचार कर रहा है पर इस पर किसी भी मुस्लिम देश की तरफ़ से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आती है। अमेरिका जैसे देश में जहां पर कि मुस्लिमों को आज़ादी है लेकिन ईरान या इराक़ के मुद्दे उसका विरोध करने के लिए मुस्लिम देश एक होने की बात करते हैं, परंतु चीन जो सुनियोजित तरीक़े से मुस्लिमों पर अत्याचार कर रहा है उस पर आख़िर क्यों मुस्लिम देश ख़ामोश है।
OCT 17 (WTN) – ‘अनुशासन’ के नाम पर लोकतंत्र का समर्थन कर रहे सैकड़ों विद्यार्थियों की ‘हत्यारी’ चीन की कम्युनिस्ट सरकार अपने यहां के तुर्क मूल के उइगर मुस्लिमों पर ‘जुल्म’ की इंतेहा कर रही है। अपनी ‘विस्तारवादी’ नीति के लिए कुख्यात चीन ने लाखों की तादात में इस समुदाय के लोगों को ‘नज़रबंदी कैम्प’ में डालकर रखा हुआ है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीन के शिनजियांग प्रांत से आने वाले उइगर मुस्लिम चीन की आबादी का एक बेहद छोटा सा हिस्सा हैं, लेकिन बजाय इनका ‘संरक्षण’ करने के चीन सरकार इन पर ‘दमन चक्र’ चला रही है।
मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, चीन ने उइगर मुस्लिमों पर हो रहे ‘अत्याचार’ को 'व्यावसायिक शिक्षा' का नाम दिया है। इसके पीछे चीन का ‘तर्क’ है कि वो इसके जरिए आतंकवाद पर ‘लगाम’ लगा रहा है। शिनजियांग प्रांत के गवर्नर शोहरत ज़ाकिर का इस बारे में कहना है कि चीन अपने देश के उइगर और कज़ाक मुसलमानों की ‘रक्षा’ कर रहा है। ज़ाकिर का कहना है कि 'नज़रबंदी कैम्प' में 'व्यावसायिक शिक्षा' की ट्रेनिंग और चीन की आधिकारिक भाषा मंदारिन सिखा कर इस समुदाय के लोगों को आतंक के तरफ जाने से ‘बचाया’ जा रहा है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीन में ऐसे 'नज़रबंदी कैम्पों' में इस समुदाय के कम से कम 10 लाख लोगों को कैद कर रखा है। पहले तो चीन उइगर-कजाक मुस्लिमों पर हो रही ‘उत्पीड़न’ के आरोपों को पूरी तरह से ‘नकार’ गया, लेकिन बाद में ये ‘सफ़ाई’ दी कि इन नज़रबंदी कैम्पों में लोगों को एक साथ ‘जबरदस्ती’ कैद करके नहीं रखा गया है और ना ही उन्हें राजनीतिक रूप से फ़िर से शिक्षित करने की कोशिश की जा रही है।
पूरी दुनिया को मानवाधिकार के नाम पर ‘धोखा’ देने वाले चीन का कहना है कि 'नज़रबंदी कैम्पों' में उन दोषियों को भेजा गया है जिन्होंने छोटे मोटे अपराध किए हैं। आगे इस मामले में ‘सफ़ाई’ देते हुए चीन का तर्क है कि वो इन कैम्पों के ज़रिये ऐसे अपराधियों को नौकरी के मौके देने की कोशिश कर रहा है। इधर चीन की अधिकारिक न्यूज़ एजेंसी शिन्हुआ को दिए गए साक्षात्कार में गवर्नर शोहरत ज़ाकिर ने कहा कि इन कदमों की वजह से बीते 21 महीनों में शिनजियांग प्रांत में होने वाले हमलों पर लगाम लगाने में मदद मिली है।
ज़ाकिर ने ‘चतुराई’ से 'नज़रबंदी कैम्पों' में कैद लोगों को ‘ट्रेनी’ बुलाते हुए ये भी कहा कि उन्होंने 'शिक्षा समझौतों' पर दस्तखत किए हैं ताकि उन्हें वहीं रहते हुए केंद्रित प्रशिक्षण' दिया जा सके। इधर ज़ाकिर ने जो ‘बड़े दावे’ किए हैं वो उन तमाम बातों से मेल नहीं खाते हैं जो इन कैम्पों से निकले पीड़ितों ने अपनी आप बीती में बताई हैं। मीडिया के मुताबिक़, यहां समय गुज़ार चुके लोगों ने बताया कि इन कैम्पों के हालत ‘बेहद ख़राब’ हैं और यहां लाए जाने वाले लोगों को शारीरिक और मनोवैज्ञानिक ‘यातनाएं’ दी जाती हैं। वहीं, इनका सबसे बड़ा आरोप है कि जिन्हें यहां कैद किया जाता है उन्हें किसी तरह की 'व्यवसायिक शिक्षा' नहीं दी जाती है और उनकी किडनी, शरीर के अन्य अंग निकाल लेने के अलावा उन्हें गायब भी कर दिया जाता है।
लोगों का आरोप है कि रोज़ भोजन से पहले उन्हें 'पार्टी का शुक्रिया! मातृभूमि का शुक्रिया!' जैसे नारे लगाने को कहा जाता था। रोज़ाना की ज़रूरी कक्षा के दौरान उन्हें इस बात का 'ज्ञान' दिया जाता था कि 1950 में कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा 'मुक्त' कराए जाने के पहले उनके लोग ‘पिछड़े’ थे।
वहीं यातना झेल चुके कुछ लोगों का कहना है कि उन्हें इसलिए जेल में कैद कर दिया गया क्योंकि वो दाढ़ी रखते थे, बुर्क़ा पहनते थे और सोशल मीडिया पर इस्लामिक त्यौहारों की बधाईयां देते थे। चीन पूरी दुनिया को ‘अपने नज़रिये’ से देखने के लिए हमेशा बाध्य करने की कोशिश करता है। इसके लिए चीन अपने देश से लेकर विदेशी मीडिया के अख़बारों के लेखकों से इस पर ‘सकारात्मक विचार’ भी लिखवा रहा है। इतना ही नहीं, देश के आधिकारिक टीवी चैनल पर भी इसकी कुछ ‘अलग’ ही सच्चाई बताई जाती है।
चीन की ‘कारस्तानी’ यही ख़त्म नहीं होती। तुर्क मूल के उइगर मुसलमानों का कहना है कि उनके इलाके में चीनी सरकार हान चीनियों को बड़े पैमाने पर बसा रही है जिससे उनकी संस्कृति और सभ्यता ‘ख़तरे’ में है। इधर, संयुक्त राष्ट्र संघ की जिनेवा स्थित नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति का कहना है कि वह शिनजियांग क्षेत्र में उइगर और अन्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों की हिरासत से ‘चिंतित’ है और उन्हें तत्काल रिहा करने की मांग करती है।
दुनिया भर के मुस्लिम देश इज़रायल-फिलिस्तीन मुद्दे पर मुस्लिम ब्रदरहुड की बात करते हैं, लेकिन चीन सालों से उइगर मुस्लिमों पर अत्याचार कर रहा है पर इस पर किसी भी मुस्लिम देश की तरफ़ से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आती है। अमेरिका जैसे देश में जहां पर कि मुस्लिमों को आज़ादी है लेकिन ईरान या इराक़ के मुद्दे उसका विरोध करने के लिए मुस्लिम देश एक होने की बात करते हैं, परंतु चीन जो सुनियोजित तरीक़े से मुस्लिमों पर अत्याचार कर रहा है उस पर आख़िर क्यों मुस्लिम देश ख़ामोश है।