विश्लेषण: श्रीलंका के राजनीतिक संकट से सावधान रहे भारत
Wednesday - November 14, 2018 2:32 pm ,
Category : WTN HINDI
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के संसद भंग करने के फ़ैसले को पलटा
श्रीलंका में प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव मंज़ूर
NOV 14 (WTN) – भारत के दक्षिण में स्थित पड़ोसी देश श्रीलंका की राजनीति में उतार-चढ़ाव का दौर जारी है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि श्रीलंका में इन दिनों राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना के फ़ैसलों के कारण घमासान मचा हुआ है। ताज़ा घटनाक्रम में श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना को उस समय ज़ोरदार झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने संसद भंग करने के उनके विवादित निर्णय को पलटते हुए पांच जनवरी को प्रस्तावित मध्यावधि चुनाव की तैयारियों पर रोक लगा दी।
श्रीलंका में मची राजनीतिक ऊथलपुथल के बीच सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से बर्खास्त श्रीलंकाई सरकार और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को जरूर मज़बूती मिली होगी। मुख्य न्यायाधीश नलिन पेरेरा की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यों की एक पीठ ने संसद भंग करने के राष्ट्रपति सिरिसेना के नौ नवम्बर के निर्णय के ख़िलाफ़ दायर याचिकाओं पर दो दिन की अदालती कार्यवाही के बाद यह व्यवस्था दी।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि श्रीलंका में राष्ट्रपति सिरिसेना ने विवादित कदम उठाते हुए कार्यकाल पूरा होने के तकरीबन दो साल पहले ही संसद भंग कर दी थी। अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “संसद भंग करने का राष्ट्रपति सिरिसेना का फैसला सात दिसम्बर तक निलम्बित रहेगा और अदालत अगले महीने कोई अंतिम व्यवस्था देने से पहले राष्ट्रपति के फैसले से जुड़ी तमाम याचिकाओं पर विचार करेगी।”
कोर्ट के इस निर्णय का मतलब है कि अब संसद बुलाई जा सकती है और यह पता लगाने के लिए शक्ति परीक्षण कराया जा सकता है कि 225 सदस्यीय संसद में राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त प्रधानमंत्री महिन्दा राजपक्षे के पास बहुमत है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट के अहम फ़ैसले के बाद श्रीलंकाई संसद के अध्यक्ष कारू जयसूर्या ने आज संसद का सत्र बुलाया है।
इधर, श्रीलंका की संसद ने नव नियुक्त प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे की सरकार के ख़िलाफ़ मतदान किया। इसे राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना के लिए एक बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है। संसद के स्पीकर कारू जयसूर्या ने घोषणा की कि संसद ने प्रधानमंत्री राजपक्षे के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि राष्ट्रपति सिरिसेना के सामने जब यह साफ़ हो गया कि उनके द्वारा प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को बर्खास्त कर प्रधानमंत्री बनाए गए महिंद्रा राजपक्षे के पक्ष में संसद में बहुमत नहीं है तो उन्होंने संसद भंग कर दी थी। साथ ही, उन्होंने पांच जनवरी को संसद का मध्यावधि चुनाव कराने के आदेश जारी कर दिया था जिसके बाद इस देश में राजनीतिक संकट खड़ा हो गया था।
कल यानि मंगलवार को सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से पेश अटार्नी जनरल जयंता जयसूर्या ने सिरिसेना के कदम को सही ठहराया और कहा कि राष्ट्रपति की शक्तियां साफ़ और सुस्पष्ट हैं और उन्होंने संविधान के प्रावधानों के अनुरूप संसद भंग की है। अटार्नी जनरल जयसूर्या ने सभी याचिकाएं रद्द करने का आग्रह किया और कहा कि राष्ट्रपति के पास संसद भंग करने की शक्तियां हैं।
इधर श्रीलंका के विश्लेषकों का मानना है कि श्रीलंका में राष्ट्रपति किसी भी प्रधानमंत्री के साढ़े चार साल के कार्यकाल को पूरा होने से पहले उसे बर्खास्त नहीं कर सकता है और ना ही संसद को भंग कर सकता है।
इधर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद प्रतिक्रिया देते हुए विक्रमसिंघे ने कहा, ''लोगों ने अपनी पहली लड़ाई जीत ली है।” इस मामले पर उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “आओ हम आगे बढ़ें और अपने प्रिय देश में लोगों की संप्रभुता फिर स्थापित करें।”
अब देखना होगा कि श्रीलंका में आगे क्या सियासत होती है। जानकारों का मानना है कि श्रीलंका पर चीन का धीरे-धीरे प्रभाव बढ़ता जा रहा है और श्रीलंका चीन के कर्ज के तले दबता जा रहा है। रानिल विक्रमसिंघे भारत समर्थित माने जाते हैं महिंदा राजपक्षे चीन समर्थित। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के जानकारों का मत है कि चीन के दबाव के कारण ही विक्रमसिंघे को उनके पद से हटाया गया है। श्रीलंका की अंदरुनी राजनीति में धीरे-धीरे चीन का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए चिंता का कारण है।
NOV 14 (WTN) – भारत के दक्षिण में स्थित पड़ोसी देश श्रीलंका की राजनीति में उतार-चढ़ाव का दौर जारी है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि श्रीलंका में इन दिनों राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना के फ़ैसलों के कारण घमासान मचा हुआ है। ताज़ा घटनाक्रम में श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना को उस समय ज़ोरदार झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने संसद भंग करने के उनके विवादित निर्णय को पलटते हुए पांच जनवरी को प्रस्तावित मध्यावधि चुनाव की तैयारियों पर रोक लगा दी।
श्रीलंका में मची राजनीतिक ऊथलपुथल के बीच सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से बर्खास्त श्रीलंकाई सरकार और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को जरूर मज़बूती मिली होगी। मुख्य न्यायाधीश नलिन पेरेरा की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यों की एक पीठ ने संसद भंग करने के राष्ट्रपति सिरिसेना के नौ नवम्बर के निर्णय के ख़िलाफ़ दायर याचिकाओं पर दो दिन की अदालती कार्यवाही के बाद यह व्यवस्था दी।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि श्रीलंका में राष्ट्रपति सिरिसेना ने विवादित कदम उठाते हुए कार्यकाल पूरा होने के तकरीबन दो साल पहले ही संसद भंग कर दी थी। अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “संसद भंग करने का राष्ट्रपति सिरिसेना का फैसला सात दिसम्बर तक निलम्बित रहेगा और अदालत अगले महीने कोई अंतिम व्यवस्था देने से पहले राष्ट्रपति के फैसले से जुड़ी तमाम याचिकाओं पर विचार करेगी।”
कोर्ट के इस निर्णय का मतलब है कि अब संसद बुलाई जा सकती है और यह पता लगाने के लिए शक्ति परीक्षण कराया जा सकता है कि 225 सदस्यीय संसद में राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त प्रधानमंत्री महिन्दा राजपक्षे के पास बहुमत है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट के अहम फ़ैसले के बाद श्रीलंकाई संसद के अध्यक्ष कारू जयसूर्या ने आज संसद का सत्र बुलाया है।
इधर, श्रीलंका की संसद ने नव नियुक्त प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे की सरकार के ख़िलाफ़ मतदान किया। इसे राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना के लिए एक बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है। संसद के स्पीकर कारू जयसूर्या ने घोषणा की कि संसद ने प्रधानमंत्री राजपक्षे के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि राष्ट्रपति सिरिसेना के सामने जब यह साफ़ हो गया कि उनके द्वारा प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को बर्खास्त कर प्रधानमंत्री बनाए गए महिंद्रा राजपक्षे के पक्ष में संसद में बहुमत नहीं है तो उन्होंने संसद भंग कर दी थी। साथ ही, उन्होंने पांच जनवरी को संसद का मध्यावधि चुनाव कराने के आदेश जारी कर दिया था जिसके बाद इस देश में राजनीतिक संकट खड़ा हो गया था।
कल यानि मंगलवार को सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से पेश अटार्नी जनरल जयंता जयसूर्या ने सिरिसेना के कदम को सही ठहराया और कहा कि राष्ट्रपति की शक्तियां साफ़ और सुस्पष्ट हैं और उन्होंने संविधान के प्रावधानों के अनुरूप संसद भंग की है। अटार्नी जनरल जयसूर्या ने सभी याचिकाएं रद्द करने का आग्रह किया और कहा कि राष्ट्रपति के पास संसद भंग करने की शक्तियां हैं।
इधर श्रीलंका के विश्लेषकों का मानना है कि श्रीलंका में राष्ट्रपति किसी भी प्रधानमंत्री के साढ़े चार साल के कार्यकाल को पूरा होने से पहले उसे बर्खास्त नहीं कर सकता है और ना ही संसद को भंग कर सकता है।
इधर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद प्रतिक्रिया देते हुए विक्रमसिंघे ने कहा, ''लोगों ने अपनी पहली लड़ाई जीत ली है।” इस मामले पर उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “आओ हम आगे बढ़ें और अपने प्रिय देश में लोगों की संप्रभुता फिर स्थापित करें।”
अब देखना होगा कि श्रीलंका में आगे क्या सियासत होती है। जानकारों का मानना है कि श्रीलंका पर चीन का धीरे-धीरे प्रभाव बढ़ता जा रहा है और श्रीलंका चीन के कर्ज के तले दबता जा रहा है। रानिल विक्रमसिंघे भारत समर्थित माने जाते हैं महिंदा राजपक्षे चीन समर्थित। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के जानकारों का मत है कि चीन के दबाव के कारण ही विक्रमसिंघे को उनके पद से हटाया गया है। श्रीलंका की अंदरुनी राजनीति में धीरे-धीरे चीन का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए चिंता का कारण है।