विश्लेषण: मध्य प्रदेश में गठबंधन ना करना कांग्रेस की एक बड़ी ‘राजनीतिक भूल’
Wednesday - November 21, 2018 12:09 pm ,
Category : WTN HINDI
समाजवादी पार्टी और बसपा ने लगाए कांग्रेस पर ‘गम्भीर आरोप’
कांग्रेस को बसपा और सपा के साथ विधानसभा चुनाव में गठबंधन का मिल सकता था ‘फायदा’
NOV 21 (WTN) – क्या मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा और समाजवादी पार्टी से गठबंधन ना करके कांग्रेस ने बड़ी भूल की है? हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि कहा जा रहा है कि इस बार भी भाजपा विरोधी वोटों के ध्रुवीकरण के कारण कांग्रेस मध्य प्रदेश में भाजपा को पराजित करने में शायद ही सफल हो सके। कहा ये भी जा रहा है कि यदि कांग्रेस, बसपा के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करती तो भाजपा विरोधी वोटों का ध्रुवीकरण रुक जाता और भाजपा 100 से अंदर सिमट जाती। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि आखिर क्यों कांग्रेस ने बसपा के साथ गठबंधन नहीं किया।
इधर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दावा किया है कि मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस प्रस्तावित गठबंधन में बसपा को शामिल करने को तैयार नहीं थी और इसी कारण समाजवादी पार्टी का भी कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं हो पाया। अखिलेश यादव का गठबंधन के बारे में कहना है, “हमने कांग्रेस से कहा था कि मध्य प्रदेश में लड़ाई बड़ी है और बसपा को भी साथ ले लीजिए, लेकिन कांग्रेस हमारी पार्टी समाजवादी पार्टी से तो गठबंधन करने को तैयार थी, लेकिन बसपा के साथ वो कोई समझौता नहीं करना चाहती थी।”
उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का दावा है कि अगर कांग्रेस का मध्य प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बसपा और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के साथ गठबंधन होता तो इस गठबंधन को प्रदेश की कुल 230 सीटों में से 200 से ज्यादा सीटें मिलतीं।
यदि अखिलेश यादव की बात पर गौर किया जाए तो उनकी बात कुछ हद तक तो सही ही है। यदि पिछले विधानसभा चुनाव की बात करें तो साल 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 44.87 प्रतिशत मत मिले थे तो वहीं कांग्रेस को 36.38 प्रतिशत वोट मिले थे। बसपा को 6.29 प्रतिशत, समाजवादी पार्टी को 0.03 प्रतिशत और गोण्डवाना गणतंत्र पार्टी को 1 प्रतिशत मत मिले थे। यानि कि यदि कांग्रेस, बसपा, सपा और गोण्डवाना गणतंत्र पार्टी के मतों को मिला लिया जाए तो यह गठबंधन भाजपा को बराबरी की टक्कर इस विधानसभा चुनाव में दे सकता था।
लेकिन जिस तरह का दावा अखिलेश यादव कर रहे हैं कि बसपा को गठबंधन से दूर रखने के लिए कांग्रेस ने समाजवादी और गोण्डवाना गणतंत्र पार्टी से भी गठबंधन नहीं किया तो इसका जवाब तो खुद कांग्रेस ही दे पाएगी। वैसे इस बारे में बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावाती ने कुछ दिनों पहले कहा था कि दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं के कारण ही बसपा का कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं हो सका। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दिग्विजय सिंह ने बसपा पर तंज कसते हुए कहा था कि सीबीआई के डर के कारण ही मायावाती ने कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं किया।
इधर बीएसपी अध्यक्ष मायावाती ने कांग्रेस पर बड़ा आरोप लगाया है। मायावती ने मध्य प्रदेश में कांग्रेस के साथ गठबंधन ना होने के पीछे कारण बताते हुए कहा, “गठबंधन की आड़ में कांग्रेस सोची समझी रणनीति और षड़यंत्र के तहत हमें बहुत ही कम सीटें देकर बीएसपी को खत्म करना चाहती थी।” कांग्रेस पर निशाना साधते हुए मायावती ने कहा कि कांग्रेस के साथ कम सीटों पर समझौता करने से बेहतर था कि हमने अकेली ही चुनाव लड़ने का फैसला लिया।
कांग्रेस का अन्य पार्टियों के साथ गठबंधन ना होने के पीछे क्या कारण है इसका सही उत्तर तो कांग्रेस ही दे सकती है, लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या कांग्रेस ने मायावती की बसपा को गठबंधन से दूर रखने के लिए समाजवादी पार्टी और गोण्डवाना गणतंत्र पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करके बड़ी गलती की है। वहीं दूसरा सवाल उठता है कि जो आरोप मायावती लगा रही हैं उनमें कितनी सच्चाई है।
कहा जा रहा है कि एससी-एसटी एक्ट में संशोधन से सवर्ण समाज और पिछड़ा वर्ग नाराज़ हैं, ऐसे में यदि कांग्रेस बसपा के साथ गठबंधन करती तो इस समाज की नाराज़गी कांग्रेस को झेलना पड़ती ऐसे में कांग्रेस ने अपने दम पर ही चुनाव लड़ने की ठानी। वहीं समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस ने शायद इसलिए गठबंधन नहीं किया क्योंकि समाजवादी पार्टी को पिछले चुनाव में सिर्फ़ 0.03 प्रतिशत मत ही मिले थे, ऐसे में कांग्रेस को लगा होगा कि समाजवादी पार्टी का मध्य प्रदेश में कोई ज़्यादा वजूद नहीं है और गठबंधन करने से समाजवादी पार्टी को कुछ सीटें देनी पड़ती जिससे उन सीटों पर कांग्रेस कार्यकर्ता नाराज़ हो सकते थे।
लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है कि यदि कांग्रेस बसपा और समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर लेती तो भाजपा विरोधी वोटों को ध्रुवीकरण रुक जाता, लेकिन अब ऐसा नहीं है और भाजपा विरोधी वोटों का ध्रुवीकरण हो चुका है ऐसे में इसका पूरा फायदा भाजपा को मिलेगा। कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में एक बड़ी राजनीतिक भूल हुई है और इसका खामियाजा उसे चुनाव में भुगतना पड़ सकता है।
NOV 21 (WTN) – क्या मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा और समाजवादी पार्टी से गठबंधन ना करके कांग्रेस ने बड़ी भूल की है? हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि कहा जा रहा है कि इस बार भी भाजपा विरोधी वोटों के ध्रुवीकरण के कारण कांग्रेस मध्य प्रदेश में भाजपा को पराजित करने में शायद ही सफल हो सके। कहा ये भी जा रहा है कि यदि कांग्रेस, बसपा के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करती तो भाजपा विरोधी वोटों का ध्रुवीकरण रुक जाता और भाजपा 100 से अंदर सिमट जाती। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि आखिर क्यों कांग्रेस ने बसपा के साथ गठबंधन नहीं किया।
इधर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दावा किया है कि मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस प्रस्तावित गठबंधन में बसपा को शामिल करने को तैयार नहीं थी और इसी कारण समाजवादी पार्टी का भी कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं हो पाया। अखिलेश यादव का गठबंधन के बारे में कहना है, “हमने कांग्रेस से कहा था कि मध्य प्रदेश में लड़ाई बड़ी है और बसपा को भी साथ ले लीजिए, लेकिन कांग्रेस हमारी पार्टी समाजवादी पार्टी से तो गठबंधन करने को तैयार थी, लेकिन बसपा के साथ वो कोई समझौता नहीं करना चाहती थी।”
उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का दावा है कि अगर कांग्रेस का मध्य प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बसपा और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के साथ गठबंधन होता तो इस गठबंधन को प्रदेश की कुल 230 सीटों में से 200 से ज्यादा सीटें मिलतीं।
यदि अखिलेश यादव की बात पर गौर किया जाए तो उनकी बात कुछ हद तक तो सही ही है। यदि पिछले विधानसभा चुनाव की बात करें तो साल 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 44.87 प्रतिशत मत मिले थे तो वहीं कांग्रेस को 36.38 प्रतिशत वोट मिले थे। बसपा को 6.29 प्रतिशत, समाजवादी पार्टी को 0.03 प्रतिशत और गोण्डवाना गणतंत्र पार्टी को 1 प्रतिशत मत मिले थे। यानि कि यदि कांग्रेस, बसपा, सपा और गोण्डवाना गणतंत्र पार्टी के मतों को मिला लिया जाए तो यह गठबंधन भाजपा को बराबरी की टक्कर इस विधानसभा चुनाव में दे सकता था।
लेकिन जिस तरह का दावा अखिलेश यादव कर रहे हैं कि बसपा को गठबंधन से दूर रखने के लिए कांग्रेस ने समाजवादी और गोण्डवाना गणतंत्र पार्टी से भी गठबंधन नहीं किया तो इसका जवाब तो खुद कांग्रेस ही दे पाएगी। वैसे इस बारे में बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावाती ने कुछ दिनों पहले कहा था कि दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं के कारण ही बसपा का कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं हो सका। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दिग्विजय सिंह ने बसपा पर तंज कसते हुए कहा था कि सीबीआई के डर के कारण ही मायावाती ने कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं किया।
इधर बीएसपी अध्यक्ष मायावाती ने कांग्रेस पर बड़ा आरोप लगाया है। मायावती ने मध्य प्रदेश में कांग्रेस के साथ गठबंधन ना होने के पीछे कारण बताते हुए कहा, “गठबंधन की आड़ में कांग्रेस सोची समझी रणनीति और षड़यंत्र के तहत हमें बहुत ही कम सीटें देकर बीएसपी को खत्म करना चाहती थी।” कांग्रेस पर निशाना साधते हुए मायावती ने कहा कि कांग्रेस के साथ कम सीटों पर समझौता करने से बेहतर था कि हमने अकेली ही चुनाव लड़ने का फैसला लिया।
कांग्रेस का अन्य पार्टियों के साथ गठबंधन ना होने के पीछे क्या कारण है इसका सही उत्तर तो कांग्रेस ही दे सकती है, लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या कांग्रेस ने मायावती की बसपा को गठबंधन से दूर रखने के लिए समाजवादी पार्टी और गोण्डवाना गणतंत्र पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करके बड़ी गलती की है। वहीं दूसरा सवाल उठता है कि जो आरोप मायावती लगा रही हैं उनमें कितनी सच्चाई है।
कहा जा रहा है कि एससी-एसटी एक्ट में संशोधन से सवर्ण समाज और पिछड़ा वर्ग नाराज़ हैं, ऐसे में यदि कांग्रेस बसपा के साथ गठबंधन करती तो इस समाज की नाराज़गी कांग्रेस को झेलना पड़ती ऐसे में कांग्रेस ने अपने दम पर ही चुनाव लड़ने की ठानी। वहीं समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस ने शायद इसलिए गठबंधन नहीं किया क्योंकि समाजवादी पार्टी को पिछले चुनाव में सिर्फ़ 0.03 प्रतिशत मत ही मिले थे, ऐसे में कांग्रेस को लगा होगा कि समाजवादी पार्टी का मध्य प्रदेश में कोई ज़्यादा वजूद नहीं है और गठबंधन करने से समाजवादी पार्टी को कुछ सीटें देनी पड़ती जिससे उन सीटों पर कांग्रेस कार्यकर्ता नाराज़ हो सकते थे।
लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है कि यदि कांग्रेस बसपा और समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर लेती तो भाजपा विरोधी वोटों को ध्रुवीकरण रुक जाता, लेकिन अब ऐसा नहीं है और भाजपा विरोधी वोटों का ध्रुवीकरण हो चुका है ऐसे में इसका पूरा फायदा भाजपा को मिलेगा। कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में एक बड़ी राजनीतिक भूल हुई है और इसका खामियाजा उसे चुनाव में भुगतना पड़ सकता है।