तिलक लगाने के हैं आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण
Friday - November 30, 2018 11:06 am ,
Category : WTN HINDI
तिलक लगाने से जागृत होती है पीनियल ग्रन्थि
तिलक लगाने से होती है मस्तिष्क में एक प्रकाश ही अनुभूति जिससे मिलती है शांति
NOV 30 (WTN) – सनातन धर्म में तिलक लगाना अत्यंत शुभ माना गया है। तिलक को सात्विकता का एक प्रतीक भी माना जाता है। परम्परा है कि विजयश्री प्राप्त करने के उद्देश्य से रोली, हल्दी, चन्दन या फिर कुम्कुम का तिलक किया जाता है। इसी प्रकार तिलक को शुभकामनाओं के रूप में या फिर तीर्थस्थानों, मन्दिरों और विभिन्न पर्वो-त्यौहारों तिलक लगाया जाता है। साथ ही विशेष अतिथि आगमन पर उसे तिलक लगाया जाता है।
जैसा कि आप जानते हैं कि मस्तिष्क के भ्रू-मध्य ललाट में जिस स्थान पर टीका या तिलक लगाया जाता है, यह भाग आज्ञाचक्र कहलाता है। शरीर शास्त्र के अनुसार वह स्थान जहां पर तिलक लगाया जाता है वह पीनियल ग्रन्थि का स्थान होता है। जब तिलक लगाया जाता है तो यह पीनियल ग्रन्थि दबती है, जिसके कारण मस्तिष्क के अन्दर एक तरह के प्रकाश की अनुभूति होती है।
पीनियल ग्रन्थि के दबने से मस्तिष्क में एक नई तरह की तरावट आती है और इसे प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है। हमारे ऋषि मुनि इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि पीनियल ग्रन्थि के उद्दीपन से आज्ञाचक्र का उद्दीपन होगा। इसी वजह से धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा-उपासना और शुभकार्यों में तिलक लगाया जाता है जिससे पीनियक ग्रन्थि के बार-बार उद्दीपन होने से हमारे शरीर में स्थूल-सूक्ष्म अवयन जागृत हो सकें।
वहीं, तन्त्र शास्त्र के अनुसार माथे को इष्ट देव का प्रतीक समझा जाता है, और हमारे इष्ट देव की स्मृति हमें सदैव बनी रहे इसी तरह की धारणा को ध्यान में रखकर तिलक लगाने की प्रथा चलन में है। ऐसा करने से मन में उस केन्द्रबिन्दु की स्मृति हो जाती है। चूंकि चेतना सारे शरीर में फैली रहती है, इसलिए इस तिलक या टीके के माध्यम से आज्ञाचक्र को उद्दीपन करने के बाद तीसरे नेत्र को जागृत करा सकें ताकि हम परामानसिक जगत में प्रवेश कर सकें।
तिलक का हमारे जीवन में अत्यंत महत्व है। शुभ कार्य प्रारम्भ करने से लेकर कई अन्य धार्मिक अनुष्ठानों, संस्कारों और प्राचीन समय में युद्ध लड़ने जाने वाले को शुभकामना के तौर पर तिलक लगाया जाता था। वे प्रसंग जिन्हें हम हमारी स्मृति-पटल से हटाना नही चाहते, इन यादों को मस्तिष्क में स्थाई तौर पर रखने के लिए भी तिलक लगाया जाता है। धीरे-धीरे अब विज्ञान भी तिलक के महत्व को जानने लगा है।
NOV 30 (WTN) – सनातन धर्म में तिलक लगाना अत्यंत शुभ माना गया है। तिलक को सात्विकता का एक प्रतीक भी माना जाता है। परम्परा है कि विजयश्री प्राप्त करने के उद्देश्य से रोली, हल्दी, चन्दन या फिर कुम्कुम का तिलक किया जाता है। इसी प्रकार तिलक को शुभकामनाओं के रूप में या फिर तीर्थस्थानों, मन्दिरों और विभिन्न पर्वो-त्यौहारों तिलक लगाया जाता है। साथ ही विशेष अतिथि आगमन पर उसे तिलक लगाया जाता है।
जैसा कि आप जानते हैं कि मस्तिष्क के भ्रू-मध्य ललाट में जिस स्थान पर टीका या तिलक लगाया जाता है, यह भाग आज्ञाचक्र कहलाता है। शरीर शास्त्र के अनुसार वह स्थान जहां पर तिलक लगाया जाता है वह पीनियल ग्रन्थि का स्थान होता है। जब तिलक लगाया जाता है तो यह पीनियल ग्रन्थि दबती है, जिसके कारण मस्तिष्क के अन्दर एक तरह के प्रकाश की अनुभूति होती है।
पीनियल ग्रन्थि के दबने से मस्तिष्क में एक नई तरह की तरावट आती है और इसे प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है। हमारे ऋषि मुनि इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि पीनियल ग्रन्थि के उद्दीपन से आज्ञाचक्र का उद्दीपन होगा। इसी वजह से धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा-उपासना और शुभकार्यों में तिलक लगाया जाता है जिससे पीनियक ग्रन्थि के बार-बार उद्दीपन होने से हमारे शरीर में स्थूल-सूक्ष्म अवयन जागृत हो सकें।
वहीं, तन्त्र शास्त्र के अनुसार माथे को इष्ट देव का प्रतीक समझा जाता है, और हमारे इष्ट देव की स्मृति हमें सदैव बनी रहे इसी तरह की धारणा को ध्यान में रखकर तिलक लगाने की प्रथा चलन में है। ऐसा करने से मन में उस केन्द्रबिन्दु की स्मृति हो जाती है। चूंकि चेतना सारे शरीर में फैली रहती है, इसलिए इस तिलक या टीके के माध्यम से आज्ञाचक्र को उद्दीपन करने के बाद तीसरे नेत्र को जागृत करा सकें ताकि हम परामानसिक जगत में प्रवेश कर सकें।
तिलक का हमारे जीवन में अत्यंत महत्व है। शुभ कार्य प्रारम्भ करने से लेकर कई अन्य धार्मिक अनुष्ठानों, संस्कारों और प्राचीन समय में युद्ध लड़ने जाने वाले को शुभकामना के तौर पर तिलक लगाया जाता था। वे प्रसंग जिन्हें हम हमारी स्मृति-पटल से हटाना नही चाहते, इन यादों को मस्तिष्क में स्थाई तौर पर रखने के लिए भी तिलक लगाया जाता है। धीरे-धीरे अब विज्ञान भी तिलक के महत्व को जानने लगा है।