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आख़िर क्यों प्रधानमंत्री मोदी के नोटबंदी के फ़ैसले पर अभी भी उठ रहे हैं ‘सवाल’?

Monday - December 3, 2018 12:46 pm , Category : WTN HINDI
कालेधन के मुद्दे पर अब पूर्व चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने मोदी सरकार की नोटबंदी का बताया ‘फेल’
कालेधन के मुद्दे पर अब पूर्व चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने मोदी सरकार की नोटबंदी का बताया ‘फेल’

बड़ा सवाल: क्या नोटबंदी प्रधानमंत्री मोदी का एक बड़ा असफल फ़ैसला था?
 
DEC 03 (WTN) – नोटबंदी पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हमेशा यह दावा करते रहते हैं कि नोटबंदी से देश को फायदा हुआ है, और इसके कारण कालेधन पर लगाम लगी है। लेकिन समय-समय पर प्रधानमंत्री मोदी के इस दावे पर सवाल उठाते रहते हैं कि नोटबंदी एक सफल प्रयोग था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कुछ दिनों पहले कृषि मंत्रालय ने वित्तीय मामलों की संसदीय समिति को सौंपे एक बैकग्राउंड नोट में माना है कि नोटबंदी के बाद नगदी की कमी की वजह से ग्रामीण भारत में हालात काफ़ी खराब गये थे, और इसके कारण बहुत सारे किसान बीज और खाद नहीं खरीद सके थे। खाद और बीज ना खरीदने का विपरीत असर हुआ, और साल 2016 में रबी फसल बुरी तरह से प्रभावित हुए।
 
समय-समय पर विपक्ष और आर्थिक मामलों के जानकर नोटबंदी पर सवाल उठाते रहते हैं। विपक्ष का आरोप है कि नोटबंदी सदी का सबसे बड़ा आर्थिक घोटाला है, लेकिन वहीं प्रधानमंत्री का कहना है कि नोटबंदी के कारण कालेधन पर लगाम लगी है। अपने कई भाषणों में प्रधानमंत्री मोदी इस बात का जिक्र कर चुके हैं कि नोटबंदी के कारण चुनावों में कालेधन के उपयोग पर रोक लगी है।
 
लेकिन, हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से मुक्त हुए ओ.पी.रावत ने अपने एक बयान से प्रधानमंत्री मोदी के दावों पर सवाल खड़े कर दिये हैं। रावत ने अपने एक बयान में साफ़ कहा कि नोटबंदी से चुनाव में कालेधन का उपयोग नहीं रुका है। उन्होंने कहा कि पिछले चुनावों की तुलना में इस बार अधिक कालाधन बरामद हुआ है। इतना ही नहीं, रावत ने चुनाव में कालेधन के उपयोग पर चिंता ज़ाहिर की है।
 
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने नोटबंदी के बारे में कहा,  “नोटबंदी के बाद यह कहा जा रहा था कि चुनाव के दौरान पैसे का दुरुपयोग कम हो जाएगा। लेकिन बरामदगी के आंकड़ों के आधार पर यह साबित नहीं हो सका। पिछले चुनावों के मुक़ाबले उन्हीं राज्य में अधिक कालेधन की बरामदगी हुई है। ”
 
राजनीतिक दलों पर निशाना साधते हुए रावत ने कहा, “उन्हें लगता है कि राजनीतिक वर्ग और उनके फाइनेंसरों को पैसे की कोई कमी नहीं है। इस तरीके से चुनाव में उपयोग किया जाने वाला पैसा आम तौर पर कालाधन होता है। जहां तक चुनाव में कालेधन का इस्तेमाल किया जाता है, वहां कोई जांच नहीं है।”
 
इधर कुछ दिनों पहले देश के पूर्व आर्थ‍िक सलाहकार अरविन्द सुब्रह्मण्यन ने भी नोटबंदी को एक ‘असफल प्रयोग’ क़रार दिया था। नोटबंदी पर अपनी चुप्पी तोडते हुए उन्होंने इसका जिक्र अपनी किताब 'ऑफ काउंसेल: द चैलेंजेस ऑफ द मोदी-जेटली इकोनॉमी' में किया है। अरविन्द सुब्रह्मण्यन ने अपनी किताब में लिखा है, “नोटबंदी अर्थव्यवस्था को एक तगड़ा और खतरनाक झटका था। इस एक कदम से चलन में 86 प्रतिशत मुद्रा बाहर निकाल दी गई थी। नोटबंदी का असर रियल जीडीपी पर देखने को मिला। इकोनॉमी की गति वैसे पहले से ही धीमी थी। लेकिन नोटबंदी के बाद यह और भी तेजी से गिरने लगी।”

संसदीय समिति को सौंपी गई रिपोर्ट हो, या फ़िर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत का बयान या फ़िर पूर्व आर्थ‍िक सलाहकार अरविन्द सुब्रह्मण्यन की नोटबंदी पर तीखी टिप्पणी, सभी का एकसुर में कहना है कि नोटबंदी के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर विपरीत असर पड़ा और कालेधन पर लगाम लगाने की जो बात की जा रही थी, नोटबंदी उस मक़सद में पूरी तरह से नाकामयाब रही।
 
अब देखना होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इन तमाम आरोपों का जवाब किस तरह से देते हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रचार में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषणों में कई बार नोटबंदी का जिक्र किया और उसे लाभदायक बताया। हो सकता है कि विरोधियों के लिए और समीक्षा करने वालों के लिए नोटबंदी एक असफल प्रयोग हो, लेकिन प्रधानमंत्री इसे अपनी एक कामयाबी मानते हैं। अब देखना होगा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में देश की जनता मोदी सरकार की नोटबंदी पर क्या फ़ैसला देती है।