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विश्लेषण: तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव ‘हारकर’ भी यूपी ‘जीत’ गए नरेन्द्र मोदी!

Wednesday - December 19, 2018 12:51 pm , Category : WTN HINDI
यूपी में कांग्रेस को लगा ‘झटका’, लोकसभा चुनाव गठबंधन के लिए सपा-बसपा ने किया ‘किनारा’
यूपी में कांग्रेस को लगा ‘झटका’, लोकसभा चुनाव गठबंधन के लिए सपा-बसपा ने किया ‘किनारा’

लोकसभा चुनाव के लिए यूपी में सपा-बसपा ने गठबंधन से कांग्रेस को रखा ‘दूर’, भाजपा विरोधी वोटों का ध्रुवीकरण होगा ‘कम’
 
DEC 19 (WTN) –
कभी-कभी हार में भी जीत छिपी होती है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में हार के बाद भाजपा और खासतौर से नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता पर सवाल उठने लगे थे। विपक्ष का कहना है कि इन तीन राज्यों में हार के साथ साबित होता है कि नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता देश में अब नहीं है और आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ेगा। लेकिन यदि इसे दूसरे नज़रिये से देखा जाए, तो मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की हार और कांग्रेस की जीत के बाद लोकसभा में सीटों के हिसाब से सबसे बड़े राज्य यूपी में भाजपा को बहुत 'फ़ायदा' होता दिख रहा है।
 
आप सोच रहे होंगे कि आख़िर कैसे इन तीनों राज्यों में हार के बाद भाजपा को लोकसभा चुनाव में यूपी में फ़ायदा होगा, तो हम आपको बताते हैं। दरअसल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में जीत के बाद कांग्रेस को लगने लगा है कि वो मोदी सरकार के ख़िलाफ़ सत्ता विरोधी लहर के कारण 2019 के लोकसभा चुनाव में जीत हासिल कर सकती है। साथ ही तीनों हिन्दी भाषी राज्यों में बढ़िया प्रदर्शन करने के बाद कांग्रेस को उम्मीद है कि वो अब यूपी में भी बढ़िया प्रदर्शन करेगी और यदि यूपी में बनने वाले प्रस्तावित गठबंधन में वह शामिल होगी तो उसकी दावेदारी मज़बूत होगी और वो ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेगी।
 
लेकिन अब ऐसा होता नहीं दिख रहा है। मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने लोकसभा चुनाव के लिए यूपी में बनने वाले गठबंधन से कांग्रेस को बाहर रखने का फ़ैसला 'लगभग' ले लिया है। कहा जा रहा है कि दोनों ही दलों ने सीटों के बंटवारे का फ़ॉर्मूला भी तय कर लिया है और इसकी औपचारिक घोषणा बसपा अध्यक्ष मायावती के जन्मदिन यानि कि 15 जनवरी को की जाएगी।

कांग्रेस की तीन राज्यों में जीत के बाद सपा और बसपा को लग रहा है कि यूपी में बनने वाले गठबंधन में कांग्रेस ज़्यादा सीटों की मांग कर सकती है। ऐसे में कांग्रेस इससे पहले की ज़्यादा सीटों की मांग करे, सपा और बसपा ने अजीत सिंह की रालोद को शामिल कर गठबंधन बना लिया है। सपा के अखिलेश यादव को डर है कि कहीं कांग्रेस ने ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की तो उनकी पार्टी के अस्तित्व पर सवाल उठने लगेंगे। वहीं मायावती जो कि खुद प्रधानमंत्री बनने के सपने देख रहीं हैं, वो नहीं चाहेंगी कि यूपी में ज़्यादा सीटें जीतकर कांग्रेस और राहुल गांधी मज़बूत हों। राहुल गांधी और कांग्रेस की कमज़ोरी में ही मायावती के प्रधानमंत्री बनने के चांस ज़्यादा है।
  
मीडिया से मिली जानकारी के अनुसार यूपी में बन रहे इस गठबंधन में बसपा को 38 और सपा को 37 सीटें मिलेंगी जबकि अजित सिंह की पार्टी रालोद तीन सीटों पर चुनाव लड़ेगी। हालांकि कहा जा रहा है कि चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस से गठबंधन की गुंजाइश बनी रहे, इसलिए सपा-बसपा गठबंधन ने कांग्रेस के गढ़ अमेठी और रायबरेली में प्रत्याशी नहीं उतारेगा का फ़ैसला लिया है। इतना ही नहीं कहा जा रहा है कि सपा अपने कोटे की कुछ सीटें अन्य छोटे दल जैसे निषाद पार्टी और पीस पार्टी को दे सकती है। मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़ सीट बंटवारे के इस फ़ॉर्मूले पर दोनों ही दलों के शीर्ष नेताओं में आपसी सहमति बन चुकी है।
 
अब जबकि कांग्रेस यूपी में बनने वाले गठबंधन में शामिल नहीं होगी, तो स्वाभाविक है कि भाजपा विरोधी वोट एक नहीं हो सकेंगे और वोटों का ध्रुवीकरण होगा और इसका सबसे बड़ा फ़ायदा भाजपा को 2019 के लोकसभा चुनाव में मिलेगा। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यूपी में 80 में से 71 सीटों पर जीत हासिल की थी जबकि उसकी सहयोगी अपना दल ने 2 सीटों पर जीत का परमच लहराया था। वहीं बसपा तो खाता भी नहीं खोल सकी और कांग्रेस को 2 तो समाजवादी पार्टी को सिर्फ़ 5 सीटों पर ही जीत नसीब हो सकी थी।

पिछले लोकसभा चुनाव में यूपी में अकेले भाजपा को 42.30 प्रतिशत वोट मिले थे, तो वहीं सपा को 22.20 प्रतिशत, बसपा को 19.60 प्रतिशत और कांग्रेस को 7.50 प्रतिशत वोट मिले थे। यदि सपा, बसपा और कांग्रेस के वोट प्रतिशत को मिला लिया जाए, तो तीनों पार्टियों के वोट प्रतिशत का टोटल 49.30 प्रतिशत होता है। ऐसे में यदि तीनों पार्टियां 2019 के लोकसभा चुनाव में साथ चुनाव लड़तीं तो भाजपा की क़रारी हार हो सकती थी, लेकिन कांग्रेस के गठबंधन से दूर होने के बाद आंकड़ें बदल गए हैं जो कि भाजपा के लिए 'फ़ायदे' की बात है।
 
कांग्रेस को गठबंधन से दूर रखने के बाद यदि सपा और बसपा दोनों मिलकर चुनाव लड़ते हैं, तो दोनों ही पार्टियों को कुल 41.80 प्रतिशत वोट होते हैं जो कि 2014 में अकेले भाजपा को मिले 42.30 प्रतिशत वोट से कम हैं। साथ ही कांग्रेस के अलग होने से भाजपा विरोधी वोटों का ध्रुवीकरण होने से सपा-बसपा के गठबंधन को 'नुकसान' उठाना पड़ सकता है।
 
इतना ही नहीं, अखिलेश यादव के चाचा और मुलायम सिंह यादव के भाई शिवपाल यादव की पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया भी सपा के वोट बैंक में सेंध लगाएगी जिसका फ़ायदा भाजपा को मिलना तय है। जैसा कि आप जानते हैं कि यूपी में इस समय योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार पूर्ण बहुमत में है। ऐसे में 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान यूपी की जनता इस मानसिकता के साथ वोटिंग कर सकती है कि राज्य में भाजपा सरकार है तो केन्द्र में भी भाजपा सरकार होने से राज्य को फ़ायदा मिलेगा, ऐसे में भाजपा के लिए यूपी में सरकार होने का लाभ मिल सकता है।
 
कुल मिलाकर यदि देखा जाए तो कांग्रेस का सपा-बसपा के गठबंधन से दूर होना भाजपा और खासतौर से नरेन्द्र मोदी के लिए फ़ायदेमंद साबित हो सकता है। जहां एक तरफ़ कांग्रेस के गठबंधन से दूर होने से भाजपा विरोधी वोटों का ध्रुवीकरण होगा, वहीं दूसरी तरफ़ सपा-बसपा के बीच वैचारिक लड़ाई का फ़ायदा भाजपा को ज़मीनी स्तर पर मिलेगा क्योंकि सपा-बसपा के कार्यकर्ताओं का साथ मिलकर काम करना हमेशा से ही मुश्किल रहा है। अब देखना होगा कि सपा-बसपा के गठबंधन से कांग्रेस के दूर होने का कितना फ़ायदा भाजपा 2019 के लोकसभा चुनाव में उठा पाती है।