विश्लेषण: क्या पश्चिम एशिया से मोहभंग हो गया है अमेरिका का?
Friday - December 21, 2018 12:39 pm ,
Category : WTN HINDI
पश्चिम एशिया के लिए ‘बदली’ डोनाल्ड ट्रम्प ने ‘विदेश नीति’!
बड़ा सवाल: सीरिया और अफगानिस्तान से सैनिकों की वापसी के पीछे कहीं रूस और चीन का ‘ख़तरा’ तो नहीं है वज़ह?
DEC 21 (WTN) – अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कब कौन सा फ़ैसला ले लें इसके बारे में कोई नहीं जानता। कभी ट्रम्प अमेरिका के परम्परागत दुश्मन रहे उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति किम जोंग उन से मिलने जाते हैं, तो कभी मैक्सिको से आ रहे शरणार्थियों के ख़िलाफ़ विवादित निर्णय ले लेते हैं। इधर अपने नये फ़ैसले से डोनाल्ड ट्रम्प ने सारी दुनिया को चौका दिया है। अमेरिकी मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, सीरिया के बाद अमेरिका अफगानिस्तान से भी अपने सैनिकों को वापस बुलाने वाला है। अफगानिस्तान से अमेरिका अपने 7000 सैनिकों को वापस बुलाने की तैयारी में है, अमेरिकी सैनिकों की यह संख्या भारत के मित्र देश अफगानिस्तान में मौजूद कुल अमेरिकी सैनिकों की लगभग आधी है।
अमेरिकी मीडिया न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार इसकी जानकारी उन्हें दो रक्षा अधिकारियों ने दी है। एक अधिकारी ने इस बारे में कहा कि ट्रम्प ने यह फ़ैसला उसी समय किया जब उन्होंने सीरिया से अमेरिकी फौज को वापस बुलाने का फ़ैसला लिया। कहा जा रहा है कि इन फ़ैसलों को उस मुहिम की ओर पहला क़दम माना जा रहा है, जिसके तहत अमेरिका 17 साल से अफगानिस्तान में चल रहे उसके 'युद्ध' को समाप्त कर सकता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अफगानिस्तान में मौजूद 14,000 अमेरिकी सैनिकों का काम अफगानी सेना को ट्रेनिंग देने से लेकर ISIS और अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों के ख़िलाफ़ अफगानिस्तान के अभियान में उन्हें 'सलाह' देना है। अमेरिकी मीडिया के अनुसार रक्षा अधिकारी का कहना है कि अमेरिकी फ़ौज को वापस बुलाने के फ़ैसले के पीछे कोशिश यह है कि अफगानिस्तान अपनी ख़ुद की फ़ौज पर ज़्यादा निर्भर हो सके और पश्चिमी देशों के सहयोग पर उसकी 'निर्भरता' जल्द से जल्द कम हो।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अफगानिस्तान से अमेरिका के 7000 सैनिकों को हटाने का फ़ैसला क्यों किया इसका जवाब तो वो ही बेहतर तरीक़े से दे सकते हैं। लेकिन यदि अफगानिस्तान से अमेरिकी की फ़ौज कम होगी या फ़िर पूरी तरह से चली जाएगी, तो इसका सबसे ज़्यादा नुकसान अफगानिस्तान को उठाना पड़ेगा।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि साल 2014 से अमेरिकी फ़ौज ने सीधे तौर पर अफगानिस्तान में सैन्य अभियानों में हिस्सा लेना बंद कर दिया था। इसके बाद से 25,000 अफगानी सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। यदि अमेरिका पूरी तरह से अपनी फ़ौज को अफगानिस्तान से निकाल लेगा, तो ISIS, अलकायदा और तालिबान जैसे आतंकी संगठनों के ख़िलाफ़ अफगानिस्तान की फ़ौज उतनी कारगर साबित नहीं हो सकेंगी।
इधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सीरिया से क़रीब 2,000 अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने का फ़ैसला किया है, जिसके बाद अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के साथ-साथ घरेलू सांसद भी हैरान हैं। हालांकि इस बारे में ट्रम्प का कहना है कि इसमें कुछ भी हैरानी की बात नहीं है क्योंकि इसकी तैयारी पहले से ही की जा रही थी। अमेरिका का तर्क है कि सीरिया में अमेरिका ने इस्लामिक स्टेट पर 'अपने हिस्से की जंग' में जीत हासिल कर ली है और अब स्थानीय ताक़तों को ही उनसे मुक़ाबला करना होगा।
वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने यह भी कहा, “सीरिया में अमेरिकी सैनिक उन लोगों के लिए अपनी जान दे रहे हैं, जो इसकी कीमत जानते ही नहीं।” उन्होंने यह भी कहा, “वहां अमेरिकी सैनिक वास्तव में 'रूस, ईरान, सीरिया' की ही मदद कर रहे थे, जिसकी अब ज़रूरत नहीं रह गई है।” उन्होंने यह कहकर अपने विवादित फैसले का बचाव किया, “अमेरिका ने पश्चिम एशिया की रखवाली का ठेका नहीं ले रखा है।”
इन सबके बीच अमेरिका के रक्षा मंत्री जिम मैटिस ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है। माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर उनकी राय अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से मेल नहीं खाती थी, जिसकी वजह से उन्होंने ट्रम्प प्रशासन से 'अलग' होने का फ़ैसला किया। हालांकि वह अपने पद पर फरवरी 2019 तक बने रहेंगे और इस बीच डोनाल्ड ट्रम्प अपने प्रशासन के लिए नए विदेश मंत्री को नामित करेंगे, जिसे सीनेट से मंज़ूरी मिलना ज़रूरी होगा।
पहले सीरिया से सैनिकों की वापसी और अब उसके बाद अफगानिस्तान से, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के इन दोनों ही फ़ैसलों पर पूरी दुनिया आश्चर्यचकित है। सालों से देखा जा रहा है कि अमेरिका पश्चिम एशिया के मामलों में 'दखल' देता आया है और पश्चिम एशिया के कई देशों में अमेरिकी सैनिकों को तैनाती रही है। ऐसे में अचानक अमेरिका की विदेश नीति में 'बदलाव' से सभी विचार करने पर मज़बूर हो गये हैं ऐसा फ़ैसला डोनाल्ड ट्रम्प ने क्यों किया।
इधर डोनाल्ड ट्रम्प के फ़ैसले को समयपूर्व बताकर उसकी आलोचना किए जाने के बाद व्हाइट हाउस ने बयान जारी कर कहा, ”सीरिया से अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने का राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का फ़ैसला अमेरिकी नीतियों के 'अनुरूप' है, क्योंकि युद्ध से जर्जर इस देश में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी आईएसआईएस को 'खत्म' करने के लिए थी, गृह युद्ध को समाप्त करने के लिए नहीं।”
कहा जा रहा है कि सालों से पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैनिकों की मौज़ूदगी और वहां पर युद्ध और आतंकी हमलों में सैनिकों की मौत के कारण अमेरिका में रोष है। वहां की जनता चाहती है कि अमेरिका को अपने सैनिक और आर्थिक संसाधनों को ऐसे देशों पर बर्बाद नहीं करना चाहिए जिसकी उन्हें कद्र ना हो। ऐसे में हो सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सीरिया और अफगानिस्तान से सैनिकों को हटाने की फ़ैसला लिया हो।
कहा यह भी जा रहा है कि अमेरिका रूस और चीन से बढ़ते ख़तरे को देखते हुए अपने इन दोनों देशों की तरफ़ ध्यान देने की तैयारी में है इसलिए वो पश्चिम एशिया के देशों से अपने सैनिकों को धीरे-धीरे वापस बुला रहा है। खैर कारण जो भी हो, लेकिन अमेरिका का सीरिया और अफगानिस्तान से सैैनिकों को कम करना कहीं ना कहीं अमेरिकी विदेश नीति में बहुत बड़े परिवर्तन का आगाज़ है।
DEC 21 (WTN) – अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कब कौन सा फ़ैसला ले लें इसके बारे में कोई नहीं जानता। कभी ट्रम्प अमेरिका के परम्परागत दुश्मन रहे उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति किम जोंग उन से मिलने जाते हैं, तो कभी मैक्सिको से आ रहे शरणार्थियों के ख़िलाफ़ विवादित निर्णय ले लेते हैं। इधर अपने नये फ़ैसले से डोनाल्ड ट्रम्प ने सारी दुनिया को चौका दिया है। अमेरिकी मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, सीरिया के बाद अमेरिका अफगानिस्तान से भी अपने सैनिकों को वापस बुलाने वाला है। अफगानिस्तान से अमेरिका अपने 7000 सैनिकों को वापस बुलाने की तैयारी में है, अमेरिकी सैनिकों की यह संख्या भारत के मित्र देश अफगानिस्तान में मौजूद कुल अमेरिकी सैनिकों की लगभग आधी है।
अमेरिकी मीडिया न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार इसकी जानकारी उन्हें दो रक्षा अधिकारियों ने दी है। एक अधिकारी ने इस बारे में कहा कि ट्रम्प ने यह फ़ैसला उसी समय किया जब उन्होंने सीरिया से अमेरिकी फौज को वापस बुलाने का फ़ैसला लिया। कहा जा रहा है कि इन फ़ैसलों को उस मुहिम की ओर पहला क़दम माना जा रहा है, जिसके तहत अमेरिका 17 साल से अफगानिस्तान में चल रहे उसके 'युद्ध' को समाप्त कर सकता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अफगानिस्तान में मौजूद 14,000 अमेरिकी सैनिकों का काम अफगानी सेना को ट्रेनिंग देने से लेकर ISIS और अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों के ख़िलाफ़ अफगानिस्तान के अभियान में उन्हें 'सलाह' देना है। अमेरिकी मीडिया के अनुसार रक्षा अधिकारी का कहना है कि अमेरिकी फ़ौज को वापस बुलाने के फ़ैसले के पीछे कोशिश यह है कि अफगानिस्तान अपनी ख़ुद की फ़ौज पर ज़्यादा निर्भर हो सके और पश्चिमी देशों के सहयोग पर उसकी 'निर्भरता' जल्द से जल्द कम हो।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अफगानिस्तान से अमेरिका के 7000 सैनिकों को हटाने का फ़ैसला क्यों किया इसका जवाब तो वो ही बेहतर तरीक़े से दे सकते हैं। लेकिन यदि अफगानिस्तान से अमेरिकी की फ़ौज कम होगी या फ़िर पूरी तरह से चली जाएगी, तो इसका सबसे ज़्यादा नुकसान अफगानिस्तान को उठाना पड़ेगा।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि साल 2014 से अमेरिकी फ़ौज ने सीधे तौर पर अफगानिस्तान में सैन्य अभियानों में हिस्सा लेना बंद कर दिया था। इसके बाद से 25,000 अफगानी सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। यदि अमेरिका पूरी तरह से अपनी फ़ौज को अफगानिस्तान से निकाल लेगा, तो ISIS, अलकायदा और तालिबान जैसे आतंकी संगठनों के ख़िलाफ़ अफगानिस्तान की फ़ौज उतनी कारगर साबित नहीं हो सकेंगी।
इधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सीरिया से क़रीब 2,000 अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने का फ़ैसला किया है, जिसके बाद अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के साथ-साथ घरेलू सांसद भी हैरान हैं। हालांकि इस बारे में ट्रम्प का कहना है कि इसमें कुछ भी हैरानी की बात नहीं है क्योंकि इसकी तैयारी पहले से ही की जा रही थी। अमेरिका का तर्क है कि सीरिया में अमेरिका ने इस्लामिक स्टेट पर 'अपने हिस्से की जंग' में जीत हासिल कर ली है और अब स्थानीय ताक़तों को ही उनसे मुक़ाबला करना होगा।
वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने यह भी कहा, “सीरिया में अमेरिकी सैनिक उन लोगों के लिए अपनी जान दे रहे हैं, जो इसकी कीमत जानते ही नहीं।” उन्होंने यह भी कहा, “वहां अमेरिकी सैनिक वास्तव में 'रूस, ईरान, सीरिया' की ही मदद कर रहे थे, जिसकी अब ज़रूरत नहीं रह गई है।” उन्होंने यह कहकर अपने विवादित फैसले का बचाव किया, “अमेरिका ने पश्चिम एशिया की रखवाली का ठेका नहीं ले रखा है।”
इन सबके बीच अमेरिका के रक्षा मंत्री जिम मैटिस ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है। माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर उनकी राय अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से मेल नहीं खाती थी, जिसकी वजह से उन्होंने ट्रम्प प्रशासन से 'अलग' होने का फ़ैसला किया। हालांकि वह अपने पद पर फरवरी 2019 तक बने रहेंगे और इस बीच डोनाल्ड ट्रम्प अपने प्रशासन के लिए नए विदेश मंत्री को नामित करेंगे, जिसे सीनेट से मंज़ूरी मिलना ज़रूरी होगा।
पहले सीरिया से सैनिकों की वापसी और अब उसके बाद अफगानिस्तान से, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के इन दोनों ही फ़ैसलों पर पूरी दुनिया आश्चर्यचकित है। सालों से देखा जा रहा है कि अमेरिका पश्चिम एशिया के मामलों में 'दखल' देता आया है और पश्चिम एशिया के कई देशों में अमेरिकी सैनिकों को तैनाती रही है। ऐसे में अचानक अमेरिका की विदेश नीति में 'बदलाव' से सभी विचार करने पर मज़बूर हो गये हैं ऐसा फ़ैसला डोनाल्ड ट्रम्प ने क्यों किया।
इधर डोनाल्ड ट्रम्प के फ़ैसले को समयपूर्व बताकर उसकी आलोचना किए जाने के बाद व्हाइट हाउस ने बयान जारी कर कहा, ”सीरिया से अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने का राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का फ़ैसला अमेरिकी नीतियों के 'अनुरूप' है, क्योंकि युद्ध से जर्जर इस देश में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी आईएसआईएस को 'खत्म' करने के लिए थी, गृह युद्ध को समाप्त करने के लिए नहीं।”
कहा जा रहा है कि सालों से पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैनिकों की मौज़ूदगी और वहां पर युद्ध और आतंकी हमलों में सैनिकों की मौत के कारण अमेरिका में रोष है। वहां की जनता चाहती है कि अमेरिका को अपने सैनिक और आर्थिक संसाधनों को ऐसे देशों पर बर्बाद नहीं करना चाहिए जिसकी उन्हें कद्र ना हो। ऐसे में हो सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सीरिया और अफगानिस्तान से सैनिकों को हटाने की फ़ैसला लिया हो।
कहा यह भी जा रहा है कि अमेरिका रूस और चीन से बढ़ते ख़तरे को देखते हुए अपने इन दोनों देशों की तरफ़ ध्यान देने की तैयारी में है इसलिए वो पश्चिम एशिया के देशों से अपने सैनिकों को धीरे-धीरे वापस बुला रहा है। खैर कारण जो भी हो, लेकिन अमेरिका का सीरिया और अफगानिस्तान से सैैनिकों को कम करना कहीं ना कहीं अमेरिकी विदेश नीति में बहुत बड़े परिवर्तन का आगाज़ है।