आज़ादी के सालों बाद टीटीई को मिल सकता है उनका ‘अधिकार’
Tuesday - December 25, 2018 12:13 pm ,
Category : WTN HINDI
टीटीई को मिल सकता है’ रनिंग स्टाफ’ का दर्जा
टीटीई को ‘रनिंग स्टाफ’ का दर्जा दिलाने रेलवे ने किया समिति का गठन
DEC 25 (WTN) – भारत देश को आज़ाद हुए 70 साल हो गये हैं, लेकिन आज भी देश में अंग्रेजों के समय के कई ऐसे क़ानून और नियम चल रहे हैं जो कि भारतीयों के ख़िलाफ़ बनाए गये थे। समय-समय पर मांग उठती रही है कि अंग्रजों के समय से चले आ रहे उन क़ानूनों और नियमों को बदला जाए जो कि अंग्रेजों ने ब्रिटिश साम्राज्य के हित के लिए बनाए थे, लेकिन मांग बस मांग ही रह जाती है।
जब देश परतंत्र था तब अंग्रेजों ने अपने राज्य को बचाने के लिए तरह-तरह के ऐसे नियमों को बनाया था जो कि ब्रिटिश राज्य के अस्तित्व के लिए ज़रूरी थे, लेकिन देश आज़ाद होने के इतने सालों के बाद भी कई नियम ऐसे हैं जो कि अंग्रेजों ने भारतीयों के ख़िलाफ़ बनाए थे, लेकिन देश की सरकारों की संवेदनहीनता के कारण वे नियम आज भी लागू हैं।
इसी तरह का एक नियम लागू था ट्रेन में चलने वाले टीटीई स्टाफ के साथ। साल 1931 तक ट्रेनों में चलने वाले टीटीई को रनिंग स्टाफ का दर्जा मिला था। लेकिन उस समय स्वतंत्रता सेनानियों की मदद करने के आरोप में उनसे यह अधिकार छीन लिया गया। टिकट जांचकर्ताओं पर आरोप था कि वह स्वतंत्रता सेनानियों को ट्रेन में सीट दिलवाते हैं और उनके सामान को एक जगह से दूसरे जगह पहुंचाने में मदद करते हैं।
अंग्रेजी राज में स्वतंत्रता सेनानियों की मदद करने की वजह से 87 साल पहले भारतीय रेलवे के टिकट जांचकर्ताओं का रनिंग स्टाफ का दर्जा साल 1931 में छीन लिया गया था। लेकिन आज़ादी के 70 सालों तक वही प्रथा चलती रही और चलती ट्रेन में ड्यूटी करने वाले टीटीई को ‘रनिंग स्टाफ’ का दर्जा नहीं मिला। लेकिन रनिंग स्टाफ का दर्जा छीन जाने के 87 सालों बाद और देश की आज़ादी के 70 सालों के बाद टीटीई को रनिंग स्टाफ का दर्जा मिलने की आशा जागी है।
टीटीई को रनिंग स्टाफ का दर्जा मिले इस सम्बन्ध में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी समेत क़रीब 100 सांसदों ने रेल मंत्री से टीटीई को दोबारा से रनिंग स्टाफ का दर्जा देने के लिए पत्र लिखा था। जिसके बाद रेल मंत्रालय ने एक समिति का गठन किया है जिसे तीन महीने के अंदर अपनी सिफ़ारिश देना है। अगर समिति ने टीटीई को रनिंग स्टाफ का दर्जा फ़िर से देने की सिफ़ारिश कर दी और सिफ़ारिश मंज़ूर हो गई तो टीटीई को दोबारा से रनिंग स्टाफ का दर्जा मिल सकता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि लोको ड्राइवर, असिस्टेंट लोको ड्राइवर, गार्ड, ब्रेक्समैन और अन्य जो ट्रेन चलाने में मदद करते हैं, उन्हें रेलवे की भाषा में ‘रनिंग स्टाफ’ कहा जाता है। जानकारी के मुताबिक़ रनिंग स्टाफ को अधिक भत्ते, वातानुकूलित रेस्ट रूम और काफ़ी सुविधाएं मिलती हैं।
टीटीई के मुकाबले रनिंग स्टाफ के ड्राइवर और गार्ड की सैलरी 30 प्रतिशत ज़्यादा होती है। रनिंग स्टाफ को सिर्फ़ 10 घण्टे ही काम करना होता है और ट्रेन के लेट होने पर उन्हें रिलीवर भी मिलता है। इतना ही नहीं, रनिंग स्टाफ की तुलना में टीटीई का दैनिक भत्ता भी काफ़ी कम होता है, वहीं टीटीई को रनिंग स्टाफ के मुक़ाबले कम पेंशन मिलती है।
भारत की तुलना में पाकिस्तान और बांग्लादेश ने अंग्रेजों के जमाने के बनाए इस साम्राज्यवादी नियम को काफ़ी पहले ही हटा दिया था। भारत से अलग होकर बने पाकिस्तान ने साल 1962 में टीटीई को रनिंग स्टाफ का दर्जा दे दिया था, जबकि साल 2004 में बांग्लादेश ने भी टीटीई को रनिंग स्टाफ का दर्जा देते हुए उन्हें रनिंग स्टाफ की मिलने वाली तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराईं।
भारत देश को आज़ाद हुए 70 साल हो गये, लेकिन देश में अभी भी कई क़ानून और नियम ऐसे चल रहे हैं जो कि अंग्रेजों ने ब्रिटिश साम्राज्य के हित के लिए बनाए थे। इन क़ानूनों और नियमों को काफ़ी समय पहले ही बदल दिया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। खैर देर से ही सही लेकिन अब टीटीई को रनिंग स्टाफ का दर्जा मिलेगा जिसके वे हक़दार हैं। साथ ही टीटीई स्टाफ को गर्व करना चाहिए कि आज़ादी के पहले काम करने वाले कई टीटीई लोगों ने स्वतंत्रता सेनानियों का साथ दिया था जिसके कारण हम आज आज़ाद भारत में सांस ले पा रहे हैं।
DEC 25 (WTN) – भारत देश को आज़ाद हुए 70 साल हो गये हैं, लेकिन आज भी देश में अंग्रेजों के समय के कई ऐसे क़ानून और नियम चल रहे हैं जो कि भारतीयों के ख़िलाफ़ बनाए गये थे। समय-समय पर मांग उठती रही है कि अंग्रजों के समय से चले आ रहे उन क़ानूनों और नियमों को बदला जाए जो कि अंग्रेजों ने ब्रिटिश साम्राज्य के हित के लिए बनाए थे, लेकिन मांग बस मांग ही रह जाती है।
जब देश परतंत्र था तब अंग्रेजों ने अपने राज्य को बचाने के लिए तरह-तरह के ऐसे नियमों को बनाया था जो कि ब्रिटिश राज्य के अस्तित्व के लिए ज़रूरी थे, लेकिन देश आज़ाद होने के इतने सालों के बाद भी कई नियम ऐसे हैं जो कि अंग्रेजों ने भारतीयों के ख़िलाफ़ बनाए थे, लेकिन देश की सरकारों की संवेदनहीनता के कारण वे नियम आज भी लागू हैं।
इसी तरह का एक नियम लागू था ट्रेन में चलने वाले टीटीई स्टाफ के साथ। साल 1931 तक ट्रेनों में चलने वाले टीटीई को रनिंग स्टाफ का दर्जा मिला था। लेकिन उस समय स्वतंत्रता सेनानियों की मदद करने के आरोप में उनसे यह अधिकार छीन लिया गया। टिकट जांचकर्ताओं पर आरोप था कि वह स्वतंत्रता सेनानियों को ट्रेन में सीट दिलवाते हैं और उनके सामान को एक जगह से दूसरे जगह पहुंचाने में मदद करते हैं।
अंग्रेजी राज में स्वतंत्रता सेनानियों की मदद करने की वजह से 87 साल पहले भारतीय रेलवे के टिकट जांचकर्ताओं का रनिंग स्टाफ का दर्जा साल 1931 में छीन लिया गया था। लेकिन आज़ादी के 70 सालों तक वही प्रथा चलती रही और चलती ट्रेन में ड्यूटी करने वाले टीटीई को ‘रनिंग स्टाफ’ का दर्जा नहीं मिला। लेकिन रनिंग स्टाफ का दर्जा छीन जाने के 87 सालों बाद और देश की आज़ादी के 70 सालों के बाद टीटीई को रनिंग स्टाफ का दर्जा मिलने की आशा जागी है।
टीटीई को रनिंग स्टाफ का दर्जा मिले इस सम्बन्ध में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी समेत क़रीब 100 सांसदों ने रेल मंत्री से टीटीई को दोबारा से रनिंग स्टाफ का दर्जा देने के लिए पत्र लिखा था। जिसके बाद रेल मंत्रालय ने एक समिति का गठन किया है जिसे तीन महीने के अंदर अपनी सिफ़ारिश देना है। अगर समिति ने टीटीई को रनिंग स्टाफ का दर्जा फ़िर से देने की सिफ़ारिश कर दी और सिफ़ारिश मंज़ूर हो गई तो टीटीई को दोबारा से रनिंग स्टाफ का दर्जा मिल सकता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि लोको ड्राइवर, असिस्टेंट लोको ड्राइवर, गार्ड, ब्रेक्समैन और अन्य जो ट्रेन चलाने में मदद करते हैं, उन्हें रेलवे की भाषा में ‘रनिंग स्टाफ’ कहा जाता है। जानकारी के मुताबिक़ रनिंग स्टाफ को अधिक भत्ते, वातानुकूलित रेस्ट रूम और काफ़ी सुविधाएं मिलती हैं।
टीटीई के मुकाबले रनिंग स्टाफ के ड्राइवर और गार्ड की सैलरी 30 प्रतिशत ज़्यादा होती है। रनिंग स्टाफ को सिर्फ़ 10 घण्टे ही काम करना होता है और ट्रेन के लेट होने पर उन्हें रिलीवर भी मिलता है। इतना ही नहीं, रनिंग स्टाफ की तुलना में टीटीई का दैनिक भत्ता भी काफ़ी कम होता है, वहीं टीटीई को रनिंग स्टाफ के मुक़ाबले कम पेंशन मिलती है।
भारत की तुलना में पाकिस्तान और बांग्लादेश ने अंग्रेजों के जमाने के बनाए इस साम्राज्यवादी नियम को काफ़ी पहले ही हटा दिया था। भारत से अलग होकर बने पाकिस्तान ने साल 1962 में टीटीई को रनिंग स्टाफ का दर्जा दे दिया था, जबकि साल 2004 में बांग्लादेश ने भी टीटीई को रनिंग स्टाफ का दर्जा देते हुए उन्हें रनिंग स्टाफ की मिलने वाली तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराईं।
भारत देश को आज़ाद हुए 70 साल हो गये, लेकिन देश में अभी भी कई क़ानून और नियम ऐसे चल रहे हैं जो कि अंग्रेजों ने ब्रिटिश साम्राज्य के हित के लिए बनाए थे। इन क़ानूनों और नियमों को काफ़ी समय पहले ही बदल दिया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। खैर देर से ही सही लेकिन अब टीटीई को रनिंग स्टाफ का दर्जा मिलेगा जिसके वे हक़दार हैं। साथ ही टीटीई स्टाफ को गर्व करना चाहिए कि आज़ादी के पहले काम करने वाले कई टीटीई लोगों ने स्वतंत्रता सेनानियों का साथ दिया था जिसके कारण हम आज आज़ाद भारत में सांस ले पा रहे हैं।