मंत्रिमण्डल गठन में कहीं ‘चूक’ तो नहीं गये कमलनाथ?
Thursday - December 27, 2018 12:37 pm ,
Category : WTN HINDI
मुख्यमंत्री कमलनाथ पर सभी को खुश रखने की ‘बड़ी ज़िम्मेदारी’
10 लोकसभा सीटों को नहीं मिला कमलनाथ मंत्रिमण्डल में प्रतिनिधित्व
DEC 27 (WTN) – मध्य प्रदेश में 15 सालों के बाद बड़ी जोड़ तोड़ से सरकार बना पाई कांग्रेस ने राज्य में मंत्रिमण्डल का गठन तो कर लिया है, लेकिन मंत्रिमण्डल गठन के बाद 'नाराज़गी' का दौर जारी है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने मंत्रिमण्डल के गठन के वक़्त पूरी कोशिश करते हुए क्षेत्रीय,जातिगत और गुटबाजी को संतुलित रखने की पूरी कोशिश कि ताकि मंत्रिमण्डल के गठन के बाद 'नाराज़गी' ना हो और सरकार आसानी से चल सके। कहा जा सकता है कि इन बातों पर तो कमलनाथ खरा उतरे हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव के दृष्टिकोण से कमलनाथ अपने मंत्रिमण्डल में 'सामंजस्य' नहीं बैठा सके।
यदि कमलनाथ मंत्रिमण्डल के 28 मंत्रियों के लोकसभा सीटों से प्रतिनिधित्व पर नज़र डाली जाए, तो कमलनाथ मंत्रिमण्डल में 10 लोकसभा क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व ही नहीं मिल सका है। जबकि कुछ संसदीय क्षेत्रों से तो दो-दो मंत्री बनाए गये हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक़ इसका पार्टी के अंदर ही 'विरोध' शुरू हो गया है और इसका 'नुकसान' कांग्रेस को 2019 के लोकसभा चुनाव में उठाना पड़ सकता है।
मुख्यमंत्री कमलनाथ के मंत्रिमण्डल में 28 मंत्री हैं जिनकी विधानसभा सीट अलग-अलग 16 संसदीय क्षेत्रों में है, लेकिन कमलनाथ के मंत्रिमण्डल में मुरैना, दमोह, सतना, शहडोल, खजुराहो, होशंगाबाद, उज्जैन, मंदसौर, खण्डवा और रतलाम-झाबुआ संसदीय क्षेत्र की विधानसभा सीटों से जीतकर आए विधायकों को जगह नहीं मिली है। साथ ही रीवा संसदीय क्षेत्र से भी कोई मंत्री नहीं है, ऐसा इसलिए क्योंकि यहां से एक भी कांग्रेस प्रत्याशी जीत हासिल नहीं कर सका है।
वहीं बात करें छिंदवाड़ा संसदीय क्षेत्र की तो यहां की सभी सात सीटों पर कांग्रेस ने जीत हासिल की है और यहां से कोई भी मंत्री नहीं है, लेकिन कहां जा सकता है कि छिंदवाड़ा क्षेत्र मुख्यमंत्री कमलनाथ का गढ़ है और वे विधानसभा चुनाव इसी ज़िले की किसी सीट से लड़ेंगे इसलिए चुंकि वे खुद मुख्यमंत्री हैं तो इस संसदीय सीट से उनका प्रतिनिधित्व माना जा सकता है।
जिन ससंदीय क्षेत्रों से कांग्रेस ने कोई भी मंत्री नहीं बनाया है यदि उन सीटों पर नज़र डाली जाई तो कई संसदीय क्षेत्रों में कांग्रेस ने आधे से ज़्यादा सीटों पर जीत हासिल की है। मुरैना संसदीय क्षेत्र की आठ में से सात सीटों पर कांग्रेस के प्रत्याशियों ने जीत हासिल की है, तो वहीं दमोह की आठ में से चार सीटों पर, सतना की सात में से दो सीटों पर, शहडोल की आठ में से चार सीटों पर, खजुराहो की आठ में से दो सीटों पर, होशंगाबाद की आठ में से तीन सीटों पर, छिंदवाड़ा की सातों सीटों पर, उज्जैन की आठ में से पांच सीटों पर, मंदसौर की आठ में से सिर्फ़ एक सीट पर, खण्डवा की आठ में से चार सीटों पर और रतलाम-झाबुआ की आठ में से पांच विधानसभा सीटों पर कांग्रेस ने जीत हासिल की है।
यदि इन संसदीय क्षेत्रों की विधानसभा सीटों का विश्लेषण किया जाए तो मुरैना संसदीय क्षेत्र की 8 में से 7 सीटों पर कांग्रेस को जीत हासिल हुई लेकिन यहां से किसी को मंत्री नहीं बनाया गया। उज्जैन और रतलाम-झाबुआ क्षेत्र की 8 में से 5 सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशी को जीत हासिल हुई,तो वहीं दमोह, शहडोल और खण्डवा संसदीय क्षेत्र की 8 में से 4 सीटों पर कांग्रेस जीती, लेकिन फ़िर भी इन संसदीय सीटों की विधानसभा सीटों पर जीते विधायकों को कमलनाथ ने अपने मंत्रिमण्डल में शामिल नहीं किया।
कहा जा रहा है कि क्षेत्रीय, जातीय और गुटीय संतुलन बनाने के बाद कमलनाथ के पास गुंजाइश नहीं बची थी कि अपने मंत्रिमण्डल में किसी और को जगह दे पाते। कहा यह भी जा रहा है कि जिन लोकसभा सीटों पर कांग्रेस कमज़ोर है वहां पर ज़्यादा फ़ोकस किया गया है, या फ़िर हो सकता है कि अगले साल नगरीय निकाय चुनाव को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने भोपाल, इन्दौर, जबलपुर और ग्वालियर पर ज़्यादा ध्यान दिया और वहां से ज़्यादा विधायकों को मंत्री बनाया।
खैर लेकिन राजनीति के कुशल खिलाड़ी कमलनाथ ने सोच समझकर ही अपने मंत्रिमण्डल का गठन किया होगा, अब देखना होगा कि जिन लोकसभा क्षेत्रों से कोई भी मंत्री नहीं बना है 2019 के लोकसभा चुनाव में उन क्षेत्रों के क्या कुछ परिणाम रहते हैं।
DEC 27 (WTN) – मध्य प्रदेश में 15 सालों के बाद बड़ी जोड़ तोड़ से सरकार बना पाई कांग्रेस ने राज्य में मंत्रिमण्डल का गठन तो कर लिया है, लेकिन मंत्रिमण्डल गठन के बाद 'नाराज़गी' का दौर जारी है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने मंत्रिमण्डल के गठन के वक़्त पूरी कोशिश करते हुए क्षेत्रीय,जातिगत और गुटबाजी को संतुलित रखने की पूरी कोशिश कि ताकि मंत्रिमण्डल के गठन के बाद 'नाराज़गी' ना हो और सरकार आसानी से चल सके। कहा जा सकता है कि इन बातों पर तो कमलनाथ खरा उतरे हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव के दृष्टिकोण से कमलनाथ अपने मंत्रिमण्डल में 'सामंजस्य' नहीं बैठा सके।
यदि कमलनाथ मंत्रिमण्डल के 28 मंत्रियों के लोकसभा सीटों से प्रतिनिधित्व पर नज़र डाली जाए, तो कमलनाथ मंत्रिमण्डल में 10 लोकसभा क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व ही नहीं मिल सका है। जबकि कुछ संसदीय क्षेत्रों से तो दो-दो मंत्री बनाए गये हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक़ इसका पार्टी के अंदर ही 'विरोध' शुरू हो गया है और इसका 'नुकसान' कांग्रेस को 2019 के लोकसभा चुनाव में उठाना पड़ सकता है।
मुख्यमंत्री कमलनाथ के मंत्रिमण्डल में 28 मंत्री हैं जिनकी विधानसभा सीट अलग-अलग 16 संसदीय क्षेत्रों में है, लेकिन कमलनाथ के मंत्रिमण्डल में मुरैना, दमोह, सतना, शहडोल, खजुराहो, होशंगाबाद, उज्जैन, मंदसौर, खण्डवा और रतलाम-झाबुआ संसदीय क्षेत्र की विधानसभा सीटों से जीतकर आए विधायकों को जगह नहीं मिली है। साथ ही रीवा संसदीय क्षेत्र से भी कोई मंत्री नहीं है, ऐसा इसलिए क्योंकि यहां से एक भी कांग्रेस प्रत्याशी जीत हासिल नहीं कर सका है।
वहीं बात करें छिंदवाड़ा संसदीय क्षेत्र की तो यहां की सभी सात सीटों पर कांग्रेस ने जीत हासिल की है और यहां से कोई भी मंत्री नहीं है, लेकिन कहां जा सकता है कि छिंदवाड़ा क्षेत्र मुख्यमंत्री कमलनाथ का गढ़ है और वे विधानसभा चुनाव इसी ज़िले की किसी सीट से लड़ेंगे इसलिए चुंकि वे खुद मुख्यमंत्री हैं तो इस संसदीय सीट से उनका प्रतिनिधित्व माना जा सकता है।
जिन ससंदीय क्षेत्रों से कांग्रेस ने कोई भी मंत्री नहीं बनाया है यदि उन सीटों पर नज़र डाली जाई तो कई संसदीय क्षेत्रों में कांग्रेस ने आधे से ज़्यादा सीटों पर जीत हासिल की है। मुरैना संसदीय क्षेत्र की आठ में से सात सीटों पर कांग्रेस के प्रत्याशियों ने जीत हासिल की है, तो वहीं दमोह की आठ में से चार सीटों पर, सतना की सात में से दो सीटों पर, शहडोल की आठ में से चार सीटों पर, खजुराहो की आठ में से दो सीटों पर, होशंगाबाद की आठ में से तीन सीटों पर, छिंदवाड़ा की सातों सीटों पर, उज्जैन की आठ में से पांच सीटों पर, मंदसौर की आठ में से सिर्फ़ एक सीट पर, खण्डवा की आठ में से चार सीटों पर और रतलाम-झाबुआ की आठ में से पांच विधानसभा सीटों पर कांग्रेस ने जीत हासिल की है।
यदि इन संसदीय क्षेत्रों की विधानसभा सीटों का विश्लेषण किया जाए तो मुरैना संसदीय क्षेत्र की 8 में से 7 सीटों पर कांग्रेस को जीत हासिल हुई लेकिन यहां से किसी को मंत्री नहीं बनाया गया। उज्जैन और रतलाम-झाबुआ क्षेत्र की 8 में से 5 सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशी को जीत हासिल हुई,तो वहीं दमोह, शहडोल और खण्डवा संसदीय क्षेत्र की 8 में से 4 सीटों पर कांग्रेस जीती, लेकिन फ़िर भी इन संसदीय सीटों की विधानसभा सीटों पर जीते विधायकों को कमलनाथ ने अपने मंत्रिमण्डल में शामिल नहीं किया।
कहा जा रहा है कि क्षेत्रीय, जातीय और गुटीय संतुलन बनाने के बाद कमलनाथ के पास गुंजाइश नहीं बची थी कि अपने मंत्रिमण्डल में किसी और को जगह दे पाते। कहा यह भी जा रहा है कि जिन लोकसभा सीटों पर कांग्रेस कमज़ोर है वहां पर ज़्यादा फ़ोकस किया गया है, या फ़िर हो सकता है कि अगले साल नगरीय निकाय चुनाव को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने भोपाल, इन्दौर, जबलपुर और ग्वालियर पर ज़्यादा ध्यान दिया और वहां से ज़्यादा विधायकों को मंत्री बनाया।
खैर लेकिन राजनीति के कुशल खिलाड़ी कमलनाथ ने सोच समझकर ही अपने मंत्रिमण्डल का गठन किया होगा, अब देखना होगा कि जिन लोकसभा क्षेत्रों से कोई भी मंत्री नहीं बना है 2019 के लोकसभा चुनाव में उन क्षेत्रों के क्या कुछ परिणाम रहते हैं।