मोदी सरकार की ‘सख्ती‘ लाई रंग, सरकारी बैंकों के एनपीए में हुई 23,860 करोड़ रुपये की ‘कमी’
Monday - December 31, 2018 11:19 am ,
Category : WTN HINDI
सरकारी बैंकों की रिकवरी में भी हुई उल्लेखनीय ‘वृद्धि’
नोटबंदी के बाद धीरे-धीरे पटरी पर आती भारतीय बैंकिंग व्यवस्था
DEC 31 (WTN) – मोदी सरकार की कोशिशों का ही नतीजा है कि सरकारी बैंकों के बैड लोन में तेज़ी से कमी देखी गई है और बैंक ज़्यादातर स्ट्रेस्ड असेट्स की पहचान कर चुके हैं। जानकारी के मुताबिक़ सरकारी बैंकों के ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) मार्च में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचने के बाद कम हो रहे हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि वित्तीय वर्ष 2019 की पहली छमाही में इसमें 23,860 करोड़ रुपये की कमी आई है जो कि अपने आप में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है।
मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़ बैड लोन की पहचान और उन्हें बैलेंस शीट में दिखाने का काम लगभग पूरा हो गया है। रिस्ट्रक्चर्ड स्टैंडर्ड असेट्स मार्च 2017 के 7 प्रतिशत के उच्चतम स्तर से सितम्बर 2018 तक गिरकर 0.59 प्रतिशत पर आ गये थे।
वित्त मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार जिन लोन अकाउंट्स की किस्त में 31 से 90 दिनों की देरी हुई है और जो अभी तक एनपीए नहीं बने हैं, वे लगातार पांच तिमाहियों में 61 प्रतिशत की गिरावट के साथ सितम्बर 2018 में 0.87 लाख करोड़ रुपये के रह गए थे, जबकि जून 2017 में ऐसा एनपीए 2.25 लाख करोड़ रुपये का था। इससे साफ़ जाहिर होता है कि अब नए बैड लोन बहुत कम बन रहे हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस वित्तीय वर्ष की पहली छमाही में सरकारी बैंकों ने रिकॉर्ड 60,726 करोड़ रुपयों की रिकवरी की है, जो साल भर पहले की इसी तिमाही में की गई रिकवरी का दोगुना है। जानकारी के अनुसार बैंकों का प्रोविजन कवरेज रेशियो (पीसीआर) मार्च 2015 में 46.04 प्रतिशत था, जो सितम्बर 2018 तक बढ़कर 66.85 प्रतिशत हो गया था। इसका मतलब यह है कि इससे बैंकों की 'नुकसान बर्दाश्त' करने की क्षमता में 'वृद्धि' हुई है।
इन दौरान पब्लिक सेक्टर बैंकों में सरकार और पैसे लगा रही है। केंद्र का मानना है कि इससे कम से कम दो या तीन बैंक रिज़र्व बैंक के प्रॉम्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) फ्रेमवर्क से इस वित्तीय वर्ष के ख़त्म होने से पहले बाहर आ जाएंगे। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि वित्त मंत्री अरुण जेटली पहले ही पब्लिक सेक्टर बैंकों में निवेश की बात कह चुके हैं साथ ही कहा जा रहा है कि कुछ पब्लिक सेक्टर बैंकों को इसके अलावा 41 हज़ार करोड़ रुपये भी दिये जाएंगे।
ऐसा करने से सरकारी बैंकों में केंद्र की ओर से लगाई जाने वाली रकम 65 हज़ार करोड़ से बढ़कर 1.06 लाख करोड़ रुपये हो जाएगी। इस मामले में वित्त मंत्री अरुण जेटली का कहना है कि इससे सरकारी बैंकों की लोन देने की क्षमता बढ़ेगी और वे रिज़र्व बैंक के पीसीए यानि कि प्रॉम्ट करेक्टिव एक्शन फ्रेमवर्क से भी बाहर आ पाएंगे।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पीसीए में उन बैंकों को डाला जाता है, जो कुछ मानकों का पालन नहीं कर पाते हैं। प्रॉम्ट करेक्टिव एक्शन यानि कि पीसीए फ्रेमवर्क में डाले जाने के बाद बैंकों के लोन देने और नई शाखाएं खोलने पर रोक लग जाती है।
जिस तरह से सरकारी बैंकों के ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) मार्च में 23,860 करोड़ रुपये की कमी आई है वो तारीफ़ के क़ाबिल है। जिस तरह से बैंकिंग सुधार के काम मोदी सरकार लगातार कर रही है उससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि धीरे-धीरे ही सही नोटबंदी के बाद भारतीय बैंकिंग व्यवस्था पटरी पर आती जा रही है और उसकी वित्तीय नुकसान बर्दाश्त करने की क्षमता में भी वृद्धि हुई है। यदि इसी तरीक़े से बैंकिंग सुधार होते रहे, तो आने वाले समय में सरकारी बैंकों में एनपीए का स्तर नियंत्रित लेवल में आ जाएगा।
DEC 31 (WTN) – मोदी सरकार की कोशिशों का ही नतीजा है कि सरकारी बैंकों के बैड लोन में तेज़ी से कमी देखी गई है और बैंक ज़्यादातर स्ट्रेस्ड असेट्स की पहचान कर चुके हैं। जानकारी के मुताबिक़ सरकारी बैंकों के ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) मार्च में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचने के बाद कम हो रहे हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि वित्तीय वर्ष 2019 की पहली छमाही में इसमें 23,860 करोड़ रुपये की कमी आई है जो कि अपने आप में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है।
मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़ बैड लोन की पहचान और उन्हें बैलेंस शीट में दिखाने का काम लगभग पूरा हो गया है। रिस्ट्रक्चर्ड स्टैंडर्ड असेट्स मार्च 2017 के 7 प्रतिशत के उच्चतम स्तर से सितम्बर 2018 तक गिरकर 0.59 प्रतिशत पर आ गये थे।
वित्त मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार जिन लोन अकाउंट्स की किस्त में 31 से 90 दिनों की देरी हुई है और जो अभी तक एनपीए नहीं बने हैं, वे लगातार पांच तिमाहियों में 61 प्रतिशत की गिरावट के साथ सितम्बर 2018 में 0.87 लाख करोड़ रुपये के रह गए थे, जबकि जून 2017 में ऐसा एनपीए 2.25 लाख करोड़ रुपये का था। इससे साफ़ जाहिर होता है कि अब नए बैड लोन बहुत कम बन रहे हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस वित्तीय वर्ष की पहली छमाही में सरकारी बैंकों ने रिकॉर्ड 60,726 करोड़ रुपयों की रिकवरी की है, जो साल भर पहले की इसी तिमाही में की गई रिकवरी का दोगुना है। जानकारी के अनुसार बैंकों का प्रोविजन कवरेज रेशियो (पीसीआर) मार्च 2015 में 46.04 प्रतिशत था, जो सितम्बर 2018 तक बढ़कर 66.85 प्रतिशत हो गया था। इसका मतलब यह है कि इससे बैंकों की 'नुकसान बर्दाश्त' करने की क्षमता में 'वृद्धि' हुई है।
इन दौरान पब्लिक सेक्टर बैंकों में सरकार और पैसे लगा रही है। केंद्र का मानना है कि इससे कम से कम दो या तीन बैंक रिज़र्व बैंक के प्रॉम्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) फ्रेमवर्क से इस वित्तीय वर्ष के ख़त्म होने से पहले बाहर आ जाएंगे। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि वित्त मंत्री अरुण जेटली पहले ही पब्लिक सेक्टर बैंकों में निवेश की बात कह चुके हैं साथ ही कहा जा रहा है कि कुछ पब्लिक सेक्टर बैंकों को इसके अलावा 41 हज़ार करोड़ रुपये भी दिये जाएंगे।
ऐसा करने से सरकारी बैंकों में केंद्र की ओर से लगाई जाने वाली रकम 65 हज़ार करोड़ से बढ़कर 1.06 लाख करोड़ रुपये हो जाएगी। इस मामले में वित्त मंत्री अरुण जेटली का कहना है कि इससे सरकारी बैंकों की लोन देने की क्षमता बढ़ेगी और वे रिज़र्व बैंक के पीसीए यानि कि प्रॉम्ट करेक्टिव एक्शन फ्रेमवर्क से भी बाहर आ पाएंगे।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पीसीए में उन बैंकों को डाला जाता है, जो कुछ मानकों का पालन नहीं कर पाते हैं। प्रॉम्ट करेक्टिव एक्शन यानि कि पीसीए फ्रेमवर्क में डाले जाने के बाद बैंकों के लोन देने और नई शाखाएं खोलने पर रोक लग जाती है।
जिस तरह से सरकारी बैंकों के ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) मार्च में 23,860 करोड़ रुपये की कमी आई है वो तारीफ़ के क़ाबिल है। जिस तरह से बैंकिंग सुधार के काम मोदी सरकार लगातार कर रही है उससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि धीरे-धीरे ही सही नोटबंदी के बाद भारतीय बैंकिंग व्यवस्था पटरी पर आती जा रही है और उसकी वित्तीय नुकसान बर्दाश्त करने की क्षमता में भी वृद्धि हुई है। यदि इसी तरीक़े से बैंकिंग सुधार होते रहे, तो आने वाले समय में सरकारी बैंकों में एनपीए का स्तर नियंत्रित लेवल में आ जाएगा।