विश्लेषण: लिव-इन रिलेशन पर सुप्रीम कोर्ट के ‘अहम फ़ैसले’ के बाद पुरुषों को मिलेगा ‘न्याय’
Thursday - January 3, 2019 2:03 pm ,
Category : WTN HINDI
लिव-इन में सहमति से बने शारीरिक सम्बन्ध आईपीसी की धारा 376 के तहत नहीं हैं अपराध – सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट: लिव-इन रिलेशन में मर्जी से बना शारीरिक सम्बन्ध दुष्कर्म नहीं
JAN 03 (WTN) – धीरे-धीरे आधुनिकता की ओर बढ़ रहे भारत में लिव-इन रिलेशन अब कोई नई बात नहीं रह गई है। क्या बड़े शहर और क्या छोटे शहर, हर कहीं आपको लिव-इन रिलेशन में रहने वाले कपल मिल जाएंगे। लेकिन लिव-इन रिलेशन के मामले बढ़ने के साथ-साथ कुछ समस्याएं भी बढ़ रही हैं, जैसे कि लिव-इन पार्टनर के बच्चों का होना और लिव-इन में रह रही महिला द्वारा साथी पुरुष पर 'दुष्कर्म' का आरोप लगाना।
लिव-इन रिलेशन में स्वाभाविक है कि महिला अपनी मर्जी से ही पुरुष के साथ रहती है। वहीं दोनों के बीच शारीरिक सम्बन्ध भी आपसी मर्जी से बनते हैं। लेकिन कई बार देखा गया है कि आपस में सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनने के बाद भी महिलाएं लिव-इन में रह रहे साथी पुरुष पर बलात्कार का आरोप लगा देती हैं, ऐसे में कई बार निर्दोष पुरुष को जेल और कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
लेकिन अब लिव-इन पार्टनर के बीच आपसी सहमति से बने सम्बन्ध को दुष्कर्म नहीं माना जाएगा। लिव-इन पार्टनर और उनके बीच सहमति से बनने वाले शारीरिक सम्बन्धों पर अपनी टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा है कि लिव-इन रिलेशन में रहने वाले पुरुष किसी कारणवश अपने महिला साथी से शादी करने में नाकाम है, तो ऐसे में मर्जी से बना रिश्ता दुष्कर्म नहीं कहलाएगा।
देश की सर्वोच्च अदालत ने महाराष्ट्र की एक नर्स द्वारा एक डॉक्टर के ख़िलाफ़ दर्ज एफआईआर को निरस्त करते हुए यह फैसला सुनाया, जो लिव-इन रिश्ते में रह रहे थे। अपने फ़ैसले में सुपीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया कि दुष्कर्म और सहमति से बने शारीरिक सम्बन्ध के बीच साफ़ अंतर है।
न्यायमूर्ति ए.के.सीकरी और एस.अब्दुल.नजीर ने अपने एक फ़ैसले में कहा कि ऐसे मामलों की बेहद सावधानीपूर्वक जांच होनी चाहिए कि शिकायतकर्ता वास्तव में आरोपी से शादी करना चाहती है या उसकी नीयत खराब थी। वहीं यह भी देखा जाना चाहिए कि आरोपी ने महज अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए सम्बन्ध बनाने को तो महिला को झांसा नहीं दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बलात्कार और सहमति से सेक्स के बीच एक स्पष्ट अंतर है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में बहुत सावधानी से जांच करनी चाहिए कि क्या शिकायतकर्ता वास्तव में पीड़ित से शादी करना चाहता था या उसके पास कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा था और उसने झूठा वादा किया था ताकि वह अपनी वासना को संतुष्ट कर सके।
कोर्ट ने लिव-इन रिलेशन में सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाए जाने पर कहा कि यदि आरोपी की मंशा ग़लत न हो, तो ऐसे मामलों की दुष्कर्म से अलग सुनवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि पुरुष ने ग़लत इरादे से सम्बन्ध बनाए हों, तो वह साफ़ तौर पर दुष्कर्म का मामला होगा।
दो जजों की पीठ ने अपने फ़ैसले में साफ़ कहा कि दो पक्षों के बीच सहमति से शारीरिक रिश्ते बनने पर इसे आईपीसी की धारा 376 (दुष्कर्म) के तहत अपराध नहीं माना जाएगा।
कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद उन झूठे मामलों पर रोक लगेगी जिसमें सहमति से सम्बन्ध बनने के बाद कई बार महिलाओं द्वारा बलात्कार का आरोप लिव-इन पार्टनर पर लगा दिया है। आधुनिकता के चलते देश में लिव-इन रिलेशन आम बात हो गई है और लिव-इन में शारीरिक सम्बन्ध बनना भी सामान्य सी बात है।
ऐसे में यदि पुरुष और महिला के बीच सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनने के बाद यदि महिला पुरुष पर दुष्कर्म का आरोप लगाए, तो यह 'विश्वासघात' की श्रेणी में आता है। लिव-इन रिलेशन में रहने और सहमति के बाद शारीरिक सम्बन्ध कई समय तक बनाने के बाद यदि कोई महिला साथी पुरुष पर दुष्कर्म का आरोप लगाती है, तो ऐसे मामलों में पुरुषों की 'सुरक्षा' के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा किया फ़ैसला अपने आप में एक 'नज़ीर' है।
देखा गया है कि महिला जब भी खुद के साथ दुष्कर्म होने का आरोप लगाती है, तो उसके साथ सहानुभूति होना स्वाभाविक है, लेकिन लिव-इन रिलेशन में सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाने के बाद यदि कोई महिला साथी पुरुष पर दुष्कर्म का आरोप लगाती है, तो साफ़ जाहिर होता है कि महिला साथी पुरुष को कहीं ना कहीं 'फंसाना' चाहती है।
सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फ़ैसले के बाद लिव-इन रिलेशन में सहमति से बने शारीरिक सम्बन्धों में इस तरह के 'झूठे' आरोपों में फंसने से पुरुष बच जाएंगे। लेकिन पुरुषों को इस तरफ़ ध्यान देना चाहिए कि यदि वे किसी महिला के साथ लिव-इन में रह रहे हैं, तो उसकी मर्यादा का पूरा ध्यान रखें।
यदि पुरुष विवाहित है तो वह अपनी लिव-इन साथी को पहले ही बता दे कि वो विवाहित है। साथ ही यदि पुरुष लिव-इन रिलेशन में साथी महिला के साथ सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाने का इच्छुक है, तो इस बात का भी ध्यान रखे कि महिला की इच्छा के बिना वो गर्भवती ना हो पाए।
लिव-इन रिलेशन पर किसी भी तरह की कोई भी पाबंदी नहीं है, लेकिन पुरुष और महिला दोनों को ही एक दूसरी की मर्यादा की तरफ़ ध्यान देना चाहिए। सहमति से यदि शारीरिक सम्बन्ध महिला और पुरुष के बीच बनते हैं, तो इसके बाद किसी भी तरह के दुष्कर्म या फ़िर धोखा देने की बात सामने नहीं आती। कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से पुरुषों को काफ़ी राहत मिलेगी।
JAN 03 (WTN) – धीरे-धीरे आधुनिकता की ओर बढ़ रहे भारत में लिव-इन रिलेशन अब कोई नई बात नहीं रह गई है। क्या बड़े शहर और क्या छोटे शहर, हर कहीं आपको लिव-इन रिलेशन में रहने वाले कपल मिल जाएंगे। लेकिन लिव-इन रिलेशन के मामले बढ़ने के साथ-साथ कुछ समस्याएं भी बढ़ रही हैं, जैसे कि लिव-इन पार्टनर के बच्चों का होना और लिव-इन में रह रही महिला द्वारा साथी पुरुष पर 'दुष्कर्म' का आरोप लगाना।
लिव-इन रिलेशन में स्वाभाविक है कि महिला अपनी मर्जी से ही पुरुष के साथ रहती है। वहीं दोनों के बीच शारीरिक सम्बन्ध भी आपसी मर्जी से बनते हैं। लेकिन कई बार देखा गया है कि आपस में सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनने के बाद भी महिलाएं लिव-इन में रह रहे साथी पुरुष पर बलात्कार का आरोप लगा देती हैं, ऐसे में कई बार निर्दोष पुरुष को जेल और कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
लेकिन अब लिव-इन पार्टनर के बीच आपसी सहमति से बने सम्बन्ध को दुष्कर्म नहीं माना जाएगा। लिव-इन पार्टनर और उनके बीच सहमति से बनने वाले शारीरिक सम्बन्धों पर अपनी टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा है कि लिव-इन रिलेशन में रहने वाले पुरुष किसी कारणवश अपने महिला साथी से शादी करने में नाकाम है, तो ऐसे में मर्जी से बना रिश्ता दुष्कर्म नहीं कहलाएगा।
देश की सर्वोच्च अदालत ने महाराष्ट्र की एक नर्स द्वारा एक डॉक्टर के ख़िलाफ़ दर्ज एफआईआर को निरस्त करते हुए यह फैसला सुनाया, जो लिव-इन रिश्ते में रह रहे थे। अपने फ़ैसले में सुपीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया कि दुष्कर्म और सहमति से बने शारीरिक सम्बन्ध के बीच साफ़ अंतर है।
न्यायमूर्ति ए.के.सीकरी और एस.अब्दुल.नजीर ने अपने एक फ़ैसले में कहा कि ऐसे मामलों की बेहद सावधानीपूर्वक जांच होनी चाहिए कि शिकायतकर्ता वास्तव में आरोपी से शादी करना चाहती है या उसकी नीयत खराब थी। वहीं यह भी देखा जाना चाहिए कि आरोपी ने महज अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए सम्बन्ध बनाने को तो महिला को झांसा नहीं दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बलात्कार और सहमति से सेक्स के बीच एक स्पष्ट अंतर है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में बहुत सावधानी से जांच करनी चाहिए कि क्या शिकायतकर्ता वास्तव में पीड़ित से शादी करना चाहता था या उसके पास कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा था और उसने झूठा वादा किया था ताकि वह अपनी वासना को संतुष्ट कर सके।
कोर्ट ने लिव-इन रिलेशन में सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाए जाने पर कहा कि यदि आरोपी की मंशा ग़लत न हो, तो ऐसे मामलों की दुष्कर्म से अलग सुनवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि पुरुष ने ग़लत इरादे से सम्बन्ध बनाए हों, तो वह साफ़ तौर पर दुष्कर्म का मामला होगा।
दो जजों की पीठ ने अपने फ़ैसले में साफ़ कहा कि दो पक्षों के बीच सहमति से शारीरिक रिश्ते बनने पर इसे आईपीसी की धारा 376 (दुष्कर्म) के तहत अपराध नहीं माना जाएगा।
कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद उन झूठे मामलों पर रोक लगेगी जिसमें सहमति से सम्बन्ध बनने के बाद कई बार महिलाओं द्वारा बलात्कार का आरोप लिव-इन पार्टनर पर लगा दिया है। आधुनिकता के चलते देश में लिव-इन रिलेशन आम बात हो गई है और लिव-इन में शारीरिक सम्बन्ध बनना भी सामान्य सी बात है।
ऐसे में यदि पुरुष और महिला के बीच सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनने के बाद यदि महिला पुरुष पर दुष्कर्म का आरोप लगाए, तो यह 'विश्वासघात' की श्रेणी में आता है। लिव-इन रिलेशन में रहने और सहमति के बाद शारीरिक सम्बन्ध कई समय तक बनाने के बाद यदि कोई महिला साथी पुरुष पर दुष्कर्म का आरोप लगाती है, तो ऐसे मामलों में पुरुषों की 'सुरक्षा' के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा किया फ़ैसला अपने आप में एक 'नज़ीर' है।
देखा गया है कि महिला जब भी खुद के साथ दुष्कर्म होने का आरोप लगाती है, तो उसके साथ सहानुभूति होना स्वाभाविक है, लेकिन लिव-इन रिलेशन में सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाने के बाद यदि कोई महिला साथी पुरुष पर दुष्कर्म का आरोप लगाती है, तो साफ़ जाहिर होता है कि महिला साथी पुरुष को कहीं ना कहीं 'फंसाना' चाहती है।
सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फ़ैसले के बाद लिव-इन रिलेशन में सहमति से बने शारीरिक सम्बन्धों में इस तरह के 'झूठे' आरोपों में फंसने से पुरुष बच जाएंगे। लेकिन पुरुषों को इस तरफ़ ध्यान देना चाहिए कि यदि वे किसी महिला के साथ लिव-इन में रह रहे हैं, तो उसकी मर्यादा का पूरा ध्यान रखें।
यदि पुरुष विवाहित है तो वह अपनी लिव-इन साथी को पहले ही बता दे कि वो विवाहित है। साथ ही यदि पुरुष लिव-इन रिलेशन में साथी महिला के साथ सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाने का इच्छुक है, तो इस बात का भी ध्यान रखे कि महिला की इच्छा के बिना वो गर्भवती ना हो पाए।
लिव-इन रिलेशन पर किसी भी तरह की कोई भी पाबंदी नहीं है, लेकिन पुरुष और महिला दोनों को ही एक दूसरी की मर्यादा की तरफ़ ध्यान देना चाहिए। सहमति से यदि शारीरिक सम्बन्ध महिला और पुरुष के बीच बनते हैं, तो इसके बाद किसी भी तरह के दुष्कर्म या फ़िर धोखा देने की बात सामने नहीं आती। कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से पुरुषों को काफ़ी राहत मिलेगी।