मध्य प्रदेश में स्पीकर के चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच अब ‘टक्कर’
Monday - January 7, 2019 3:02 pm ,
Category : WTN HINDI
शिवराज सिंह चौहान के विरोध के बावजूद भाजपा ने स्पीकर पद के लिए उतारा प्रत्याशी
कांग्रेस की तरफ़ से एनपी प्रजापति होंगे स्पीकर पद के उम्मीदार तो भाजपा ने विजय शाह पर लगाया दांव
JAN 07 (WTN) – मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद से लगातार राजनीतिक उठापटक का दौर जारी है। विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला जिसके बाद कांग्रेस ने निर्दलीय विधायकों के साथ-साथ बसपा और सपा के साथ मिलकर सरकार बनाई। कांग्रेस की बहुमत वाली सरकार के लिए हर समय एक चुनौती के रूप में एक मज़बूत विपक्ष के रूप में भाजपा सामने खड़ी है। विधानसभा चुनाव में जीत से बस चंद सीटें दूर रही भाजपा ने अब कांग्रेस को शुरू से ही घेरना की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है।
इसी क्रम में भाजपा ने स्पीकर पद के लिए अपना प्रत्याशी मैदान में उतार दिया है। मध्य प्रदेश में लगातार 15 सालों तक सत्ता का सुख भोगने वाली भाजपा, विधानसभा चुनाव में 109 सीटें ही जीत सकी। राज्य में बहुमत के लिए ज़रूरी 116 सीटों से भाजपा की 7 सीटें कम हैं तो वहीं कांग्रेस (114) से भाजपा की 5 सीटें कम हैं।
संख्याबल में कम होने के बाद भी भाजपा ने स्पीकर का चुनाव लड़कर यह साबित करने की कोशिश की है कि वह किसी भी तरह से कांग्रेस को वॉक ओवर देने के मूड में नहीं है। गठबंधन की सरकार चला रही कांग्रेस पर दबाव की राजनीति करने की रणनीति के तहत भाजपा ने स्पीकर पद के लिए आदिवासी नेता विजय शाह को उम्मीदवार बनाया है तो वहीं कांग्रेस ने गोटेगांव से विधायक एनपी प्रजापति को स्पीकर पद का प्रत्याशी बनाया है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एनपी प्रजापति एससी वर्ग से आते हैं जबकि विजय शाह एसटी वर्ग से आते हैँ। दोनों ही पार्टियों ने एससी-एसटी वर्ग के प्रत्याशी उतारकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि दोनों ही पार्टियां इस वर्ग की कितनी हितैषी हैं।
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 114 सीटों पर जीत हासिल की थी लेकिन वो बहुमत से 2 सीटें दूर रह गई थी जिसके बाद 4 निर्दलीय विधायकों के साथ-साथ बसपा के 2 और सपा के 1 विधायक का समर्थन कांग्रेस को मिल गया और उसने सरकार बना ली। यदि वर्तमान परिस्थिति पर ध्यान दिया जाए, तो कांग्रेस अपने विधायकों और समर्थक विधायकों की कथित एकजुटता के बाद मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है। लेकिन इसके बाद भी भाजपा ने स्पीकर पद के लिए अपना प्रत्याशी उतारकर कांग्रेस को यह संदेश देने की कोशिश की है कि भाजपा किसी भी तरह का कोई भी वॉक ओवर कांग्रेस को नहीं देगी।
लेकिन कहा जा रहा है कि स्पीकर के चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की अलग राय के कारण वे अपनी ही पार्टी में अलग–थलग दिखाई दे रहे हैं। मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़ शिवराज सिंह चौहान की राय थी कि स्पीकर का चुनाव नहीं लड़ा जाए, लेकिन बाद में यह फ़ैसला लिया गया कि भाजपा स्पीकर का चुनाव लड़ेगी।
भाजपा के स्पीकर के चुनाव में उतरने के बीच, हार्स ट्रेडिंग के डर से कांग्रेस काफ़ी सतर्क है और उसने अपने सभी विधायकों को एक होटल में रुकवा रखा है। पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह हर विधायक के सम्पर्क में हैं। रविवार शाम मुख्यमंत्री कमलनाथ के पावर डिनर में कांग्रेस के सभी विधायकों समेत समर्थन दे रहे विधायकों के पहुंचने से यह साबित हो गया है कि कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार अभी संगठित दिखाई दे रही है।
कहा जा रहा है कि मंत्री ना बनाए जाने से कांग्रेस के कुछ विधायकों के साथ-साथ निर्दलीय और बसपा-सपा के विधायक नाराज़ हैं। ऐसे में हो सकता है कि कमलनाथ सरकार जल्द ही अपना कैबिनेट विस्तार करे जिसमें नाराज़ चल रहे विधायकों को मंत्री बनाकर उनकी नाराज़गी दूर की जा सके। स्पीकर के चुनाव में यदि कांग्रेस को 121 में एक भी वोट कम हासिल होता है तो यह उसकी रणनीतिक असफलता साबित होगी वहीं साबित हो जाएगा कि मंत्री ना बनाए जाने से नाराज़ चल रहे किसी विधायक या विधायकों ने बगावत कर दी है।
लेकिन कहा जा रहा है कि स्पीकर का चुनाव लड़ने के बाद भाजपा को एक बड़ा नुकसान यह हो गया है कि कांग्रेस भाजपा को प्रोटोकॉल के हिसाब से विपक्षी दल होने के कारण डिप्टी स्पीकर का पद नहीं देने जा रही है। यदि ऐसा हो रहा है तो यह भाजपा के लिए किसी नुकसान से कम नहीं होगा। क्योंकि एक तो भाजपा स्पीकर का चुनाव जीतने के स्थिति में नहीं है और दूसरा डिप्टी स्पीकर का पद भी नहीं मिलने से भाजपा के पास नेता प्रतिपक्ष के अलावा कोई दूसरा पद नहीं बचेगा।
JAN 07 (WTN) – मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद से लगातार राजनीतिक उठापटक का दौर जारी है। विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला जिसके बाद कांग्रेस ने निर्दलीय विधायकों के साथ-साथ बसपा और सपा के साथ मिलकर सरकार बनाई। कांग्रेस की बहुमत वाली सरकार के लिए हर समय एक चुनौती के रूप में एक मज़बूत विपक्ष के रूप में भाजपा सामने खड़ी है। विधानसभा चुनाव में जीत से बस चंद सीटें दूर रही भाजपा ने अब कांग्रेस को शुरू से ही घेरना की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है।
इसी क्रम में भाजपा ने स्पीकर पद के लिए अपना प्रत्याशी मैदान में उतार दिया है। मध्य प्रदेश में लगातार 15 सालों तक सत्ता का सुख भोगने वाली भाजपा, विधानसभा चुनाव में 109 सीटें ही जीत सकी। राज्य में बहुमत के लिए ज़रूरी 116 सीटों से भाजपा की 7 सीटें कम हैं तो वहीं कांग्रेस (114) से भाजपा की 5 सीटें कम हैं।
संख्याबल में कम होने के बाद भी भाजपा ने स्पीकर का चुनाव लड़कर यह साबित करने की कोशिश की है कि वह किसी भी तरह से कांग्रेस को वॉक ओवर देने के मूड में नहीं है। गठबंधन की सरकार चला रही कांग्रेस पर दबाव की राजनीति करने की रणनीति के तहत भाजपा ने स्पीकर पद के लिए आदिवासी नेता विजय शाह को उम्मीदवार बनाया है तो वहीं कांग्रेस ने गोटेगांव से विधायक एनपी प्रजापति को स्पीकर पद का प्रत्याशी बनाया है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एनपी प्रजापति एससी वर्ग से आते हैं जबकि विजय शाह एसटी वर्ग से आते हैँ। दोनों ही पार्टियों ने एससी-एसटी वर्ग के प्रत्याशी उतारकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि दोनों ही पार्टियां इस वर्ग की कितनी हितैषी हैं।
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 114 सीटों पर जीत हासिल की थी लेकिन वो बहुमत से 2 सीटें दूर रह गई थी जिसके बाद 4 निर्दलीय विधायकों के साथ-साथ बसपा के 2 और सपा के 1 विधायक का समर्थन कांग्रेस को मिल गया और उसने सरकार बना ली। यदि वर्तमान परिस्थिति पर ध्यान दिया जाए, तो कांग्रेस अपने विधायकों और समर्थक विधायकों की कथित एकजुटता के बाद मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है। लेकिन इसके बाद भी भाजपा ने स्पीकर पद के लिए अपना प्रत्याशी उतारकर कांग्रेस को यह संदेश देने की कोशिश की है कि भाजपा किसी भी तरह का कोई भी वॉक ओवर कांग्रेस को नहीं देगी।
लेकिन कहा जा रहा है कि स्पीकर के चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की अलग राय के कारण वे अपनी ही पार्टी में अलग–थलग दिखाई दे रहे हैं। मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़ शिवराज सिंह चौहान की राय थी कि स्पीकर का चुनाव नहीं लड़ा जाए, लेकिन बाद में यह फ़ैसला लिया गया कि भाजपा स्पीकर का चुनाव लड़ेगी।
भाजपा के स्पीकर के चुनाव में उतरने के बीच, हार्स ट्रेडिंग के डर से कांग्रेस काफ़ी सतर्क है और उसने अपने सभी विधायकों को एक होटल में रुकवा रखा है। पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह हर विधायक के सम्पर्क में हैं। रविवार शाम मुख्यमंत्री कमलनाथ के पावर डिनर में कांग्रेस के सभी विधायकों समेत समर्थन दे रहे विधायकों के पहुंचने से यह साबित हो गया है कि कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार अभी संगठित दिखाई दे रही है।
कहा जा रहा है कि मंत्री ना बनाए जाने से कांग्रेस के कुछ विधायकों के साथ-साथ निर्दलीय और बसपा-सपा के विधायक नाराज़ हैं। ऐसे में हो सकता है कि कमलनाथ सरकार जल्द ही अपना कैबिनेट विस्तार करे जिसमें नाराज़ चल रहे विधायकों को मंत्री बनाकर उनकी नाराज़गी दूर की जा सके। स्पीकर के चुनाव में यदि कांग्रेस को 121 में एक भी वोट कम हासिल होता है तो यह उसकी रणनीतिक असफलता साबित होगी वहीं साबित हो जाएगा कि मंत्री ना बनाए जाने से नाराज़ चल रहे किसी विधायक या विधायकों ने बगावत कर दी है।
लेकिन कहा जा रहा है कि स्पीकर का चुनाव लड़ने के बाद भाजपा को एक बड़ा नुकसान यह हो गया है कि कांग्रेस भाजपा को प्रोटोकॉल के हिसाब से विपक्षी दल होने के कारण डिप्टी स्पीकर का पद नहीं देने जा रही है। यदि ऐसा हो रहा है तो यह भाजपा के लिए किसी नुकसान से कम नहीं होगा। क्योंकि एक तो भाजपा स्पीकर का चुनाव जीतने के स्थिति में नहीं है और दूसरा डिप्टी स्पीकर का पद भी नहीं मिलने से भाजपा के पास नेता प्रतिपक्ष के अलावा कोई दूसरा पद नहीं बचेगा।