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2019 के लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा की ‘रणनीति’ तैयार

Wednesday - February 20, 2019 11:17 am , Category : WTN HINDI
शिवसेना और एआईएडीएमके के साथ आने से एनडीए गठबंधन हुआ ‘मज़बूत’
शिवसेना और एआईएडीएमके के साथ आने से एनडीए गठबंधन हुआ ‘मज़बूत’

यूपीए को शिकस्त देने एनडीए का ‘विस्तार’
 
FEB 20 (WTN) – चुनावी रणनीति बनाने में 'माहिर' माने जाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने लोकसभा चुनाव के लिए रणनीति बनाकर उस पर 'अमल' करना शुरू कर दिया है। जहां एक तरफ़ यूपीए अपने गठबंधन पर अभी सिर्फ़ 'चर्चा' ही कर रहा है, तो वहीं एनडीए का कुनबा इस बार 2014 से ज़्यादा बढ़ा दिखाई दे रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भाजपा ने तीन बड़े राज्यों महाराष्ट्र, बिहार और तमिलनाड़ु में बड़े सहयोगियों के साथ गठबंधन कर लोकसभा चुनाव के लिए अपना 'महत्वपूर्ण दांव' चल दिया है।
 
भाजपा ने महाराष्ट्र में शिवसेना, बिहार में नीतीश कुमार की जेडीयू और रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और तमिलनाड़ु में एआईएडीएमके से चुनाव पूर्व गठबंधन कर लिया है। इतना ही नहीं, भाजपा ने यूपी में अनुप्रिया पटेल की अपना दल और ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया है। वहीं पंजाब में भाजपा का अकाली दल के साथ क़रीब-क़रीब गठबंधन तय है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस समय एनडीए में कुल 40 राजनीतिक पार्टियां हैं।
 
बात करें सबसे पहले उत्तर भारत की तो यहां पर कश्मीर में पुलवामा आतंकी घटना के बाद भाजपा शायद ही वहां पर घाटी में किसी भी पार्टी से गठबंधन करे, वहीं पंजाब और हरियाणा में अकाली दल के साथ भाजपा का गठबंधन लगभग तय है। इधर भाजपा दिल्ली, उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश में 'अपने दम' पर चुनाव लड़ेगी।
 
पश्चिम भारत में महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ गठबंधन करने के बाद भाजपा राजस्थान और गुजरात में बिना किसी सहयोगी के चुनावी मैदानी में उतरेगी, वहीं गोवा में एमजीपी और जीएफ़पी के साथ भाजपा गठबंधन कर सकती है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी भाजपा अपने दम पर चुनाव लड़ेगी।
 
बात करें दक्षिण भारत की तो यहां पर सबरीमाला मुद्दे के बाद केरल में भाजपा इस बार 'अकेले' चुनाव लड़कर अपनी किस्मत आजमाना चाहेगी। वहीं तमिलनाड़ु में एआईएडीएमके के साथ गठबंधन करके भाजपा ने अपनी स्थिति को 'काफ़ी मज़बूत' कर लिया है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने से चुकी भाजपा वहां पर केपीजे के साथ गठबंधन कर सकती है।

वहीं तेलंगाना में 'अटकलें' हैं कि भाजपा टीआरएस के साथ गठबंधन कर सकती है, लेकिन इसकी सम्भावनाएं ना के बराबर है और वहां पर भाजपा 'अपने दम' पर ही चुनाव लड़ेगी। बात करें आंध्रप्रदेश की तो यहां पर टीडीपी के एनडीए से अलग होने के बाद वाईएसआर कांग्रेस के साथ भाजपा की चुनाव पूर्व नहीं तो चुनाव के बाद गठबंधन पर चर्चाएं जारी हैं। 
 
पूर्वी भारत की बात करें तो यहां पर ओडिशा में भाजपा बीजेडी की एक समय सहयोगी रही है, लेकिन इस बार पार्टी यहां पर 'अकेले' ही चुनाव लड़ने की रणनीति पर काम कर रही है जिसका 'फ़ायदा' उसे मिल सकता है। पश्चिम बंगाल में टीएमसी को इस बार 'कड़ी टक्कर' देने के लिए भाजपा उसे घेरने की रणनीति पर काम कर रही है और हो सकता है कि वहां पर गोरखालैण्ड के मुद्दे से जुड़ी पार्टियों के साथ भाजपा गठबंधन कर ले। वहीं नार्थ ईस्ट के राज्यों में भाजपा वहां के छोटे-छोटे दलों के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन कर सकती है, हालांकि उन्हें टिकट मिले यह सम्भव नहीं दिखता है।
 
एनडीए का कुनबा इस बार 2014 की तुलना में बढ़ गया है। 2014 में एनडीए में 30 पार्टियां शामिल थीं, जिसमें से 5 पार्टियों के लिए भाजपा ने कोई भी सीट नहीं दी थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 543 में से 427 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 282 सीटों पर जीत हासिल की थी। एनडीए में भाजपा के बाद सबसे बड़ी पार्टी शिवसेना थी जिसने 18 सीटें मिली थीं, तो टीडीपी 16 सीटें जीतकर एनडीए में तीसरे नम्बर पर रही थी।
 
यूपी में पिछली बार एनडीए ने 80 में से 73 सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन इस बार बसपा और सपा के गठबंधन के बाद भाजपा को नुकसान होता तय है, ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा इस नुकसान को पश्चिम बंगाल, ओडिशा और तमिलनाड़ु में पूरा कर सकती  है। अब देखते हैं कि लोकसभा चुनाव में भाजपा की चुनावी रणनीति कितना काम आती है और 2014 का 'करिश्मा' नरेन्द्र मोदी 2019 में दोहरा पाते हैं कि नहीं।