जानिए आख़िर बैंक क्यों नहीं कर रहे कर्ज़ों पर ब्याज दर में कटौती?
Friday - February 22, 2019 2:36 pm ,
Category : WTN HINDI
आरबीआई की नीतिगत दरों में कटौती के बाद भी बैंकों ने कर्ज़ नहीं किया सस्ता
बैंकों ने आरबीआई की सलाह को किया ‘दरकिनार’!
FEB 22 (WTN) – बैंकों का अड़ियल रवैया एक बार फ़िर से सामने आया है और आरबीआई द्वारा रेपो रेट में कमी करने के बाद भी बैंक इसका पूरा लाभ ग्राहकों को नहीं दे रहे हैं। इसी सन्दर्भ में रिज़र्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने देश के सार्वजनिक और निजी बैंक अधिकारियों के साथ मुलाकात की और नीतिगत ब्याज दर यानि कि रेपो रेट में कटौती के बाद बैंकों द्वारा दिये जाने वाले कर्ज़ों की ब्याज दर में होने वाले कटौती में देरी के कारणों पर चर्चा की।
जानकारी के मुताबिक़ आरबीआई ने बैंकों से साफ़-साफ़ कहा है कि केन्द्रीय बैंक द्वारा नीतिगत दरों में कटौती की गई है और इसे 6.50 प्रतिशत से घटाकर 6.25 प्रतिशत कर दिया गया है। ऐसे में बैंकों को भी ब्याज दर में कमी किये जाने की ज़रूरत है ताकि इसका पूरा लाभ ग्राहकों को मिल सके।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आरबीआई द्वारा नीतिगत दरों में कटौती के बाद केवल एसबीआई यानि कि भारतीय स्टेट बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र ने अपनी ब्याज दरों में कटौती की है, लेकिन वह भी सिर्फ़ चुनिंदा श्रेणी के कर्ज़ पर। पर ऐसा नहीं है कि इन बैंकों ने रेपो रेट में कटौती का पूरा फायदा ग्राहकों को दिया है, बल्कि इन बैंकों ने भी आरबीआई द्वारा दी गयी राहत का पांचवां हिस्सा ही लोगों तक पहुंचाया है।
लेकिन बड़ा सवाल यही है कि आख़िर क्यों आरबीआई द्वारा नीतिगत दरों में कटौती के बाद भी बैंक उसका सीधा लाभ कर्ज़ लेने वालों तक नहीं पहुंचा रहे हैं? कहा जा रहा है कि ऐसा ना करने के पीछे बैंकों के कई तर्क हैं, जैसे बैंकों का कहना है कि उनके पास भारी मात्रा में एनपीए का बोझ है जिससे निपटना उनकी पहली चुनौती है। आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2017 और मार्च 2018 तक भारतीय बैंकिंग सेक्टर में कुल सकल एनपीए क्रमश 8 लाख करोड़ रुपये और 10.3 लाख करोड़ रुपये था।
इधर सरकारी बैंकों की हालत में सुधार लाने के लिए सरकार की तरफ़ से 12 बैंकों के रीकैपिटलाइजेशन को मंजूरी मिल गई है। जानकारी के मुताबिक़ सरकार इन बैंकों में क़रीब 48 हज़ार करोड़ रुपये की पूंजी डालेगी। कहा जा रहा है कि रीकैप की इस प्रकिया से बैंकों का नेट एनपीए 6 प्रतिशत कम हो जाएगा।
इधर रियल एस्टेट सेक्टर में भी बैंकों के लिए एनपीए का ख़तरा गहराता ही जा रहा है। मामले को गम्भीर जानकर कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय ने पीएमओ, वित्त मंत्रालय और आरबीआई को बाक़ायदा एक पत्र लिखकर जल्द से जल्द कोई ठोस कदम उठाने कहा है। अपने पत्र में कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय ने चेतावनी देते हुए कहा है कि बैंकों को भारी कर्ज़ वाली कम्पनियों से सतर्क रहना चाहिए साथ ही डिफॉल्ट होने पर इसकी जानकारी तुरन्त देना चाहिए।
इन सभी कारणों की दुहाई देकर लगता है कि बैंकों ने रेपो रेट में कमी का पूरा फ़ायदा सीधे तौर पर ग्राहकों को नहीं दिया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि बैंकों पर सरकार का दबाव रहता है कि वे एनपीए को जल्द से जल्द रिकवर करें, ऐसे में हो सकता है कि बैंकों ने आरबीआई की नीतिगत दरों में कटौती के बाद भी अपने कर्ज़ के ब्याज में कोई भी कटौती नहीं की है क्योंकि बैंकों का तर्क है कि एनपीए उनके लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है।
लेकिन बैंकों का यह फ़ैसला मोदी सरकार के लिए लोकसभा चुनाव के हिसाब से प्लस प्वाइंट नहीं कहा जा सकता है क्योंकि यदि कर्ज़ा सस्ता होता है तो इसका श्रेय कहीं ना कहीं से मोदी सरकार ले सकती है कि उसकी नीतियों के कारण देश में अर्थव्यवस्था सही दिशा में प्रगति कर रही है इसलिए कर्ज़ सस्ता हो गया है।
वैसे आरबीआई की सलाह के बाद यदि बैंक नीतिगत दरों में कटौती के बाद उसका लाभ ग्राहकों को नहीं देते हैं तो इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं, क्योंकि यदि बैंक आम लोगों के लिए कर्ज़ सस्ता नहीं करेंगे तो आने वाले समय में आरबीआई भी अपनी नीतिगत दरों में शायद ही कटौती करे।
FEB 22 (WTN) – बैंकों का अड़ियल रवैया एक बार फ़िर से सामने आया है और आरबीआई द्वारा रेपो रेट में कमी करने के बाद भी बैंक इसका पूरा लाभ ग्राहकों को नहीं दे रहे हैं। इसी सन्दर्भ में रिज़र्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने देश के सार्वजनिक और निजी बैंक अधिकारियों के साथ मुलाकात की और नीतिगत ब्याज दर यानि कि रेपो रेट में कटौती के बाद बैंकों द्वारा दिये जाने वाले कर्ज़ों की ब्याज दर में होने वाले कटौती में देरी के कारणों पर चर्चा की।
जानकारी के मुताबिक़ आरबीआई ने बैंकों से साफ़-साफ़ कहा है कि केन्द्रीय बैंक द्वारा नीतिगत दरों में कटौती की गई है और इसे 6.50 प्रतिशत से घटाकर 6.25 प्रतिशत कर दिया गया है। ऐसे में बैंकों को भी ब्याज दर में कमी किये जाने की ज़रूरत है ताकि इसका पूरा लाभ ग्राहकों को मिल सके।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आरबीआई द्वारा नीतिगत दरों में कटौती के बाद केवल एसबीआई यानि कि भारतीय स्टेट बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र ने अपनी ब्याज दरों में कटौती की है, लेकिन वह भी सिर्फ़ चुनिंदा श्रेणी के कर्ज़ पर। पर ऐसा नहीं है कि इन बैंकों ने रेपो रेट में कटौती का पूरा फायदा ग्राहकों को दिया है, बल्कि इन बैंकों ने भी आरबीआई द्वारा दी गयी राहत का पांचवां हिस्सा ही लोगों तक पहुंचाया है।
लेकिन बड़ा सवाल यही है कि आख़िर क्यों आरबीआई द्वारा नीतिगत दरों में कटौती के बाद भी बैंक उसका सीधा लाभ कर्ज़ लेने वालों तक नहीं पहुंचा रहे हैं? कहा जा रहा है कि ऐसा ना करने के पीछे बैंकों के कई तर्क हैं, जैसे बैंकों का कहना है कि उनके पास भारी मात्रा में एनपीए का बोझ है जिससे निपटना उनकी पहली चुनौती है। आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2017 और मार्च 2018 तक भारतीय बैंकिंग सेक्टर में कुल सकल एनपीए क्रमश 8 लाख करोड़ रुपये और 10.3 लाख करोड़ रुपये था।
इधर सरकारी बैंकों की हालत में सुधार लाने के लिए सरकार की तरफ़ से 12 बैंकों के रीकैपिटलाइजेशन को मंजूरी मिल गई है। जानकारी के मुताबिक़ सरकार इन बैंकों में क़रीब 48 हज़ार करोड़ रुपये की पूंजी डालेगी। कहा जा रहा है कि रीकैप की इस प्रकिया से बैंकों का नेट एनपीए 6 प्रतिशत कम हो जाएगा।
इधर रियल एस्टेट सेक्टर में भी बैंकों के लिए एनपीए का ख़तरा गहराता ही जा रहा है। मामले को गम्भीर जानकर कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय ने पीएमओ, वित्त मंत्रालय और आरबीआई को बाक़ायदा एक पत्र लिखकर जल्द से जल्द कोई ठोस कदम उठाने कहा है। अपने पत्र में कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय ने चेतावनी देते हुए कहा है कि बैंकों को भारी कर्ज़ वाली कम्पनियों से सतर्क रहना चाहिए साथ ही डिफॉल्ट होने पर इसकी जानकारी तुरन्त देना चाहिए।
इन सभी कारणों की दुहाई देकर लगता है कि बैंकों ने रेपो रेट में कमी का पूरा फ़ायदा सीधे तौर पर ग्राहकों को नहीं दिया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि बैंकों पर सरकार का दबाव रहता है कि वे एनपीए को जल्द से जल्द रिकवर करें, ऐसे में हो सकता है कि बैंकों ने आरबीआई की नीतिगत दरों में कटौती के बाद भी अपने कर्ज़ के ब्याज में कोई भी कटौती नहीं की है क्योंकि बैंकों का तर्क है कि एनपीए उनके लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है।
लेकिन बैंकों का यह फ़ैसला मोदी सरकार के लिए लोकसभा चुनाव के हिसाब से प्लस प्वाइंट नहीं कहा जा सकता है क्योंकि यदि कर्ज़ा सस्ता होता है तो इसका श्रेय कहीं ना कहीं से मोदी सरकार ले सकती है कि उसकी नीतियों के कारण देश में अर्थव्यवस्था सही दिशा में प्रगति कर रही है इसलिए कर्ज़ सस्ता हो गया है।
वैसे आरबीआई की सलाह के बाद यदि बैंक नीतिगत दरों में कटौती के बाद उसका लाभ ग्राहकों को नहीं देते हैं तो इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं, क्योंकि यदि बैंक आम लोगों के लिए कर्ज़ सस्ता नहीं करेंगे तो आने वाले समय में आरबीआई भी अपनी नीतिगत दरों में शायद ही कटौती करे।