मुख्यमंत्री कमलनाथ की ग्राम युवा शक्ति समिति के जरिये ग्रामीण इलाकों में ‘पैंठ’ जमाने की कोशिश
Saturday - February 23, 2019 2:17 pm ,
Category : WTN HINDI
कमलनाथ सरकार की ग्राम युवा शक्ति समिति का भाजपा ने किया ‘विरोध’
बड़ा सवाल: कहीं ग्राम युवा शक्ति समिति का गठन संविधान के पंचायती राज का उल्लंघन तो नहीं?
FEB 23 (WTN) – किसानों को किया गया कर्ज़ माफ़ी का वादा निभाने के बाद मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार अब ग्रामीण इलाकों में अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए नये फॉर्मूले पर काम करने जा रही है, जिसके तहत गांवों में सालों से चल रहे पंचायती राज की जगह अब सरकार द्वारा गठित की जा रही ग्राम युवा शक्ति कमेटी का दबदबा होगा। जैसा कि आप जानते हैं कि ग्रामीण इलाकों में विकास के काम कराने के अधिकार पंचायतों के पास रहते हैं। किस गांव में क्या विकास कार्य होना है इसका फ़ैसला पंचायत के सरपंच और पंचायत सचिव मिलकर करते हैं।
लेकिन सालों से चला आ रहा पंचायती राज का यह मॉडल अब मध्य प्रदेश में बदल गया है। मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने प्रदेश की क़रीब 23 हज़ार पंचायतों में ग्राम युवा शक्ति समिति का गठन किया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इन समितियों के माध्यम से ही अब पंचायतों में विकास कार्य होंगे इसके लिए हर पंचायत में 11 सदस्यों की एक समिति का गठन किया गया है और ज़िले के प्रभारी मंत्री का इस समिति पर नियंत्रण रहेगा।
इस समिति का काम होगा कि वे जनता तक सरकारी योजनाओं को पहुंचाए। इतना ही नहीं, यही समिति सरपंच और सचिव की रिपोर्ट भी सरकार को देगी कि वे किस तरह से काम कर रहे हैं। 11 सदस्यों की यही समिति सभी सरकारी योजनाओं की मॉनीटरिंग करेगी। वैसे तो सभी अधिकार सरपंच के पास रहेंगे, लेकिन उन अधिकारों पर समिति का फैसला ही अन्तिम होगा।
जानकारी के मुताबिक़ समिति में ग्राम पंचायत क्षेत्र के 11 पढ़े-लिखे युवाओं को शामिल किया गया है और इन समितियों को कलेक्टर द्वारा प्रभारी मंत्री के अनुमोदन से बनाया गया है। वहीं इन समितियों में उम्र का बन्धन भी रखा गया है यानि कि समिति के सदस्यों की उम्र 1 जनवरी 2019 को 25 वर्ष से ज्यादा नहीं होना चाहिए। समिति में कम से कम 6 सदस्य स्नातक और 5 सदस्य हायर सेकेंडरी तक शिक्षित होना जरूरी है। इस समिति का कार्यकाल 5 साल के लिए होगा। वहीं समिति में कम से कम तीन महिलाओं को होना भी अनिवार्य है।
इधर कमलनाथ सरकार द्वारा गठित इन समितियों का विरोध होना शुरू हो गया है। भाजपा का आरोप है कि राजनीतिक फायदे के लिए कमलनाथ सरकार इन समितियों का गठन कर पंचायत के अधिकारों पर कब्जा करना चाहती है और अपने लोगों को बैठाना चाहती है। इधर समितियों के गठन के बाद से पंचायत सचिव और सरपंच भी नाराज़ बताए जाते हैँ। सरपंच और सचिव का तर्क है कि इस तरह की समितियों का गठन और उनका सरपंच की रिपोर्ट सरकार को देना संवैधानिक नहीं है।
वहीं इस बारे में सरकार का तर्क है कि गांव के सर्वांगीण विकास के लिए युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ही इस तरह की समितियों का गठन किया गया है। इन समितियों का उद्देश्य गांव के विकास के लिए ग्राम पंचायत और सरकारी विभागों को आवश्यक सहयोग प्र्दान करना और उनके बीच समन्वय स्थापित करना है। वहीं सरकार द्वारा समिति के कार्यों का हर साल बाकायदा मूल्यांकन किया जाएगा और उत्कृष्ट कार्य करने वाली समितियों को जनपद स्तर पर एक लाख रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा।
लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या कमलनाथ सरकार द्वारा गठित ग्राम युवा शक्ति समिति संविधान के पंचायती राज के नियमों का उल्लंघन तो नहीं है? क्योंकि संविधान ने सारे अधिकार सरपंचों को अधिकार दे रखे हैं, ऐसे में सरकार द्वारा गठित किसी समिति द्वारा सरपंचों के कामकाज की समीक्षा करना और उनके कार्यों की मॉनिटरिंग करना कहां तक सही है। भाजपा समेत सरपंचों और सचिवों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। अब देखना होगा कि यदि इन समितियों के गठन को अदालत में चुनौती मिलती है तो इन समितियों को जायज ठहराने के लिए क्या तर्क कमलनाथ सरकार देती है।
FEB 23 (WTN) – किसानों को किया गया कर्ज़ माफ़ी का वादा निभाने के बाद मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार अब ग्रामीण इलाकों में अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए नये फॉर्मूले पर काम करने जा रही है, जिसके तहत गांवों में सालों से चल रहे पंचायती राज की जगह अब सरकार द्वारा गठित की जा रही ग्राम युवा शक्ति कमेटी का दबदबा होगा। जैसा कि आप जानते हैं कि ग्रामीण इलाकों में विकास के काम कराने के अधिकार पंचायतों के पास रहते हैं। किस गांव में क्या विकास कार्य होना है इसका फ़ैसला पंचायत के सरपंच और पंचायत सचिव मिलकर करते हैं।
लेकिन सालों से चला आ रहा पंचायती राज का यह मॉडल अब मध्य प्रदेश में बदल गया है। मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने प्रदेश की क़रीब 23 हज़ार पंचायतों में ग्राम युवा शक्ति समिति का गठन किया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इन समितियों के माध्यम से ही अब पंचायतों में विकास कार्य होंगे इसके लिए हर पंचायत में 11 सदस्यों की एक समिति का गठन किया गया है और ज़िले के प्रभारी मंत्री का इस समिति पर नियंत्रण रहेगा।
इस समिति का काम होगा कि वे जनता तक सरकारी योजनाओं को पहुंचाए। इतना ही नहीं, यही समिति सरपंच और सचिव की रिपोर्ट भी सरकार को देगी कि वे किस तरह से काम कर रहे हैं। 11 सदस्यों की यही समिति सभी सरकारी योजनाओं की मॉनीटरिंग करेगी। वैसे तो सभी अधिकार सरपंच के पास रहेंगे, लेकिन उन अधिकारों पर समिति का फैसला ही अन्तिम होगा।
जानकारी के मुताबिक़ समिति में ग्राम पंचायत क्षेत्र के 11 पढ़े-लिखे युवाओं को शामिल किया गया है और इन समितियों को कलेक्टर द्वारा प्रभारी मंत्री के अनुमोदन से बनाया गया है। वहीं इन समितियों में उम्र का बन्धन भी रखा गया है यानि कि समिति के सदस्यों की उम्र 1 जनवरी 2019 को 25 वर्ष से ज्यादा नहीं होना चाहिए। समिति में कम से कम 6 सदस्य स्नातक और 5 सदस्य हायर सेकेंडरी तक शिक्षित होना जरूरी है। इस समिति का कार्यकाल 5 साल के लिए होगा। वहीं समिति में कम से कम तीन महिलाओं को होना भी अनिवार्य है।
इधर कमलनाथ सरकार द्वारा गठित इन समितियों का विरोध होना शुरू हो गया है। भाजपा का आरोप है कि राजनीतिक फायदे के लिए कमलनाथ सरकार इन समितियों का गठन कर पंचायत के अधिकारों पर कब्जा करना चाहती है और अपने लोगों को बैठाना चाहती है। इधर समितियों के गठन के बाद से पंचायत सचिव और सरपंच भी नाराज़ बताए जाते हैँ। सरपंच और सचिव का तर्क है कि इस तरह की समितियों का गठन और उनका सरपंच की रिपोर्ट सरकार को देना संवैधानिक नहीं है।
वहीं इस बारे में सरकार का तर्क है कि गांव के सर्वांगीण विकास के लिए युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ही इस तरह की समितियों का गठन किया गया है। इन समितियों का उद्देश्य गांव के विकास के लिए ग्राम पंचायत और सरकारी विभागों को आवश्यक सहयोग प्र्दान करना और उनके बीच समन्वय स्थापित करना है। वहीं सरकार द्वारा समिति के कार्यों का हर साल बाकायदा मूल्यांकन किया जाएगा और उत्कृष्ट कार्य करने वाली समितियों को जनपद स्तर पर एक लाख रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा।
लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या कमलनाथ सरकार द्वारा गठित ग्राम युवा शक्ति समिति संविधान के पंचायती राज के नियमों का उल्लंघन तो नहीं है? क्योंकि संविधान ने सारे अधिकार सरपंचों को अधिकार दे रखे हैं, ऐसे में सरकार द्वारा गठित किसी समिति द्वारा सरपंचों के कामकाज की समीक्षा करना और उनके कार्यों की मॉनिटरिंग करना कहां तक सही है। भाजपा समेत सरपंचों और सचिवों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। अब देखना होगा कि यदि इन समितियों के गठन को अदालत में चुनौती मिलती है तो इन समितियों को जायज ठहराने के लिए क्या तर्क कमलनाथ सरकार देती है।