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चीन में हुई मोदी सरकार की ‘कूटनीतिक जीत’!

Friday - April 26, 2019 2:11 pm , Category : WTN HINDI
भारत से ‘सम्बन्ध’ सुधारने की ‘कोशिश’ में चीन
भारत से ‘सम्बन्ध’ सुधारने की ‘कोशिश’ में चीन

चीन ने अपने नक्शे में किया सुधार, पहली बार पूरे जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश को दिखाया भारत का हिस्सा
 
APR 26 (WTN) – इस समय जबकि देश में लोकसभा चुनाव चल रहे हैं, ऐसे में मोदी सरकार की कूटनीति पर चर्चाएं होती रहती हैं। जहां एक तरफ़ सरकार का कहना है कि मोदी सरकार की विदेश नीति सफल रही है, तो वहीं दूसरी तरफ़ विपक्ष का कहना है कि चीन और पाकिस्तान के मुद्दे पर मोदी सरकार असफल रही है। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के ही अपने-अपने तर्क हैं, लेकिन इतना तो साफ़ है कि चीन की नीति हमेशा से ही भारत विरोधी रही है।

चीन ने कभी भी अपने नक्शे में अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा नहीं माना और जम्मू कश्मीर के कुछ हिस्से को ही भारत में दिखाया, जिसका भारत हमेशा से ही विरोध करता रहा है। लेकिन इसे मोदी सरकार की कूटनीतिक जीत कहा जा सकता है कि चीन ने पहली बार अपने नक्शे में पूरे जम्मू और कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा दिखाया है।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि बीजिंग में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के दूसरे समिट में चीन नक्शा प्रदर्शित कर रहा था, और इसी नक्शे में चीन ने पूरे जम्मू और कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा दिखाया है। वैसे इस नक्शे में भारत को भी BRI का हिस्सा दिखाया गया है, लेकिन भारत ने इस समिट का बहिष्कार किया है। इससे पहले साल 2017 में BRI की पहले समिट में भी भारत शामिल नहीं हुआ था।
 
चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव समिट में 37 देश शामिल हो रहे हैं। विस्तारवादी चीन का बीआरआई के जरिये मक़सद राजमार्गों, रेल लाइनों, बंदरगाहों और सी-लेन के नेटवर्क के माध्यम से एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ना है। तीन दिनों तक चलने वाली इस समिट की शुरुआत कल हुई। जहां पर चीन की कॉमर्स मिनिस्ट्री ने जो नक्शा पेश किया, उसमें पूरे जम्मू और कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा बताया गया है।

दरअसल, पूरे जम्मू और कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश को अपने नक्शे में भारत का हिस्सा दिखाना चीन का एक बहुत बड़ा क़दम है। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि हाल ही में चीन ने ऐसे हज़ारों नक्शे नष्ट किए थे, जिनमें अरुणाचल प्रदेश को भारत के राज्य के तौर पर दिखाया जाता रहा है।

चीन के इस क़दम से भारत-चीन मामलों के जानकार भी हैरान हैं। जानकार अब यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि पूरे जम्मू और कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा दिखाने के पीछे कहीं चीन की भारत को खुश करने का चाल तो नहीं है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पिछले साल नवम्बर में चीन के सरकारी चैनल CGTN ने पाकिस्तान के नक्शे से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को अलग दिखाया था।

विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि पीओके यानी कि पाक अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तान के नक्शे से बाहर करने का असर चाइना-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर(CPEC) पर भी पड़ सकता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत CPEC प्रोजेक्ट के पीओके से गुजरने का विरोध कर चुका है। महत्वाकांक्षी चीन, पीओके में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में भारी निवेश कर चुका है और इसे लेकर भारत अपनी नाराज़गी भी जता चुका है।

भारत और चीन के बीच जम्मू और कश्मीर की स्थिति को लेकर हमेशा से ही विवाद रहा है। चीन ने कुछ सालों पहले जम्मू और कश्मीर के निवासियों को स्टैपल वीजा जारी किया था, जिसका भारत कड़ा विरोध जताया था और उस दौरान दोनों देशों के सम्बन्ध खराब हुए थे। वहीं चीन, हुर्रियत नेताओं की भी मेजबानी कर चुका है, जिसके बाद भारत ने इस पर आपत्ति भी दर्ज कराई थी।
 
जैसा कि आप जानते हैं कि चीन अपने हितों के लिए लगातार पाकिस्तान की हर ग़लत बात का समर्थन करता आया है। पुलवामा आतंकी हमले के बाद और उसके पहले भी चीन ने मसूद अज़हर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के प्रयासों का हमेशा विरोध किया ताकि पाकिस्तान को खुश किया जा सके। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मसूद अज़हर के मामले में चीन ने हमेशा वीटो किया, जो साफ़ दर्शाता है कि चीन हर तरह से पाकिस्तान को खुश रखना चाहता है ताकि सीपीईसी का उसका प्रोजेक्ट पूरा हो जाए।
 
लेकिन इधर पाकिस्तान को खुश करने के चक्कर में चीन ने भारत से रिश्ते खराब कर लिये। चीन जानता है कि पाकिस्तान एक असफल देश है और वो इस समय चीन के रहमो करम पर चल रहा है। चीन को अपने सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट वेन बेल्ट के लिए भारत के समर्थन की काफ़ी ज़रूरत है, ऐसे में हो सकता है कि चीन ने भारत को खुश करने के चक्कर में अपने नक्शे में पूरे जम्मू कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा बताया हो। अब देखते हैं कि इस पर क्या कुछ प्रतिक्रिया पाकिस्तान की आती है और भारत का क्या कुछ रूख चीन के इस बदलाव पर रहता है?