रंग ला रही है मोदी सरकार की मेक इन इंडिया योजना!
Saturday - April 27, 2019 3:48 pm ,
Category : WTN HINDI
अमेरिकी कम्पनियों पर भी चला ‘मोदी मैजिक’!
अमेरिकी की 200 कम्पनियां चीन को छोड़कर भारत को बनाना चाहती हैं मैन्युफैक्चरिंग हब
APR 27 (WTN) – मोदी सरकार हमेशा से ही विदेशों से राजनयिक और आर्थिक सम्बन्ध सुधारने के प्रयास करती रहती है। इसी के प्रयास हैं कि भारत के कई देशों के साथ सम्बन्धों में गुणात्मक सुधार आया है। पुलवामा आतंकी हमले के बाद बालाकोट में भारत की कार्रवाई का विश्व के कई देशों ने साथ दिया। वहीं जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने के भारत के प्रयासों का विश्व के कई देशों ने साथ दिया था।
हाल ही में चीन ने पहली बार अपने नक्शे में पूरे जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा माना। यह मोदी सरकार की कूटनीति का ही नतीजा कहा जा सकता है कि चीन समेत कई देश भारत की महत्ता को अब समझ रहे हैं।
अब इसे मोदी सरकार की विदेश नीति की सफ़लता कहें या फ़िर मेक इन इण्डिया का असर, अमेरिका की क़रीब 200 कम्पनियां भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना चाहती हैं। इसके लिए ये कम्पनियां लोकसभा चुनाव के बाद चीन से अपने प्रोजेक्ट्स को भारत लाना चाहती हैं। इस बात की जानकारी अमेरिका और भारत के सम्बन्धों को मज़बूत बनाने की पैरवी करने वाले स्वयंसेवी समूह यूएस-इंडिया स्ट्रेटजिक एंड पार्टनरशिप फोरम ने दी है।
समूह के मुताबिक़, चीन की जगह कोई अन्य विकल्प तलाश कर रही अमेरिकी कम्पनियों के लिए भारत में शानदार अवसर उपलब्ध हैं। कम्पनियां इन दिनों प्रारम्भिक पूछताछ में है कि भारत में निवेश के बाद किस तरह से वे अपना व्यापार यहां पर कर सकती हैं और चीनी कम्पनियों को टक्कर दे सकती हैं।
यूएस-इंडिया स्ट्रेटजिक एंड पार्टनरशिप फोरम का कहना है कि वे लोकसभा चुनाव के बाद गठित नई सरकार को सुधारों को तेज़ करने और फ़ैसले लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने का सुझाव देंगे। फोरम के मुताबिक़, भारत में निवेश और व्यापार की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाने की ज़रूरत है। फोरम का मानना है कि इन 200 अमेरिकी कम्पनियों के भारत में आने से रोज़गार के बहुत से मौक़े तैयार होंगे।
वहीं फोरम के अनुसार ई-कॉमर्स और डेटा का स्थानीय स्तर पर भण्डारण आदि जैसे फ़ैसलों को अमेरिकी कम्पनियां स्थानीय फैक्टर ना मानकर अंतरराष्ट्रीय फैक्टर मान रही हैं। चीन में इसी तरह की कई समस्याओं का सामना करने के बाद कहा जा रहा है कि अमेरिकी कम्पनियां भारत का रूख करना चाह रही हैं ताकि मोदी सरकार की मेक इन इंडिया पॉलिसी का फ़ायदा वे उठा सकें।
फोरम का मानना है कि भारत में निवेश को आकर्षित करने के लिये लोकसभा चुनाव बाद चुनी गई नई सरकार को सुधार की गति तेज़ करनी चाहिये, निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता लानी चाहिये और अधिक पक्षों के साथ परामर्श पर जोर देना चाहिये। फोरम का मानना है कि भारत और अमेरिका के बीच मुक्त व्यापार समझौते से भारत को काफ़ी फ़ायदा होगा। क्योंकि इससे चीन से आने वाले सस्ते सामान की चिंता खत्म हो जाएगी।
फोरम का मानना है कि भारत और अमेरिका के बीच मुक्त व्यापार समझौते से भारतीय बाज़ार तक अमेरिकी कम्पनियों की पहुंच होने से सस्ते चीनी सामानों में रुकावट आएगी और भारतीय कम्पनियां जीएसपी जैसे मुद्दों में कमी के बाद अमेरिकी बाज़ार तक आसानी से पहुंच जाएंगी। तो कहा जा सकता है कि मोदी सरकार की मेक इन इंडिया का ही नतीजा है कि अमेरिकी की 200 कम्पनियां चीन की बजाय भारत का अपना मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना चाहती हैं।
APR 27 (WTN) – मोदी सरकार हमेशा से ही विदेशों से राजनयिक और आर्थिक सम्बन्ध सुधारने के प्रयास करती रहती है। इसी के प्रयास हैं कि भारत के कई देशों के साथ सम्बन्धों में गुणात्मक सुधार आया है। पुलवामा आतंकी हमले के बाद बालाकोट में भारत की कार्रवाई का विश्व के कई देशों ने साथ दिया। वहीं जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने के भारत के प्रयासों का विश्व के कई देशों ने साथ दिया था।
हाल ही में चीन ने पहली बार अपने नक्शे में पूरे जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा माना। यह मोदी सरकार की कूटनीति का ही नतीजा कहा जा सकता है कि चीन समेत कई देश भारत की महत्ता को अब समझ रहे हैं।
अब इसे मोदी सरकार की विदेश नीति की सफ़लता कहें या फ़िर मेक इन इण्डिया का असर, अमेरिका की क़रीब 200 कम्पनियां भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना चाहती हैं। इसके लिए ये कम्पनियां लोकसभा चुनाव के बाद चीन से अपने प्रोजेक्ट्स को भारत लाना चाहती हैं। इस बात की जानकारी अमेरिका और भारत के सम्बन्धों को मज़बूत बनाने की पैरवी करने वाले स्वयंसेवी समूह यूएस-इंडिया स्ट्रेटजिक एंड पार्टनरशिप फोरम ने दी है।
समूह के मुताबिक़, चीन की जगह कोई अन्य विकल्प तलाश कर रही अमेरिकी कम्पनियों के लिए भारत में शानदार अवसर उपलब्ध हैं। कम्पनियां इन दिनों प्रारम्भिक पूछताछ में है कि भारत में निवेश के बाद किस तरह से वे अपना व्यापार यहां पर कर सकती हैं और चीनी कम्पनियों को टक्कर दे सकती हैं।
यूएस-इंडिया स्ट्रेटजिक एंड पार्टनरशिप फोरम का कहना है कि वे लोकसभा चुनाव के बाद गठित नई सरकार को सुधारों को तेज़ करने और फ़ैसले लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने का सुझाव देंगे। फोरम के मुताबिक़, भारत में निवेश और व्यापार की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाने की ज़रूरत है। फोरम का मानना है कि इन 200 अमेरिकी कम्पनियों के भारत में आने से रोज़गार के बहुत से मौक़े तैयार होंगे।
वहीं फोरम के अनुसार ई-कॉमर्स और डेटा का स्थानीय स्तर पर भण्डारण आदि जैसे फ़ैसलों को अमेरिकी कम्पनियां स्थानीय फैक्टर ना मानकर अंतरराष्ट्रीय फैक्टर मान रही हैं। चीन में इसी तरह की कई समस्याओं का सामना करने के बाद कहा जा रहा है कि अमेरिकी कम्पनियां भारत का रूख करना चाह रही हैं ताकि मोदी सरकार की मेक इन इंडिया पॉलिसी का फ़ायदा वे उठा सकें।
फोरम का मानना है कि भारत में निवेश को आकर्षित करने के लिये लोकसभा चुनाव बाद चुनी गई नई सरकार को सुधार की गति तेज़ करनी चाहिये, निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता लानी चाहिये और अधिक पक्षों के साथ परामर्श पर जोर देना चाहिये। फोरम का मानना है कि भारत और अमेरिका के बीच मुक्त व्यापार समझौते से भारत को काफ़ी फ़ायदा होगा। क्योंकि इससे चीन से आने वाले सस्ते सामान की चिंता खत्म हो जाएगी।
फोरम का मानना है कि भारत और अमेरिका के बीच मुक्त व्यापार समझौते से भारतीय बाज़ार तक अमेरिकी कम्पनियों की पहुंच होने से सस्ते चीनी सामानों में रुकावट आएगी और भारतीय कम्पनियां जीएसपी जैसे मुद्दों में कमी के बाद अमेरिकी बाज़ार तक आसानी से पहुंच जाएंगी। तो कहा जा सकता है कि मोदी सरकार की मेक इन इंडिया का ही नतीजा है कि अमेरिकी की 200 कम्पनियां चीन की बजाय भारत का अपना मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना चाहती हैं।