मसूद अज़हर के मामले में ‘सफ़ल’ रही मोदी सरकार की ‘कूटनीति’
Friday - May 3, 2019 12:35 pm ,
Category : WTN HINDI
आतंक के ख़िलाफ़ मोदी सरकार की जीरो टॉलरेंस की नीति
चीन की हर कोशिश हुई नाक़ाम, मसूद अज़हर के मुद्दे पर रंग लाई भारत सरकार की दबाव की नीति
MAY 03 (WTN) – पुलवामा आतंकी हमले के मास्टरमाइंड मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित किए जाने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि आख़िर चीन ने क्यों इस मुद्दे पर नरमी दिखाई और मसूद अज़हर के मुद्दे पर चीन ने आख़िर क्यों भारत का साथ दिया? तो इसका जवाब मिल गया है। कहा जाता है कि भारत को यह सफ़लता चीन द्वारा उस प्रस्ताव से 'तकनीकी रोक' हटा लिए जाने के कारण मिली, जिसे पुलवामा हमले के बाद अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस ने यूएन में पेश किया था। साथ ही इस सबके पीछे दिखाई दी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कूटनीति और इच्छाशक्ति।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करने के मुद्दे पर लाए गए इस प्रस्ताव के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के लिए चीन ने अतिरिक्त समय की ज़रूरत का हवाला देते हुए इस पर 'तकनीकी रोक' लगा दी थी। लेकिन चीन ने इस तकनीकी रोक को एक मई को हटा लिया। पर चीन के द्वारा ऐसा करने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि पहले कई बार भारत के इस प्रयास को रोकने वाले पाकिस्तान के दोस्त चीन ने आख़िर भारत का साथ क्यों दिया?
सबसे पहले इस मामले में चीन पर अंतररष्ट्रीय दबाव काम आया। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मसूद अज़हर के मामले में सुरक्षा परिषद के कई सदस्यों ने पहले ही साफ़ कर दिया था कि अगर चीन, अप्रैल के आखिर तक यह रोक नहीं हटाता है, तो नया प्रस्ताव लाया जाएगा और उसमें मसूद अज़हर पर खुली बहस होगी। सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने साफ़ कहा था कि इस मामले में सभी सदस्य देशों के बीच बहस होगी और फ़ैसला वह लिया जाएगा, जिसके पक्ष में सबसे ज़्यादा वोट पड़ेंगे।
साफ़ है कि यदि सुरक्षा परिषद में ऐसा होता तो चीन को सभी के सामने शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता कि वो आतंक और आतंकियों का समर्थन कर रहा है। इस मामले में चीन अकेला पड़ जाता क्योंकि सुरक्षा परिषद के 15 में से 14 देश मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित करने के पक्ष में थे।
पर इस सबके अलावा इस पूरे मामले में मोदी सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति और कूटनीति की जीत भी शामिल है। सूत्रों के मुताबिक़ चीन ने जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित करने वाले प्रस्ताव पर से 'तकनीकी रोक' हटाने के लिए भारत के सामने एक प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि भारत, पाकिस्तान पर हमले नहीं करेगा और पुलवामा हमले के बाद दोनों देशों के बीच तनाव की जो स्थिति पैदा हुई है, उसे दूर करने की कोशिश भारत करेगा।
लेकिन मज़बूत इरादों और इच्छाशक्ति के पहचाने जाने वाले नरेन्द्र मोदी ने चीन की यह शर्त नामंज़ूर कर दी। चीन शुरू से ही भारत पर पाकिस्तान से बातचीत शुरू करने के लिए भी दबाव बना रहा था, लेकिन उसका कोई दबाव काम नहीं आया और भारत ने आतंकी गतिविधियां जारी रहने तक किसी भी तरह की बातचीच से साफ़ इंकार कर दिया।
आतंक और आतंकियों के ख़िलाफ़ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाए मोदी सरकार ने मसूद अज़हर के मामले में साफ़ कर दिया था कि भारत आतंकवाद के मुद्दे पर कोई भी समझौता नहीं करेगा। हालांकि संयुक्त राष्ट्र के बयान में पुलवामा हमले का जिक्र नहीं है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत ने इस मामले में चीन से कोई अंदरूनी बातचीत की है जिसके कारण चीन, मसूद अज़हर के मामले पर तकनीकी रोक हटाने के लिए राज़ी हो गया?
लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय ने साफ़ कर दिया है कि इस मामले में चीन से किसी भी तरह की कोई भी अंदरूनी बातचीत नहीं हुई है। भारत सरकार का मक़सद था मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित कराना, और भारत सरकार आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर किसी भी देश से बात नहीं करेगी।
भारत सरकार के मुताबिक़, मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित किया जाना किसी ख़ास घटना पर आधारित नहीं है। मसूद अज़हर पर प्रतिबंध उन सबूतों के आधार पर लगाया गया है, जो आतंकवाद से मसूद के सम्बन्ध को लेकर संयुक्त राष्ट्र की 1267 अलकायदा प्रतिबंध समिति के सामने पेश किए गए थे। संयुक्त राष्ट्र की अधिसूचना में साफ़ कहा गया है कि मसूद को जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ी आतंकी गतिविधियों की साजिश के साथ-साथ वित्तीय संसाधन जुटाने के लिए प्रतिबन्धित आतंकियों की सूची में डाला गया है और इसमें सभी तरह की आतंकी घटनाएं शामिल हैं।
यानि कि कहा जा सकता है कि सुरक्षा परिषद के अन्य देशों के दबाव के साथ-साथ मोदी सरकार की इच्छाशक्ति और कूटनीति के कारण ही चीन को आख़िरकार झुकना पड़ा और मसूद अज़हर के मामले में किये गये वीटो को वापस लेना पड़ा। मोदी सरकार ने पुलवामा आतंकी हमले के बाद साफ़ ज़ाहिर कर दिया था कि भारत किसी के भी दवाब में नहीं आएगा और आतंक से निपटने से लिए जो भी विकल्प खुले हैं, उन पर अमल किया जाएगा।
MAY 03 (WTN) – पुलवामा आतंकी हमले के मास्टरमाइंड मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित किए जाने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि आख़िर चीन ने क्यों इस मुद्दे पर नरमी दिखाई और मसूद अज़हर के मुद्दे पर चीन ने आख़िर क्यों भारत का साथ दिया? तो इसका जवाब मिल गया है। कहा जाता है कि भारत को यह सफ़लता चीन द्वारा उस प्रस्ताव से 'तकनीकी रोक' हटा लिए जाने के कारण मिली, जिसे पुलवामा हमले के बाद अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस ने यूएन में पेश किया था। साथ ही इस सबके पीछे दिखाई दी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कूटनीति और इच्छाशक्ति।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करने के मुद्दे पर लाए गए इस प्रस्ताव के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के लिए चीन ने अतिरिक्त समय की ज़रूरत का हवाला देते हुए इस पर 'तकनीकी रोक' लगा दी थी। लेकिन चीन ने इस तकनीकी रोक को एक मई को हटा लिया। पर चीन के द्वारा ऐसा करने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि पहले कई बार भारत के इस प्रयास को रोकने वाले पाकिस्तान के दोस्त चीन ने आख़िर भारत का साथ क्यों दिया?
सबसे पहले इस मामले में चीन पर अंतररष्ट्रीय दबाव काम आया। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मसूद अज़हर के मामले में सुरक्षा परिषद के कई सदस्यों ने पहले ही साफ़ कर दिया था कि अगर चीन, अप्रैल के आखिर तक यह रोक नहीं हटाता है, तो नया प्रस्ताव लाया जाएगा और उसमें मसूद अज़हर पर खुली बहस होगी। सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने साफ़ कहा था कि इस मामले में सभी सदस्य देशों के बीच बहस होगी और फ़ैसला वह लिया जाएगा, जिसके पक्ष में सबसे ज़्यादा वोट पड़ेंगे।
साफ़ है कि यदि सुरक्षा परिषद में ऐसा होता तो चीन को सभी के सामने शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता कि वो आतंक और आतंकियों का समर्थन कर रहा है। इस मामले में चीन अकेला पड़ जाता क्योंकि सुरक्षा परिषद के 15 में से 14 देश मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित करने के पक्ष में थे।
पर इस सबके अलावा इस पूरे मामले में मोदी सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति और कूटनीति की जीत भी शामिल है। सूत्रों के मुताबिक़ चीन ने जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित करने वाले प्रस्ताव पर से 'तकनीकी रोक' हटाने के लिए भारत के सामने एक प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि भारत, पाकिस्तान पर हमले नहीं करेगा और पुलवामा हमले के बाद दोनों देशों के बीच तनाव की जो स्थिति पैदा हुई है, उसे दूर करने की कोशिश भारत करेगा।
लेकिन मज़बूत इरादों और इच्छाशक्ति के पहचाने जाने वाले नरेन्द्र मोदी ने चीन की यह शर्त नामंज़ूर कर दी। चीन शुरू से ही भारत पर पाकिस्तान से बातचीत शुरू करने के लिए भी दबाव बना रहा था, लेकिन उसका कोई दबाव काम नहीं आया और भारत ने आतंकी गतिविधियां जारी रहने तक किसी भी तरह की बातचीच से साफ़ इंकार कर दिया।
आतंक और आतंकियों के ख़िलाफ़ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाए मोदी सरकार ने मसूद अज़हर के मामले में साफ़ कर दिया था कि भारत आतंकवाद के मुद्दे पर कोई भी समझौता नहीं करेगा। हालांकि संयुक्त राष्ट्र के बयान में पुलवामा हमले का जिक्र नहीं है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत ने इस मामले में चीन से कोई अंदरूनी बातचीत की है जिसके कारण चीन, मसूद अज़हर के मामले पर तकनीकी रोक हटाने के लिए राज़ी हो गया?
लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय ने साफ़ कर दिया है कि इस मामले में चीन से किसी भी तरह की कोई भी अंदरूनी बातचीत नहीं हुई है। भारत सरकार का मक़सद था मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित कराना, और भारत सरकार आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर किसी भी देश से बात नहीं करेगी।
भारत सरकार के मुताबिक़, मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित किया जाना किसी ख़ास घटना पर आधारित नहीं है। मसूद अज़हर पर प्रतिबंध उन सबूतों के आधार पर लगाया गया है, जो आतंकवाद से मसूद के सम्बन्ध को लेकर संयुक्त राष्ट्र की 1267 अलकायदा प्रतिबंध समिति के सामने पेश किए गए थे। संयुक्त राष्ट्र की अधिसूचना में साफ़ कहा गया है कि मसूद को जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ी आतंकी गतिविधियों की साजिश के साथ-साथ वित्तीय संसाधन जुटाने के लिए प्रतिबन्धित आतंकियों की सूची में डाला गया है और इसमें सभी तरह की आतंकी घटनाएं शामिल हैं।
यानि कि कहा जा सकता है कि सुरक्षा परिषद के अन्य देशों के दबाव के साथ-साथ मोदी सरकार की इच्छाशक्ति और कूटनीति के कारण ही चीन को आख़िरकार झुकना पड़ा और मसूद अज़हर के मामले में किये गये वीटो को वापस लेना पड़ा। मोदी सरकार ने पुलवामा आतंकी हमले के बाद साफ़ ज़ाहिर कर दिया था कि भारत किसी के भी दवाब में नहीं आएगा और आतंक से निपटने से लिए जो भी विकल्प खुले हैं, उन पर अमल किया जाएगा।