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युद्ध के मुहाने पर ईरान और अमेरिका!

Thursday - May 9, 2019 1:08 pm , Category : WTN HINDI
ईरान और अमेरिका के बीच चरम पर ‘तनाव’
ईरान और अमेरिका के बीच चरम पर ‘तनाव’

आर्थिक प्रतिबंधों के कड़ा होने के बाद ईरान ने दिखाए ‘तेवर’, परमाणु कार्यक्रम को दी ‘गति’

MAY 09 (WTN) – अमेरिका और ईरान के बीच 'विवाद' और 'तनाव' कोई नहीं बात नहीं है। समय-समय पर दोनों देशों के बीच तनाव इतना बढ़ जाता है कि लगता है कि अब दोनों देशों के बीच युद्ध ना हो जाए। कमोबेश यही परिस्थितियां इन दिनों अमेरिका और ईरान के बीच अब एक बार फ़िर से बनती 'नज़र' आ रही हैं।

अमेरिका और ईरान के बीच ताज़ा घटनाक्रम के चलते दोनों ही देशों के बीच संघर्ष अब एक बार फ़िर से 'चरम' पर पहुंच गया है। ईरान पर अमेरिका के प्रतिबंधों के 'कड़ा' होने के बीच, ईरान ने एक बार फ़िर से अपने परमाणु कार्यक्रम को 'गति' देना शुरू कर दिया है। ईरान के इस क़दम का सीधा मतलब अमेरिका को सीधे-सीधे 'चुनौती' देना है।

ईरान पर 'आर्थिक दबाव' बनाने के बाद अब अमेरिका ने उस पर 'सैन्य दबाव' डालना भी शुरू कर दिया है। क्योंकि अमेरिका ने 'संकेत' दिये हैं कि उसके पास खुफ़िया जानकारी है कि ईरान और उसके सहयोगी यूएस के नौसैन्य बेसों को 'निशाना' बनाने की कोशिश कर सकते हैं। इसी के चलते यूएस ने मध्य-पूर्व एशिया में एयरक्राफ्ट कैरियर और बॉम्बर टास्क फोर्स की तैनाती कर दी है, जिसके बाद कहा जा रहा है कि दोनों देशों के बीच संघर्ष चरम पर है।

दरअसल, 2015 में ईरान और यूएस-यूरोपीय देशों के बीच हुए परमाणु समझौते के अंतर्गत ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए थे, लेकिन इसके बदले उस पर लगे प्रतिबंधों से उसे 'राहत' दी गई थी। हालांकि, एक साल पहले 8 मई को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने परमाणु समझौते को रद्द कर दिया था।

वैसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ऐलान के बाद भी ईरान ने समझौते का पालन करना जारी रखा। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों से परेशान ईरान एक बार फ़िर से अपना परमाणु कार्यक्रम शुरू करना चाहता है, और ईरान के इसी क़दम के कारण अमेरिका और ईरान के बीच 'ख़तरनाक' स्थिति पैदा हो सकती है।

पिछले काफ़ी समय से अमेरिका, ईरान की 'गतिविधियों' पर नज़र रखे हुए है। पिछले महीने ट्रम्प प्रशासन ने ईरान की प्रभावशाली सुरक्षा और सैन्य संस्था “इस्लामिक रिवॉल्यूशन गार्ड्स कॉर्प्स” को विदेशी आतंकी संगठन घोषित कर दिया था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह पहला मौक़ा था जब अमेरिका ने किसी सरकारी अंग को आतंकवादी घोषित किया हो।

आर्थिक प्रतिबंधों के कड़ा होने और फ़िर कुछ अन्य प्रतिबंधों के बाद कहा जा रहा है कि ईरान, अमेरिका को 'अपने अन्दाज़' में जवाब देने की तैयारी में है। कहा जा रहा है कि ईरान, अमेरिका के ख़िलाफ़ 'प्रॉक्सी वॉर' की तैयारी कर रहा है। इन सभी कारणों से ऐसा लग रहा है कि ईरान और अमेरिका सैन्य जंग के क़रीब पहुंच गए हैं। यदि ईरान ने अमेरिकी सैन्य ताक़त को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नुकसान पहुंचने की कोशिश की तो अमेरिका 'शांत' रहने वाला नहीं है।
 
मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, ईरानी राष्ट्रपति हसन रोहानी अपने देश के परमाणु कार्यक्रम को लेकर कई और घोषणाएं कर सकते हैं, जिसमें परमाणु ईंधन बनाने और सर्वेक्षणों से अपने परमाणु कार्यक्रम को छिपाने समेत तमाम काम शामिल हैं। इन सबके आधार पर कहा जा रहा है कि ईरान परमाणु बम बनाने के काफ़ी 'क़रीब' पहुंच गया है, लेकिन वह इसकी घोषणा कब करेगा इस पर अभी 'संशय' है।

अमेरिका-ईरान सम्बन्धों के जानकारों का मानना है कि परमाणु समझौते के कारण ईरान का परमाणु बम बनाने का रास्ता क़रीब एक दशक तक बंद रहा। इधर, ईरान के परमाणु डील से 'आंशिक' तौर पर निकलने का संकेत भी अमेरिका के उस क़दम के बाद आया है, जिसमें अमेरिका ने ईरान से कच्चा तेल आयात करने वाले देशों को 'चेतावनी' जारी की है वे ईरान से तेल आयात बंद करें नहीं तो अमेरिका उन पर भी प्रतिबंध की कार्रवाई कर सकता है। अमेरिका का यह क़दम ईरान के लिए काफ़ी बड़ा 'झटका' है क्योंकि ईरान के लिए तेल निर्यात आय का सबसे बड़ा स्रोत है।

अमेरिका के तमाम तरह के प्रतिबंधों और दबावों के बीच, ईरान को अब इस समझौते (परमाणु समझौता) में रहने का कोई फ़ायदा नज़र नहीं आ रहा होगा तभी उसने इससे आंशिक रूप से बाहर आने का संकेत दिया है। कहा जा रहा है कि अमेरिका के परमाणु डील से निकलने और यूरोपीय देशों के अपने वादे पूरा ना करने की प्रतिक्रिया में ईरान अपनी परमाणु गतिविधियों के 'कुछ हिस्सों' को शुरू करेगा जिसे परमाणु समझौते के दायरे में रोक दिया गया था।

यानी की कहा जा सकता है कि ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष चरम पर है, जिसके कारण दोनों ही देशों के बीच युद्ध भी छिड़ सकता है। यदि ऐसा होता है तो इसका बहुत बड़ा 'नुकसान' भारत जैसे अन्य देशों को उठाना पड़ सकता है जो कि कच्चे तेल का आयात करते हैं, क्योंकि युद्ध होने की स्थिति में कच्चे तेल की सप्लाई पर 'नकारात्मक' असर पड़ेगा। अब देखते है कि ईरान और अमेरिका के बीच जारी ताज़ा विवाद शांत होता है या फ़िर यह युद्ध पर जाकर ख़त्म होता है?