भारत की बढ़ी ‘चिन्ता’, चीन के और ‘क़रीब’ हुआ नेपाल!
Friday - May 10, 2019 3:14 pm ,
Category : WTN HINDI
भारत की सलाह को ‘अनदेखा’ कर चीन में नेपाल की ‘दिलचस्पी’
भारत को घेरने की ‘कूटनीति’ के तहत अब चीन ने नेपाल को दिया कर्ज़ का ‘लालच’
MAY 10 (WTN) – भारत और चीन के बीच स्थित नेपाल को एक बफर स्टेट के रूप में जाना जाता है। एशिया की दो बड़ी शक्तियों के बीच स्थित नेपाल हमेशा से दोनों ही देशों के बीच संतुलन दिखाने की कोशिश करता रहता है। लेकिन समय के साथ अब उसका झुकाव चीन की तरफ़ बढ़ता जा रहा है। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (NCP) चीन से आर्थिक फ़ायदे की आशा में ऐसे फ़ैसले ले रही है, जिससे भारत की चिन्ता बढ़ना स्वाभाविक है।
भारत के बजाय चीन के साथ दोस्ती बढ़ा रहे नेपाल ने चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (BRI) योजना में शामिल होने की इच्छा जाहिर की है। कहा जा रहा है कि नेपाल, चीनी रास्तों और बंदरगाहों का प्रयोग कर भारत पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव में केंरूंग-काठमांडू रेलवे के अपवाद को छोड़कर, बाक़ी योजनाओं के चुनाव में थोड़ी देरी हो रही है। लेकिन इस सबके बावजूद, चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर नेपाल बहुत ही उत्सुक दिखाई दे रहा है।
चीन की तरफ़ झुकाव के चलते ही नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भण्डारी ने अप्रैल में चीन में आयोजित हुई बेल्ट ऐंड रोड की दूसरी बैठक में हिस्सा लिया था। बैठक के बाद दोनों देशों (चीन और नेपाल) के साझा बयान में नेपाल-चीन ट्रांस हिमालयन कनेक्टिविटी नेटवर्क और नेपाल-चीन क्रॉस बॉर्डर रेलवे समेत कई महत्वपूर्ण योजनाओं का उल्लेख था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि नेपाल-चीन सीमा पार रेलवे नेटवर्क अपने आप में काफ़ी महत्वपूर्ण है। कहा जा रहा है कि चीन इस रेलवे लाइन का प्रयोग दक्षिण एशिया में गेटवे के तौर पर करना चाहता है।
ऐसा पहली बार हुआ है जब नेपाल से जुड़ी किसी परियोजना का जिक्र बीआरआई के आधिकारिक दस्तावेजों में हुआ है। हालांकि, अभी भी जल्द पूरी होने वाली परियोजनाओं की सूची में इस परियोजना को शामिल नहीं किया गया है। नेपाल की राष्ट्रपति भण्डारी के चीन दौरे के समय ही ओली सरकार के कार्यकाल में किए गए ट्रांजिट-ट्रांसपोर्ट ट्रीटी से जुड़े एक प्रोटोकॉल पर भी हस्ताक्षर किए गए। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर करने के बाद, नेपाल को किसी तीसरे देश से व्यापार के लिए चीन के समुद्रीय और सड़क के बुनियादी ढांचे को इस्तेमाल करने की इजाज़त मिल गई है।
वहीं बेल्ट ऐंड रोड की फोरम को सम्बोधित करते हुए नेपाल की राष्ट्रपति भण्डारी ने चीन की परियोजनाओं की काफ़ी तारीफ़ की थी। देखा जा रहा है कि भारत समेत दूसरे देशों की समझाइश और दबाव के बावजूद नेपाल, चीन की महत्वाकांक्षी बीआरआई परियोजना के समर्थन में है। नेपाल का बीआरआई के प्रति समर्थन ऐसे समय में देखने को मिल रहा है जब भारत समेत कई देश नेपाल में चीन के निवेश को लेकर आशंका जाहिर कर रहे हैं।
दरअसल, साफ़ जाहिर है कि बीआरआई के तहत ढांचागत योजनाओं के विकास के लिए नेपाल पर चीन का दबाव है कि वो उससे कर्ज़ ले। पिछले साल ही अमेरिका ने नेपाल को आगाह किया था कि वो बीआरआई परियोजना से दूर ही रहे। अमेरिका ने नेपाल को सलाह दी थी कि नेपाल, चीन की किसी भी परियोजना का साथ देने के पहले चीन के कर्ज़ को लौटाने की अपनी क्षमता के बारे में जरूर विचार करे। अमेरिका ने इस बारे में कहा था कि नेपाल में चीन के निवेश में केवल चीन के हितों का ही ध्यान नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि नेपाल के हितों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
अमेरिका के अलावा कई दूसरे देशों ने नेपाल को आगाह किया है कि वो चीन के कर्ज़ जाल से दूर ही रहे। इसी साल जनवरी में जापान ने भी नेपाल को सलाह दी थी कि नेपाल में मूलभूत ढांचे की परियोजनाओं के विकास के लिए वित्तीय मदद छूट पर आधारित होनी चाहिए। हालांकि, जापान की इस सलाह पर चीन ने अपनी नाराज़गी जाहिर की थी।
पूरी दुनिया जानती है कि चीन मदद देने के बहाने अपने कर्ज़ के जाल में छोटे और ज़रूरतमंद देशों को फंसाता है। अमेरिका और जापान समेत कई देशों ने नेपाल को चीन के कर्ज़ के जाल में फंसने से बचने के लिए चेतावनी दी है। नेपाल के सामने पाकिस्तान और श्रीलंका का उदाहरण दिया गया है कि किस तरह से चीन ने इन देशों को कर्ज़ के जाल में फंसा दिया है।
जैसा कि आप जानते हैं कि भारत साल 2017 से ही चीन के बेल्ट ऐंड रोड का विरोध करता आ रहा है। भारत ने हमेशा से ही नेपाल को इस परियोजना में शामिल नहीं होने की सलाह और चेतावनी दोनों दी है। लेकिन नेपाल, भारत के इस विरोध को नेपाल में चीनी निवेश को रोकने के क़दम के तौर पर देखता है।
नेपाल का मानना है कि उनके देश में विकास और समृद्धि के लिए काफ़ी भारी निवेश की ज़रूरत है। नेपाल जानता है कि दूसरे देशों से मिलने वाली धनराशि इस काम के लिए पर्याप्त नहीं है। इसलिए विकास की बड़ी परियोजनाओं को पूरा करने के लिए नेपाल के पास आख़िरी विकल्प चीन से कर्ज़ ही दिखाई दे रहा है है।
इधर नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन केपी शर्मा ओली जानते हैं कि बीआरआई में शामिल होने के कारण बाक़ी देश नेपाल से नाराज़ हैं। इसलिए ओली दुनिया के बाक़ी देशों को विश्वास में लेने की कोशिश में जुटे हुए हैं। इधर घरेलू राजनीति में ओली को चीन के मुद्दे पर किसी मतभेद का सामना नहीं करना पड़ रहा है क्योंकि विपक्षी दल बीआरआई के मुद्दे पर अपना समर्थन दे रहे हैं।
लेकिन इन सबके बीच, भारत के लिए नेपाल का चीन की तरफ़ झुकाव चिन्ता का कारण है। चीन धीरे-धीरे भारत के पड़ोसी देशों पर अपनी पकड़ मज़बूत करता जा रहा है। पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और म्यान्मार जैसे देशों को चीन ने अपने कर्ज़ के जाल में फंसा लिया है। कहा जाता है कि एक कूटनीति के तहत चीन, भारत के पड़ोसी देशों को विश्वास में लेकर कर्ज़ दे रहा है ताकि उन देशों से भारत विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सके। ऐसे में भारत को काफ़ी सतर्क रहने की ज़रूरत है।
MAY 10 (WTN) – भारत और चीन के बीच स्थित नेपाल को एक बफर स्टेट के रूप में जाना जाता है। एशिया की दो बड़ी शक्तियों के बीच स्थित नेपाल हमेशा से दोनों ही देशों के बीच संतुलन दिखाने की कोशिश करता रहता है। लेकिन समय के साथ अब उसका झुकाव चीन की तरफ़ बढ़ता जा रहा है। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (NCP) चीन से आर्थिक फ़ायदे की आशा में ऐसे फ़ैसले ले रही है, जिससे भारत की चिन्ता बढ़ना स्वाभाविक है।
भारत के बजाय चीन के साथ दोस्ती बढ़ा रहे नेपाल ने चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (BRI) योजना में शामिल होने की इच्छा जाहिर की है। कहा जा रहा है कि नेपाल, चीनी रास्तों और बंदरगाहों का प्रयोग कर भारत पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव में केंरूंग-काठमांडू रेलवे के अपवाद को छोड़कर, बाक़ी योजनाओं के चुनाव में थोड़ी देरी हो रही है। लेकिन इस सबके बावजूद, चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर नेपाल बहुत ही उत्सुक दिखाई दे रहा है।
चीन की तरफ़ झुकाव के चलते ही नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भण्डारी ने अप्रैल में चीन में आयोजित हुई बेल्ट ऐंड रोड की दूसरी बैठक में हिस्सा लिया था। बैठक के बाद दोनों देशों (चीन और नेपाल) के साझा बयान में नेपाल-चीन ट्रांस हिमालयन कनेक्टिविटी नेटवर्क और नेपाल-चीन क्रॉस बॉर्डर रेलवे समेत कई महत्वपूर्ण योजनाओं का उल्लेख था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि नेपाल-चीन सीमा पार रेलवे नेटवर्क अपने आप में काफ़ी महत्वपूर्ण है। कहा जा रहा है कि चीन इस रेलवे लाइन का प्रयोग दक्षिण एशिया में गेटवे के तौर पर करना चाहता है।
ऐसा पहली बार हुआ है जब नेपाल से जुड़ी किसी परियोजना का जिक्र बीआरआई के आधिकारिक दस्तावेजों में हुआ है। हालांकि, अभी भी जल्द पूरी होने वाली परियोजनाओं की सूची में इस परियोजना को शामिल नहीं किया गया है। नेपाल की राष्ट्रपति भण्डारी के चीन दौरे के समय ही ओली सरकार के कार्यकाल में किए गए ट्रांजिट-ट्रांसपोर्ट ट्रीटी से जुड़े एक प्रोटोकॉल पर भी हस्ताक्षर किए गए। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर करने के बाद, नेपाल को किसी तीसरे देश से व्यापार के लिए चीन के समुद्रीय और सड़क के बुनियादी ढांचे को इस्तेमाल करने की इजाज़त मिल गई है।
वहीं बेल्ट ऐंड रोड की फोरम को सम्बोधित करते हुए नेपाल की राष्ट्रपति भण्डारी ने चीन की परियोजनाओं की काफ़ी तारीफ़ की थी। देखा जा रहा है कि भारत समेत दूसरे देशों की समझाइश और दबाव के बावजूद नेपाल, चीन की महत्वाकांक्षी बीआरआई परियोजना के समर्थन में है। नेपाल का बीआरआई के प्रति समर्थन ऐसे समय में देखने को मिल रहा है जब भारत समेत कई देश नेपाल में चीन के निवेश को लेकर आशंका जाहिर कर रहे हैं।
दरअसल, साफ़ जाहिर है कि बीआरआई के तहत ढांचागत योजनाओं के विकास के लिए नेपाल पर चीन का दबाव है कि वो उससे कर्ज़ ले। पिछले साल ही अमेरिका ने नेपाल को आगाह किया था कि वो बीआरआई परियोजना से दूर ही रहे। अमेरिका ने नेपाल को सलाह दी थी कि नेपाल, चीन की किसी भी परियोजना का साथ देने के पहले चीन के कर्ज़ को लौटाने की अपनी क्षमता के बारे में जरूर विचार करे। अमेरिका ने इस बारे में कहा था कि नेपाल में चीन के निवेश में केवल चीन के हितों का ही ध्यान नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि नेपाल के हितों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
अमेरिका के अलावा कई दूसरे देशों ने नेपाल को आगाह किया है कि वो चीन के कर्ज़ जाल से दूर ही रहे। इसी साल जनवरी में जापान ने भी नेपाल को सलाह दी थी कि नेपाल में मूलभूत ढांचे की परियोजनाओं के विकास के लिए वित्तीय मदद छूट पर आधारित होनी चाहिए। हालांकि, जापान की इस सलाह पर चीन ने अपनी नाराज़गी जाहिर की थी।
पूरी दुनिया जानती है कि चीन मदद देने के बहाने अपने कर्ज़ के जाल में छोटे और ज़रूरतमंद देशों को फंसाता है। अमेरिका और जापान समेत कई देशों ने नेपाल को चीन के कर्ज़ के जाल में फंसने से बचने के लिए चेतावनी दी है। नेपाल के सामने पाकिस्तान और श्रीलंका का उदाहरण दिया गया है कि किस तरह से चीन ने इन देशों को कर्ज़ के जाल में फंसा दिया है।
जैसा कि आप जानते हैं कि भारत साल 2017 से ही चीन के बेल्ट ऐंड रोड का विरोध करता आ रहा है। भारत ने हमेशा से ही नेपाल को इस परियोजना में शामिल नहीं होने की सलाह और चेतावनी दोनों दी है। लेकिन नेपाल, भारत के इस विरोध को नेपाल में चीनी निवेश को रोकने के क़दम के तौर पर देखता है।
नेपाल का मानना है कि उनके देश में विकास और समृद्धि के लिए काफ़ी भारी निवेश की ज़रूरत है। नेपाल जानता है कि दूसरे देशों से मिलने वाली धनराशि इस काम के लिए पर्याप्त नहीं है। इसलिए विकास की बड़ी परियोजनाओं को पूरा करने के लिए नेपाल के पास आख़िरी विकल्प चीन से कर्ज़ ही दिखाई दे रहा है है।
इधर नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन केपी शर्मा ओली जानते हैं कि बीआरआई में शामिल होने के कारण बाक़ी देश नेपाल से नाराज़ हैं। इसलिए ओली दुनिया के बाक़ी देशों को विश्वास में लेने की कोशिश में जुटे हुए हैं। इधर घरेलू राजनीति में ओली को चीन के मुद्दे पर किसी मतभेद का सामना नहीं करना पड़ रहा है क्योंकि विपक्षी दल बीआरआई के मुद्दे पर अपना समर्थन दे रहे हैं।
लेकिन इन सबके बीच, भारत के लिए नेपाल का चीन की तरफ़ झुकाव चिन्ता का कारण है। चीन धीरे-धीरे भारत के पड़ोसी देशों पर अपनी पकड़ मज़बूत करता जा रहा है। पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और म्यान्मार जैसे देशों को चीन ने अपने कर्ज़ के जाल में फंसा लिया है। कहा जाता है कि एक कूटनीति के तहत चीन, भारत के पड़ोसी देशों को विश्वास में लेकर कर्ज़ दे रहा है ताकि उन देशों से भारत विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सके। ऐसे में भारत को काफ़ी सतर्क रहने की ज़रूरत है।