लोकसभा चुनाव में बहुमत ना मिलने की स्थिति में ‘तिकड़ी’ पर एनडीए की नज़रें
Saturday - May 11, 2019 1:09 pm ,
Category : WTN HINDI
नवीन पटनायक, केसीआर और जगनमोहन हो सकते हैं ‘किंग मेकर’
एनडीए को बीजेडी, टीआरएस और वाईएसआर कांग्रेस से समर्थन की ‘आशा’
MAY 11 (WTN) – 23 मई को लोकसभा चुनाव के नतीजों का सभी को इंतज़ार है। जैसा कि आप जानते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने ‘पूर्ण बहुमत’ हासिल किया था। पिछले लोकसभा चुनाव (2014) में 30 सालों के बाद ऐसा हुआ था कि किसी दल को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ था। भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में 282 सीटों पर जीत हासिल की थी। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बार के लोकसभा चुनाव में किसी पार्टी का या गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिलेगा?
राजनीति के जानकारों का मानना है कि मुश्किल है कि इस बार लोकसभा चुनाव में भाजपा या किसी अन्य पार्टी को पूर्ण बहुमत हासिल हो सके। विपक्षी दल इस बात को लेकर ‘आश्वस्त’ नज़र आ रहे हैं कि भाजपा और एनडीए को पूर्ण बहुमत हासिल नहीं होना है। ऐसी स्थिति में साफ़ है कि दिल्ली में सरकार बनाने के लिए राजनीतिक पार्टियों के बीच ‘जोड़ तोड़’ का खेल होगा।
लोकसभा चुनाव में इस बार एनडीए और यूपीए के बीच ‘सीधा मुक़ाबला’ है। कहा जा रहा है कि ‘सत्ता विरोधी’ लहर के कारण एनडीए को पूर्ण बहुमत हासिल नहीं हुआ, तो तीन पार्टियां ऐसी हैं जिनसे समर्थन की ‘उम्मीद’ एनडीए कर सकता है। इन तीनों ही पार्टियों के नेता हो सकता है कि आपको ‘किंग मेकर’ की भूमिका निभा में नज़र आएं।
जहां तक यूपी में बसपा-सपा गठबंधन का सवाल है, तो यह गठबंधन सरकार बनाने के लिए ‘ज़रूरत’ पड़ने पर यूपीए को समर्थन दे सकता है। वहीं भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए ममता बनर्जी की तृणमूल भी यूपीए को समर्थन दे सकती है। लेकिन तीन राज्यों की तीन पार्टियां ऐसी हैं जिन पर सभी की निगाहें टिकी हुईं है कि वे ज़रूरत पड़ने पर किसको समर्थन देंगी। यह तीन पार्टियां हैं ओडिशा की बीजेडी, तेलंगाना की टीआरएस और आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ओडिशा में लोकसभा की 21, आंध्र प्रदेश में 25 और तेलंगाना में 17 सीटें हैं। इन तीनों राज्यों से कुल मिलाकर 63 सांसद लोकसभा पहुंचते हैं। इस लोकसभा चुनाव में ओडिशा में बीजेडी, तेलंगाना में टीआरएस और आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही हैं। राजनीति के जानकारों का मानना है कि इन राज्यों की ज़्यादातर सीटों पर इन्हीं तीन पार्टियों की जीत होगी, और इन्हीं तीन पार्टियों के नेता किंग मेकर की भूमिका में नज़र आएंगे। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेडी ने 20, टीआरएस ने 11 और वाईएसआर कांग्रेस ने 9 सीटों पर जीत हासिल की थी। यानी कि इन तीनों ही पार्टियों ने 63 लोकसभा सीटों में से 40 सीटों पर जीत दर्ज की थी।
सबसे पहले बात करते हैं बीजेडी यानी कि बीजू जनता दल की। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ओडिशा में नवीन पटनायक की बीजेडी के मुक़ाबले कोई भी पार्टी नहीं है। पिछले चुनाव में बीजेडी ने राज्य की 21 में से 20 सीटों पर जीत हासिल की थी। इस बार फ़िर से बीजेडी का मुक़ाबला भाजपा और कांग्रेस दोनों से है। हालांकि, बीजेडी ने कभी भी कांग्रेस को समर्थन नहीं दिया है। जबकि बीजेडी और भाजपा दोनों साथ मिलकर चुनाव लड़ चुकी हैं और दोनों पार्टियां साथ में राज्य में सरकार भी चला चुकी हैं। 2009 के पहले बीजेडी, एनडीए का हिस्सा थी, लेकिन इसके बाद दोनों ही पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं।
अपने चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘रणनीति’ के तहत बीजेडी पर ज़्यादा आक्रमक प्रहार नहीं किये हैं। चुनाव के पहले कई मौक़ों पर प्रधानमंत्री मोदी ने नवीन पटनायक की ‘तारीफ़’ भी की है और ज़रूरत पड़ने पर वे राज्य के साथ खड़े भी नज़र आए हैं। राजनीति के जानकारों का मानना है कि ‘ज़रूरत’ पड़ने पर बीजेडी, एनडीए को समर्थन दे सकती है। क्योंकि पहले भी बीजेडी, एनडीए का हिस्सा रह चुकी है।
अब बात करते हैं तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) की पार्टी टीआरएस की। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि तेलंगाना में टीआरएस ‘अकेले’ चुनावी मैदान में है। कभी एनडीए में रहे के चंद्रशेखर राव ग़ैर-भाजपा और ग़ैर-कांग्रेस सरकार के गठन की कोशिशों में लगे हुए हैं। हाल ही में तेलंगाना में हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम देखकर ‘अन्दाज़ा’ लगाया जा सकता है कि केसीआर की पार्टी तेलंगाना की अधिकतर लोकसभा सीटों पर जीत हासिल कर सकती है। इस तरह से अगर किसी भी दल को बहुमत नहीं मिलता है, तो केसीआर किंग मेकर की भूमिका में होंगे। अब जबकि केसीआर पहले एनडीए का हिस्सा रह चुके हैं, तो कहा जा रहा है कि राज्य को ‘बेहतर पैकेज’ की आशा में केसीआर, एनडीए को समर्थन दे सकते हैं।
आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी के लोकसभा चुनाव में कड़ा मुक़ाबला है। इस चुनाव में दोनों ही पार्टियों ने किसी भी तरह का कोई भी गठबंधन नहीं किया है। मोदी सरकार में टीडीपी, एनडीए की सहयोगी थी लेकिन विशेष राज्य के मुद्दे पर टीडीपी ने एनडीए से नाता तोड़ लिया था।
आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू और जगन मोहन रेड्डी के बीच ‘राजनीतिक वर्चस्व’ की लड़ाई है। ऐसे में केन्द्र में समर्थन की ज़रूरत पड़ने पर दोनों ही पार्टियां एक मंच पर एक साथ शायद ही आएं। टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू की कांग्रेस के साथ ‘नजदीकियों’ के बाद माना जा रहा है कि जगन मोहन रेड्डी अपनी मांगों के पूरा होने के बदले में एनडीए का साथ दे सकते हैं।
अब देखना होगा कि 23 मई के नतीजे क्या कहते हैं। यदि एनडीए को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, तो नवीन पटनायक, के चंद्रशेखर राव और जगन मोहन रेड्डी पर सभी की निगाहें रहेंगी। नवीन पटनायक की बीजेडी और के चंद्रशेखर राव की टीआरएस ये दोनों ही पार्टियां एनडीए की सहयोगी रह चुकी हैं। वहीं टीडीपी से राजनीतिक लड़ाई के चलते जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी भी एनडीए के साथ आ सकती है।
MAY 11 (WTN) – 23 मई को लोकसभा चुनाव के नतीजों का सभी को इंतज़ार है। जैसा कि आप जानते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने ‘पूर्ण बहुमत’ हासिल किया था। पिछले लोकसभा चुनाव (2014) में 30 सालों के बाद ऐसा हुआ था कि किसी दल को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ था। भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में 282 सीटों पर जीत हासिल की थी। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बार के लोकसभा चुनाव में किसी पार्टी का या गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिलेगा?
राजनीति के जानकारों का मानना है कि मुश्किल है कि इस बार लोकसभा चुनाव में भाजपा या किसी अन्य पार्टी को पूर्ण बहुमत हासिल हो सके। विपक्षी दल इस बात को लेकर ‘आश्वस्त’ नज़र आ रहे हैं कि भाजपा और एनडीए को पूर्ण बहुमत हासिल नहीं होना है। ऐसी स्थिति में साफ़ है कि दिल्ली में सरकार बनाने के लिए राजनीतिक पार्टियों के बीच ‘जोड़ तोड़’ का खेल होगा।
लोकसभा चुनाव में इस बार एनडीए और यूपीए के बीच ‘सीधा मुक़ाबला’ है। कहा जा रहा है कि ‘सत्ता विरोधी’ लहर के कारण एनडीए को पूर्ण बहुमत हासिल नहीं हुआ, तो तीन पार्टियां ऐसी हैं जिनसे समर्थन की ‘उम्मीद’ एनडीए कर सकता है। इन तीनों ही पार्टियों के नेता हो सकता है कि आपको ‘किंग मेकर’ की भूमिका निभा में नज़र आएं।
जहां तक यूपी में बसपा-सपा गठबंधन का सवाल है, तो यह गठबंधन सरकार बनाने के लिए ‘ज़रूरत’ पड़ने पर यूपीए को समर्थन दे सकता है। वहीं भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए ममता बनर्जी की तृणमूल भी यूपीए को समर्थन दे सकती है। लेकिन तीन राज्यों की तीन पार्टियां ऐसी हैं जिन पर सभी की निगाहें टिकी हुईं है कि वे ज़रूरत पड़ने पर किसको समर्थन देंगी। यह तीन पार्टियां हैं ओडिशा की बीजेडी, तेलंगाना की टीआरएस और आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ओडिशा में लोकसभा की 21, आंध्र प्रदेश में 25 और तेलंगाना में 17 सीटें हैं। इन तीनों राज्यों से कुल मिलाकर 63 सांसद लोकसभा पहुंचते हैं। इस लोकसभा चुनाव में ओडिशा में बीजेडी, तेलंगाना में टीआरएस और आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही हैं। राजनीति के जानकारों का मानना है कि इन राज्यों की ज़्यादातर सीटों पर इन्हीं तीन पार्टियों की जीत होगी, और इन्हीं तीन पार्टियों के नेता किंग मेकर की भूमिका में नज़र आएंगे। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेडी ने 20, टीआरएस ने 11 और वाईएसआर कांग्रेस ने 9 सीटों पर जीत हासिल की थी। यानी कि इन तीनों ही पार्टियों ने 63 लोकसभा सीटों में से 40 सीटों पर जीत दर्ज की थी।
सबसे पहले बात करते हैं बीजेडी यानी कि बीजू जनता दल की। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ओडिशा में नवीन पटनायक की बीजेडी के मुक़ाबले कोई भी पार्टी नहीं है। पिछले चुनाव में बीजेडी ने राज्य की 21 में से 20 सीटों पर जीत हासिल की थी। इस बार फ़िर से बीजेडी का मुक़ाबला भाजपा और कांग्रेस दोनों से है। हालांकि, बीजेडी ने कभी भी कांग्रेस को समर्थन नहीं दिया है। जबकि बीजेडी और भाजपा दोनों साथ मिलकर चुनाव लड़ चुकी हैं और दोनों पार्टियां साथ में राज्य में सरकार भी चला चुकी हैं। 2009 के पहले बीजेडी, एनडीए का हिस्सा थी, लेकिन इसके बाद दोनों ही पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं।
अपने चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘रणनीति’ के तहत बीजेडी पर ज़्यादा आक्रमक प्रहार नहीं किये हैं। चुनाव के पहले कई मौक़ों पर प्रधानमंत्री मोदी ने नवीन पटनायक की ‘तारीफ़’ भी की है और ज़रूरत पड़ने पर वे राज्य के साथ खड़े भी नज़र आए हैं। राजनीति के जानकारों का मानना है कि ‘ज़रूरत’ पड़ने पर बीजेडी, एनडीए को समर्थन दे सकती है। क्योंकि पहले भी बीजेडी, एनडीए का हिस्सा रह चुकी है।
अब बात करते हैं तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) की पार्टी टीआरएस की। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि तेलंगाना में टीआरएस ‘अकेले’ चुनावी मैदान में है। कभी एनडीए में रहे के चंद्रशेखर राव ग़ैर-भाजपा और ग़ैर-कांग्रेस सरकार के गठन की कोशिशों में लगे हुए हैं। हाल ही में तेलंगाना में हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम देखकर ‘अन्दाज़ा’ लगाया जा सकता है कि केसीआर की पार्टी तेलंगाना की अधिकतर लोकसभा सीटों पर जीत हासिल कर सकती है। इस तरह से अगर किसी भी दल को बहुमत नहीं मिलता है, तो केसीआर किंग मेकर की भूमिका में होंगे। अब जबकि केसीआर पहले एनडीए का हिस्सा रह चुके हैं, तो कहा जा रहा है कि राज्य को ‘बेहतर पैकेज’ की आशा में केसीआर, एनडीए को समर्थन दे सकते हैं।
आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी के लोकसभा चुनाव में कड़ा मुक़ाबला है। इस चुनाव में दोनों ही पार्टियों ने किसी भी तरह का कोई भी गठबंधन नहीं किया है। मोदी सरकार में टीडीपी, एनडीए की सहयोगी थी लेकिन विशेष राज्य के मुद्दे पर टीडीपी ने एनडीए से नाता तोड़ लिया था।
आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू और जगन मोहन रेड्डी के बीच ‘राजनीतिक वर्चस्व’ की लड़ाई है। ऐसे में केन्द्र में समर्थन की ज़रूरत पड़ने पर दोनों ही पार्टियां एक मंच पर एक साथ शायद ही आएं। टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू की कांग्रेस के साथ ‘नजदीकियों’ के बाद माना जा रहा है कि जगन मोहन रेड्डी अपनी मांगों के पूरा होने के बदले में एनडीए का साथ दे सकते हैं।
अब देखना होगा कि 23 मई के नतीजे क्या कहते हैं। यदि एनडीए को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, तो नवीन पटनायक, के चंद्रशेखर राव और जगन मोहन रेड्डी पर सभी की निगाहें रहेंगी। नवीन पटनायक की बीजेडी और के चंद्रशेखर राव की टीआरएस ये दोनों ही पार्टियां एनडीए की सहयोगी रह चुकी हैं। वहीं टीडीपी से राजनीतिक लड़ाई के चलते जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी भी एनडीए के साथ आ सकती है।