भारतीय अर्थव्यवस्था पर ‘भ्रम’ की स्थिति!
Tuesday - May 14, 2019 10:15 am ,
Category : WTN HINDI
भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पर अर्थशास्त्रियों की ‘अलग-अलग’ राय
2020 में 7 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल कर सकती है भारतीय अर्थव्यवस्था, लेकिन आंकड़े बयां कर रहे अलग ही तस्वीर!
MAY 14 (WTN) – भारतीय अर्थव्यस्था की वृद्धि पर इन दिनों सवालिया निशान लगते जा रहे हैं कि वो वृद्धि की दिशा में जा रही है या फ़िर मंदी की और अग्रसर है। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि अलग-अलग आंकड़ों और अर्थशास्त्रियों के राय के कारण भ्रम की स्थिति बनी हुई है। सबसे पहले बात करते हैं भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति वी. सुब्रह्मण्यम की, तो उनके मुताबिक़ मोदी सरकार की दूरदर्शी नीतियों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था एक नया मुकाम पाने की और अग्रसर है। बैंकरप्सी क़ानूनों, जीएसटी और फ़र्जी कम्पनियों पर कार्रवाई के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था मौजूदा वित्त वर्ष में 7 प्रतिशत की दर से वृद्धि करेगी।
सुब्रह्मण्यम के मुताबिक़, पिछले पांच वर्षों में अपनाए गये राजकोषीय अनुशासन के भारत 7 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल कर सकता है। सुब्रह्मण्यम के अनुसार, मोदी सरकार के आर्थिक सुधारों के उपायों के असर से मौजूदा आर्थिक सुस्ती का स्थान धीरे-धीरे उच्च निवेश और उपभोग ले लेगा।
कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि मोदी सरकार द्वारा किये गये सुधारों का असर अब दिखने लगा है, जिसके बाद भारतीय अर्थव्यवस्था चीन से आगे निकल कर सबसे तेज़ वृद्धि करने वाली अर्थव्यवस्था बनने की और अग्रसर है। जानकारों के मुताबिक़, मोदी सरकार के आर्थिक सुधारों के कारण भारत के पास अभी भी तेज़ वृद्धि दर की पर्याप्त सम्भावना है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी), भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने 2019-20 के लिए भारत की जीडीपी दर 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर दिसम्बर की तिमाही में 6.6. प्रतिशत थी, जो कि पिछली पांच तिमाहियों में सबसे कम थी। इसके कारण सरकार के केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने पिछले महीने 2018-19 के अनुमान को 7.2 प्रतिशत से घटाकर सात प्रतिशत कर दिया है।
जानकारों के मुताबिक़, यदि देश में आर्थिक वृद्धि पर 7 प्रतिशत से ज़्यादा रहती है, तो इससे निवेश पर काफ़ी सकारात्मक असर पड़ेगा। जैसा कि हर चुनावी वर्ष में होता है, इस समय उद्योग जगत इंतज़ार करो और देखो की स्थिति में है। वैसे भारतीय अर्थव्यवस्था के पास विकास करने की क्षमता है, लेकिन उपभोग 80 प्रतिशत से नीचे चला गया है। इसी कारण से भारत में निवेश में कमी आई है, लेकिन यह स्थिति स्थायी नहीं है बल्कि अस्थायी है।
लेकिन वहीं दूसरी तरफ़ कुछ दिनों पहल प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रथिन रॉय ने भारतीय अर्थव्यस्था के बारे में कुछ और ही बातें कहीं थी। रॉय ने अपना मत जाहिर करते हुए कहा था कि देश की अर्थव्यवस्था ‘गहरे संकट’ की तरफ़ जा रही है। रॉय के मुताबिक़, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की तरह भारत भी धीमी गति वाला विकासशील देश बनने की ओर चल पड़ा है, और उन्हें डर है कि यह आर्थिक मंदी भारतीय अर्थव्यवस्था को घेर लेगी।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस साल मार्च के महीने में इंडस्ट्रियल ग्रोथ रेट 5.3 प्रतिशथ से घटकर -0.1 प्रतिशत पर आ गई है, और ये आंकड़े 23 महीने में सबसे निम्नतम हैं। इस विषय के जानकारों का मानना है कि आईआईपी ग्रोथ के गिरने का अनुमान पहले से था, लेकिन यह इतना गिर जाएगा इसका अंदाज़ किसी को नहीं था।
इधर, वित्त मंत्रालय से जुड़ी एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि 2018-19 में ग्रॉस टैक्स कलेक्शन में 1.6 लाख करोड़ रुपए की कमी आई है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार यह कमी ख़ासतौर से दूसरी छमाही में आर्थिक मंदी को दर्शाती है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि धीमी आर्थिक विकास का नौकरियों पर सीधा असर पड़ता है। भारतीय अर्थव्यवस्था निगरानी केंद्र (CMIE) के डेटा के मुताबिक़, इसी साल मार्च के महीने में बेरोजगारी का प्रतिशत 6.71 था, जो कि अप्रैल में बढ़कर 7.6 प्रतिशत हो गया।
इन सभी आंकड़ों के आधार पर भारतीय अर्थव्यस्था की वृद्धि दर पर भ्रम की स्थिति निर्मित हो गई है। जहां एक तरफ मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति वी. सुब्रह्मण्यम के अनुसार 2020 में भारतीय अर्थव्यवस्था वृद्धि दर के मामले में चीन को पछाड़ देगी, तो वहीं दूसरी तरफ़ प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रथिन रॉय के मुताबिक़ भारतीय अर्थव्यवस्था धीमी गति की अर्थव्यस्था बनती जा रही है। इन सभी विरोधाभासों के बीच देखना होगा कि मोदी सरकार की दूरगामी आर्थिक नीतियों के कारण भारतीय अर्थव्यस्था को कितना लाभ मिलता है?
MAY 14 (WTN) – भारतीय अर्थव्यस्था की वृद्धि पर इन दिनों सवालिया निशान लगते जा रहे हैं कि वो वृद्धि की दिशा में जा रही है या फ़िर मंदी की और अग्रसर है। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि अलग-अलग आंकड़ों और अर्थशास्त्रियों के राय के कारण भ्रम की स्थिति बनी हुई है। सबसे पहले बात करते हैं भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति वी. सुब्रह्मण्यम की, तो उनके मुताबिक़ मोदी सरकार की दूरदर्शी नीतियों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था एक नया मुकाम पाने की और अग्रसर है। बैंकरप्सी क़ानूनों, जीएसटी और फ़र्जी कम्पनियों पर कार्रवाई के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था मौजूदा वित्त वर्ष में 7 प्रतिशत की दर से वृद्धि करेगी।
सुब्रह्मण्यम के मुताबिक़, पिछले पांच वर्षों में अपनाए गये राजकोषीय अनुशासन के भारत 7 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल कर सकता है। सुब्रह्मण्यम के अनुसार, मोदी सरकार के आर्थिक सुधारों के उपायों के असर से मौजूदा आर्थिक सुस्ती का स्थान धीरे-धीरे उच्च निवेश और उपभोग ले लेगा।
कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि मोदी सरकार द्वारा किये गये सुधारों का असर अब दिखने लगा है, जिसके बाद भारतीय अर्थव्यवस्था चीन से आगे निकल कर सबसे तेज़ वृद्धि करने वाली अर्थव्यवस्था बनने की और अग्रसर है। जानकारों के मुताबिक़, मोदी सरकार के आर्थिक सुधारों के कारण भारत के पास अभी भी तेज़ वृद्धि दर की पर्याप्त सम्भावना है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी), भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने 2019-20 के लिए भारत की जीडीपी दर 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर दिसम्बर की तिमाही में 6.6. प्रतिशत थी, जो कि पिछली पांच तिमाहियों में सबसे कम थी। इसके कारण सरकार के केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने पिछले महीने 2018-19 के अनुमान को 7.2 प्रतिशत से घटाकर सात प्रतिशत कर दिया है।
जानकारों के मुताबिक़, यदि देश में आर्थिक वृद्धि पर 7 प्रतिशत से ज़्यादा रहती है, तो इससे निवेश पर काफ़ी सकारात्मक असर पड़ेगा। जैसा कि हर चुनावी वर्ष में होता है, इस समय उद्योग जगत इंतज़ार करो और देखो की स्थिति में है। वैसे भारतीय अर्थव्यवस्था के पास विकास करने की क्षमता है, लेकिन उपभोग 80 प्रतिशत से नीचे चला गया है। इसी कारण से भारत में निवेश में कमी आई है, लेकिन यह स्थिति स्थायी नहीं है बल्कि अस्थायी है।
लेकिन वहीं दूसरी तरफ़ कुछ दिनों पहल प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रथिन रॉय ने भारतीय अर्थव्यस्था के बारे में कुछ और ही बातें कहीं थी। रॉय ने अपना मत जाहिर करते हुए कहा था कि देश की अर्थव्यवस्था ‘गहरे संकट’ की तरफ़ जा रही है। रॉय के मुताबिक़, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की तरह भारत भी धीमी गति वाला विकासशील देश बनने की ओर चल पड़ा है, और उन्हें डर है कि यह आर्थिक मंदी भारतीय अर्थव्यवस्था को घेर लेगी।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस साल मार्च के महीने में इंडस्ट्रियल ग्रोथ रेट 5.3 प्रतिशथ से घटकर -0.1 प्रतिशत पर आ गई है, और ये आंकड़े 23 महीने में सबसे निम्नतम हैं। इस विषय के जानकारों का मानना है कि आईआईपी ग्रोथ के गिरने का अनुमान पहले से था, लेकिन यह इतना गिर जाएगा इसका अंदाज़ किसी को नहीं था।
इधर, वित्त मंत्रालय से जुड़ी एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि 2018-19 में ग्रॉस टैक्स कलेक्शन में 1.6 लाख करोड़ रुपए की कमी आई है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार यह कमी ख़ासतौर से दूसरी छमाही में आर्थिक मंदी को दर्शाती है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि धीमी आर्थिक विकास का नौकरियों पर सीधा असर पड़ता है। भारतीय अर्थव्यवस्था निगरानी केंद्र (CMIE) के डेटा के मुताबिक़, इसी साल मार्च के महीने में बेरोजगारी का प्रतिशत 6.71 था, जो कि अप्रैल में बढ़कर 7.6 प्रतिशत हो गया।
इन सभी आंकड़ों के आधार पर भारतीय अर्थव्यस्था की वृद्धि दर पर भ्रम की स्थिति निर्मित हो गई है। जहां एक तरफ मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति वी. सुब्रह्मण्यम के अनुसार 2020 में भारतीय अर्थव्यवस्था वृद्धि दर के मामले में चीन को पछाड़ देगी, तो वहीं दूसरी तरफ़ प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रथिन रॉय के मुताबिक़ भारतीय अर्थव्यवस्था धीमी गति की अर्थव्यस्था बनती जा रही है। इन सभी विरोधाभासों के बीच देखना होगा कि मोदी सरकार की दूरगामी आर्थिक नीतियों के कारण भारतीय अर्थव्यस्था को कितना लाभ मिलता है?