सोनिया गांधी के सामने ‘सबसे बड़ी’ चुनौती!
Wednesday - May 15, 2019 2:34 pm ,
Category : WTN HINDI
पूरे विपक्ष को ‘एकजुट’ करने सोनिया गांधी ने की पहल
बड़ा सवाल: क्या नरेन्द्र मोदी को रोकने बीजेडी, टीआरएस और वाईएसआर कांग्रेस को एकजुट कर पाएंगी सोनिया गांधी?
MAY 15 (WTN) – विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में हो रहे लोकसभा चुनाव के नतीजों पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। 23 मई को घोषित हो रहे नतीजों के बाद देश की राजनीतिक की दशा और दिशा तय होने जा रही है। पूरे देश में इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि मोदी सरकार की फ़िर से वापसी हो पाती है कि नहीं? लेकिन इन सबके बीच, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी एक बार फ़िर से सक्रिय हो गई हैं। सोनिया गांधी के सक्रिय होने का कारण है नरेन्द्र मोदी को फ़िर से प्रधानमंत्री बनने से रोकना।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि लोकसभा चुनाव के सातवें चरण की वोटिंग से पहले यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी विपक्षी दलों को एकजुट करने की कवायद में जुट गई हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक़, सोनिया गांधी ने विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं को फ़ोन करके एकजुट करने की कोशिश की है। सोनिया गांधी ने विपक्षी नेताओं को 22, 23 और 24 मई को दिल्ली में ही रहने के लिए 'अप्रत्यक्ष' रूप से आग्रह किया है।
यूपीए अध्यक्ष की इस पूरी कवायद के पीछे साफ़ मक़सद है नरेन्द्र मोदी को फ़िर से प्रधानमंत्री बनने से रोकना, और इसके लिए सोनिया गांधी विपक्षी नेताओं को एक करने के लिए ख़ुद आगे आई हैं। दरअसल, सोनिया गांधी विपक्षी दलों के नेताओं को यह सन्देश देना चाहती हैं कि लोकसभा चुनाव में सभी विपक्षी पार्टियां एक साथ मिलकर एनडीए के ख़िलाफ़ चुनाव नहीं लड़ सकीं, लेकिन हर कहीं सभी राजनीतिक दल की लड़ाई मोदी सरकार के ख़िलाफ़ ही थी। सोनिया गांधी विपक्षी नेताओं को एकजुट कर यह सन्देश देना चाहती हैं कि मोदी को सत्ता से दूर रखने के लिए अब सभी को एक होने की ज़रूरत है।
कहा जा रहा है कि एनडीए को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में सोनिया गांधी सभी विपक्षी पार्टियों से एकजुट होने की अपील कर सकती हैं, ताकि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोका जा सके। लेकिन इस सबके बीच सोनिया गांधी के सामने सबसे बड़ी मुश्किल तीन क्षेत्रीय पार्टियों; बीजेडी, टीआरएस और वाईएसआर कांग्रेस को मोदी विरोधी गुट में शामिल करने की है।
जाहिर है कि यदि एनडीए को बहुमत नहीं मिलता है, तो सरकार बनाने के लिए भाजपा; बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस और टीआरएस जैसी क्षेत्रीय पार्टियों से समर्थन लेने की कोशिश कर सकती है। ऐसे में सोनिया गांधी के सामने सबसे बड़ी समस्या है कि इन तीनों ही पार्टियों को मोदी विरोधी खेमे में कैसे लाया जाए?
विपक्षी दलों की बात की जाए, तो बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस और टीआरएस जैसी पार्टियों को छोड़कर बाक़ी पार्टियां मोदी विरोधी गठबंधन में शामिल हो सकती हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि बीजेडी और टीआरएस यह दोनों ही पार्टियां एक समय एनडीए का हिस्सा रह चुकी हैं। वहीं वाईएसआर कांग्रेस पार्टी अपनी पुरानी वैचारिक लड़ाई के कारण कांग्रेस के साथ जाने से रही। ऐसे में यदि एनडीए को बहुमत नहीं मिलता है, तो इन तीनों ही पार्टियों से समर्थन लेकर मोदी फ़िर से सरकार बना सकते हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ओडिशा में लोकसभा की 21, आंध्र प्रदेश में 25 और तेलंगाना में 17 सीटें हैं। इन तीनों ही राज्यों से कुल मिलाकर 63 सांसद लोकसभा में पहुंचते हैं। इस लोकसभा चुनाव में ओडिशा में बीजेडी, तेलंगाना में टीआरएस और आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही हैं। राजनीति के जानकारों का मानना है कि इन राज्यों की ज़्यादातर सीटों पर इन्हीं तीन पार्टियों की जीत होगी, और इन्हीं तीन पार्टियों के नेता किंग मेकर की भूमिका में नज़र आएंगे। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेडी ने 20, टीआरएस ने 11 और वाईएसआर कांग्रेस ने 9 सीटों पर जीत हासिल की थी। यानी कि इन तीनों ही पार्टियों ने 63 लोकसभा सीटों में से 40 सीटों पर जीत दर्ज की थी।
ऐसे में सोनिया गांधी जानती हैं कि कुछ सीटें कम रहने पर मोदी और शाह की जोड़ी ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना को अच्छे पैकेज का वादा कर क्रमश: बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस और टीआरएस से समर्थन ले सकती है। ऐसे में अब देखना होगा कि इन पार्टियों को अपने साथ लाने के लिए सोनिया गांधी क्या रणनीति बनाती है?
भविष्य की इन्हीं सभी सम्भावनाओं को देखते हुए सोनिया गांधी ने विपक्षी नेताओं को एकजुट करने की कवायद तेज़ कर दी है। सोनिया गांधी जानती हैं कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने का बस एक ही रास्ता है, और वो रास्ता है पूरे विपक्ष को एकजुट करना। लेकिन सोनिया गांधी के सामने बड़ी चुनौती बीजेडी, टीआरएस और वाईएसआर कांग्रेस को मोदी विरोधी खेमे में शामिल करने की है। अब देखते हैं कि सोनिया गांधी अपनी इस मुहिम में सफ़ल हो पाती हैं कि नहीं?
MAY 15 (WTN) – विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में हो रहे लोकसभा चुनाव के नतीजों पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। 23 मई को घोषित हो रहे नतीजों के बाद देश की राजनीतिक की दशा और दिशा तय होने जा रही है। पूरे देश में इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि मोदी सरकार की फ़िर से वापसी हो पाती है कि नहीं? लेकिन इन सबके बीच, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी एक बार फ़िर से सक्रिय हो गई हैं। सोनिया गांधी के सक्रिय होने का कारण है नरेन्द्र मोदी को फ़िर से प्रधानमंत्री बनने से रोकना।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि लोकसभा चुनाव के सातवें चरण की वोटिंग से पहले यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी विपक्षी दलों को एकजुट करने की कवायद में जुट गई हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक़, सोनिया गांधी ने विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं को फ़ोन करके एकजुट करने की कोशिश की है। सोनिया गांधी ने विपक्षी नेताओं को 22, 23 और 24 मई को दिल्ली में ही रहने के लिए 'अप्रत्यक्ष' रूप से आग्रह किया है।
यूपीए अध्यक्ष की इस पूरी कवायद के पीछे साफ़ मक़सद है नरेन्द्र मोदी को फ़िर से प्रधानमंत्री बनने से रोकना, और इसके लिए सोनिया गांधी विपक्षी नेताओं को एक करने के लिए ख़ुद आगे आई हैं। दरअसल, सोनिया गांधी विपक्षी दलों के नेताओं को यह सन्देश देना चाहती हैं कि लोकसभा चुनाव में सभी विपक्षी पार्टियां एक साथ मिलकर एनडीए के ख़िलाफ़ चुनाव नहीं लड़ सकीं, लेकिन हर कहीं सभी राजनीतिक दल की लड़ाई मोदी सरकार के ख़िलाफ़ ही थी। सोनिया गांधी विपक्षी नेताओं को एकजुट कर यह सन्देश देना चाहती हैं कि मोदी को सत्ता से दूर रखने के लिए अब सभी को एक होने की ज़रूरत है।
कहा जा रहा है कि एनडीए को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में सोनिया गांधी सभी विपक्षी पार्टियों से एकजुट होने की अपील कर सकती हैं, ताकि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोका जा सके। लेकिन इस सबके बीच सोनिया गांधी के सामने सबसे बड़ी मुश्किल तीन क्षेत्रीय पार्टियों; बीजेडी, टीआरएस और वाईएसआर कांग्रेस को मोदी विरोधी गुट में शामिल करने की है।
जाहिर है कि यदि एनडीए को बहुमत नहीं मिलता है, तो सरकार बनाने के लिए भाजपा; बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस और टीआरएस जैसी क्षेत्रीय पार्टियों से समर्थन लेने की कोशिश कर सकती है। ऐसे में सोनिया गांधी के सामने सबसे बड़ी समस्या है कि इन तीनों ही पार्टियों को मोदी विरोधी खेमे में कैसे लाया जाए?
विपक्षी दलों की बात की जाए, तो बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस और टीआरएस जैसी पार्टियों को छोड़कर बाक़ी पार्टियां मोदी विरोधी गठबंधन में शामिल हो सकती हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि बीजेडी और टीआरएस यह दोनों ही पार्टियां एक समय एनडीए का हिस्सा रह चुकी हैं। वहीं वाईएसआर कांग्रेस पार्टी अपनी पुरानी वैचारिक लड़ाई के कारण कांग्रेस के साथ जाने से रही। ऐसे में यदि एनडीए को बहुमत नहीं मिलता है, तो इन तीनों ही पार्टियों से समर्थन लेकर मोदी फ़िर से सरकार बना सकते हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ओडिशा में लोकसभा की 21, आंध्र प्रदेश में 25 और तेलंगाना में 17 सीटें हैं। इन तीनों ही राज्यों से कुल मिलाकर 63 सांसद लोकसभा में पहुंचते हैं। इस लोकसभा चुनाव में ओडिशा में बीजेडी, तेलंगाना में टीआरएस और आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही हैं। राजनीति के जानकारों का मानना है कि इन राज्यों की ज़्यादातर सीटों पर इन्हीं तीन पार्टियों की जीत होगी, और इन्हीं तीन पार्टियों के नेता किंग मेकर की भूमिका में नज़र आएंगे। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेडी ने 20, टीआरएस ने 11 और वाईएसआर कांग्रेस ने 9 सीटों पर जीत हासिल की थी। यानी कि इन तीनों ही पार्टियों ने 63 लोकसभा सीटों में से 40 सीटों पर जीत दर्ज की थी।
ऐसे में सोनिया गांधी जानती हैं कि कुछ सीटें कम रहने पर मोदी और शाह की जोड़ी ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना को अच्छे पैकेज का वादा कर क्रमश: बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस और टीआरएस से समर्थन ले सकती है। ऐसे में अब देखना होगा कि इन पार्टियों को अपने साथ लाने के लिए सोनिया गांधी क्या रणनीति बनाती है?
भविष्य की इन्हीं सभी सम्भावनाओं को देखते हुए सोनिया गांधी ने विपक्षी नेताओं को एकजुट करने की कवायद तेज़ कर दी है। सोनिया गांधी जानती हैं कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने का बस एक ही रास्ता है, और वो रास्ता है पूरे विपक्ष को एकजुट करना। लेकिन सोनिया गांधी के सामने बड़ी चुनौती बीजेडी, टीआरएस और वाईएसआर कांग्रेस को मोदी विरोधी खेमे में शामिल करने की है। अब देखते हैं कि सोनिया गांधी अपनी इस मुहिम में सफ़ल हो पाती हैं कि नहीं?