एस.जयशंकर यानी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ‘मास्टर स्ट्रोक’!
Friday - May 31, 2019 10:58 am ,
Category : WTN HINDI
कूटनीति के जानकार एस.जयशंकर बने मोदी मंत्रिमण्डल के सदस्य
पूर्व विदेश सचिव जयशंकर को मंत्री बनाकर मोदी ने चला बड़ा दांव, अमेरिका और चीन के साथ सम्बन्धों को मिलेगी नई दिशा
MAY 31 (WTN) – नरेन्द्र मोदी के दूसरे कार्यकाल के मंत्रिमण्डल में यदि कोई सबसे ज़्यादा चौकाने वाला नाम है तो वो है पूर्व विदेश सचिव एस.जयशंकर का। जब जयशंकर ने कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ ली तो सभी आश्चर्यचकित रह गये, लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है कि पूर्व विदेश सचिव एस.जयशंकर को मंत्रिमण्डल में शामिल करके नरेन्द्र मोदी ने एक बहुत शानदार मास्टर स्ट्रोक खेला है।
देखा गया है कि प्रधानमंत्री मोदी अपनी मंत्रिपरिषद में ऐसे लोगों को ज़्यादा तवज्जो देते हैं जो किसी ना किसी क्षेत्र के विशेषज्ञ होते हैं, और इसी कारण से जयशंकर को मोदी मंत्रिमण्डल में लिया गया है। 1977 बैच के आईएफएस अधिकारी जयशंकर अपनी काबिलियत के कारण मोदी सरकार में मंत्री बनने में सफ़ल हो सके हैं। चीन के साथ डोकलाम विवाद से लेकर संयुक्त राष्ट्र में भारत की पैरवी करने तक एस.जयशंकर की काफ़ी महत्वपूर्ण कूटनीतिक भूमिका रही है।
मोदी जब भी किसी गैर राजनीतिक व्यक्ति को मंत्री बनाते हैं तो साफ़ जाहिर है कि उसमें योग्यता तो होगी है। दरअसल, नरेन्द्र मोदी और एस.जयशंकर के बीच पहचान काफ़ी पुरानी है, और इसी कारण से मोदी, जयशंकर की क्षमताओं को अच्छी तरह से पहचानते हैं। साल 2012 में जब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में चीन के दौरे पर गये थे तो वहां पर उनकी मुलाक़ात चीन में भारतीय राजदूत के रूप में पदस्थ जयशंकर से हुई थी। कहा जाता है उस मुलाक़ात के दौरान हुई चर्चा के बाद ही जयशंकर, नरेन्द्र मोदी के क़रीब आ गये।
एक नाटकीय घटनाक्रम में सुजाता सिंह के विदेश सचिव पद से हटते ही नरेन्द्र मोदी ने जनवरी 2015 में जयशंकर को भारत का विदेश सचिव बनाया। जयशंकर को विदेश सचिव बनाते समय उनसे वरिष्ठ अधिकारियों पर उन्हें तवज्जो दी गई, लेकिन जयशंकर ने अपने कार्यकाल के दौरान अपनी काबिलियत बखूबी साबित की।
विदेश सचिव के पद पर जयशंकर जनवरी 2018 तक क़ाबिज रहे। जानकारों का मानना है कि नरेन्द्र मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान विदेश नीति को आकार प्रदान करने में जयशंकर ने अहम भूमिका निभाई थी, जिसके कारण ही जयशंकर, मोदी के क़रीब होते चले गये।
विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि जयशंकर के विदेश सचिव रहते ही भारत के अमेरिका, चीन और अरब देशों के साथ सम्बन्धों में काफी सुधार और विस्तार हुआ। जयशंकर विदेश सचिव बनने से पहले साल 2013 से अमेरिका में भारत के राजदूत थे। जयशंकर ने ही सितम्बर 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में मोदी की पहली अमेरिका यात्रा की योजना तैयार की थी और इसे सफल बनाने में उनकी अहम भूमिका थी। प्रधानमंत्री मोदी ने जब अमेरिका के मेडिसन स्क्वायर पर प्रवासी भारतीय सम्मेलन को सम्बोधित किया था तो इस सम्मेलन के बाद ही मोदी की छवि रातों रात अंतर्राष्ट्रीय नेता की बन गई थी।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एस.जयशंकर उन राजनयिकों में से हैं, जिन्हें चीन, अमेरिका और रूस जैसे शक्तिशाली देशों में काम करने का काफ़ी अनुभव है। भारत-अमेरिका सम्बन्धों के विशेषज्ञ जयशंकर ने ही साल 2007 में भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते की बातचीत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। इसके अलावा भारत और अमेरिका के बीच आईएफएस अधिकारी देवयानी खोबरागड़े विवाद सुलझाने में भी जयशंकर की कूटनीतिक की सभी ने सराहना की थी।
अमेरिका के अलावा चीनी मामलों के भी जयशंकर विशेषज्ञ माने जाते हैं। जयशंकर ने चीन और भारत के बीच तनाव को कम कर दोनों देशों के बीच रिश्तों को मज़बूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जयशंकर चीन में देश के सबसे लम्बे समय तक राजदूत रहे हें। जयशंकर को इस बात का भी श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने चीन द्वारा कश्मीरियों के लिए जारी स्टैप्ड वीजा को समाप्त करने के लिए चीन के साथ बातचीत की।
साफ़ जाहिर है कि एस.जयशंकर की काबिलियत को देखते हुए ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें अपने मंत्रिमण्डल में शामिल किया है। जयशंकर के अनुभवों और विशेषज्ञता का फ़ायदा उठाते हुए प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका और चीन के साथ कूटनीतिक सम्बन्धों में सुधार और विस्तार कर सकते हैं। भारत के पड़ोसी देशों पर चीन के प्रभाव को कम करने और अरब देशों से सम्बन्धों को सुधारने में भी जयशंकर की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। वहीं जयशंकर, पाकिस्तान को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक रूप से घेरने के लिए मोदी सरकार के सबसे विश्वसनीय और सफल व्यक्ति साबित हो सकते हैं।
MAY 31 (WTN) – नरेन्द्र मोदी के दूसरे कार्यकाल के मंत्रिमण्डल में यदि कोई सबसे ज़्यादा चौकाने वाला नाम है तो वो है पूर्व विदेश सचिव एस.जयशंकर का। जब जयशंकर ने कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ ली तो सभी आश्चर्यचकित रह गये, लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है कि पूर्व विदेश सचिव एस.जयशंकर को मंत्रिमण्डल में शामिल करके नरेन्द्र मोदी ने एक बहुत शानदार मास्टर स्ट्रोक खेला है।
देखा गया है कि प्रधानमंत्री मोदी अपनी मंत्रिपरिषद में ऐसे लोगों को ज़्यादा तवज्जो देते हैं जो किसी ना किसी क्षेत्र के विशेषज्ञ होते हैं, और इसी कारण से जयशंकर को मोदी मंत्रिमण्डल में लिया गया है। 1977 बैच के आईएफएस अधिकारी जयशंकर अपनी काबिलियत के कारण मोदी सरकार में मंत्री बनने में सफ़ल हो सके हैं। चीन के साथ डोकलाम विवाद से लेकर संयुक्त राष्ट्र में भारत की पैरवी करने तक एस.जयशंकर की काफ़ी महत्वपूर्ण कूटनीतिक भूमिका रही है।
मोदी जब भी किसी गैर राजनीतिक व्यक्ति को मंत्री बनाते हैं तो साफ़ जाहिर है कि उसमें योग्यता तो होगी है। दरअसल, नरेन्द्र मोदी और एस.जयशंकर के बीच पहचान काफ़ी पुरानी है, और इसी कारण से मोदी, जयशंकर की क्षमताओं को अच्छी तरह से पहचानते हैं। साल 2012 में जब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में चीन के दौरे पर गये थे तो वहां पर उनकी मुलाक़ात चीन में भारतीय राजदूत के रूप में पदस्थ जयशंकर से हुई थी। कहा जाता है उस मुलाक़ात के दौरान हुई चर्चा के बाद ही जयशंकर, नरेन्द्र मोदी के क़रीब आ गये।
एक नाटकीय घटनाक्रम में सुजाता सिंह के विदेश सचिव पद से हटते ही नरेन्द्र मोदी ने जनवरी 2015 में जयशंकर को भारत का विदेश सचिव बनाया। जयशंकर को विदेश सचिव बनाते समय उनसे वरिष्ठ अधिकारियों पर उन्हें तवज्जो दी गई, लेकिन जयशंकर ने अपने कार्यकाल के दौरान अपनी काबिलियत बखूबी साबित की।
विदेश सचिव के पद पर जयशंकर जनवरी 2018 तक क़ाबिज रहे। जानकारों का मानना है कि नरेन्द्र मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान विदेश नीति को आकार प्रदान करने में जयशंकर ने अहम भूमिका निभाई थी, जिसके कारण ही जयशंकर, मोदी के क़रीब होते चले गये।
विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि जयशंकर के विदेश सचिव रहते ही भारत के अमेरिका, चीन और अरब देशों के साथ सम्बन्धों में काफी सुधार और विस्तार हुआ। जयशंकर विदेश सचिव बनने से पहले साल 2013 से अमेरिका में भारत के राजदूत थे। जयशंकर ने ही सितम्बर 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में मोदी की पहली अमेरिका यात्रा की योजना तैयार की थी और इसे सफल बनाने में उनकी अहम भूमिका थी। प्रधानमंत्री मोदी ने जब अमेरिका के मेडिसन स्क्वायर पर प्रवासी भारतीय सम्मेलन को सम्बोधित किया था तो इस सम्मेलन के बाद ही मोदी की छवि रातों रात अंतर्राष्ट्रीय नेता की बन गई थी।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एस.जयशंकर उन राजनयिकों में से हैं, जिन्हें चीन, अमेरिका और रूस जैसे शक्तिशाली देशों में काम करने का काफ़ी अनुभव है। भारत-अमेरिका सम्बन्धों के विशेषज्ञ जयशंकर ने ही साल 2007 में भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते की बातचीत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। इसके अलावा भारत और अमेरिका के बीच आईएफएस अधिकारी देवयानी खोबरागड़े विवाद सुलझाने में भी जयशंकर की कूटनीतिक की सभी ने सराहना की थी।
अमेरिका के अलावा चीनी मामलों के भी जयशंकर विशेषज्ञ माने जाते हैं। जयशंकर ने चीन और भारत के बीच तनाव को कम कर दोनों देशों के बीच रिश्तों को मज़बूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जयशंकर चीन में देश के सबसे लम्बे समय तक राजदूत रहे हें। जयशंकर को इस बात का भी श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने चीन द्वारा कश्मीरियों के लिए जारी स्टैप्ड वीजा को समाप्त करने के लिए चीन के साथ बातचीत की।
साफ़ जाहिर है कि एस.जयशंकर की काबिलियत को देखते हुए ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें अपने मंत्रिमण्डल में शामिल किया है। जयशंकर के अनुभवों और विशेषज्ञता का फ़ायदा उठाते हुए प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका और चीन के साथ कूटनीतिक सम्बन्धों में सुधार और विस्तार कर सकते हैं। भारत के पड़ोसी देशों पर चीन के प्रभाव को कम करने और अरब देशों से सम्बन्धों को सुधारने में भी जयशंकर की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। वहीं जयशंकर, पाकिस्तान को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक रूप से घेरने के लिए मोदी सरकार के सबसे विश्वसनीय और सफल व्यक्ति साबित हो सकते हैं।