अपनी पार्टी को सम्भालिये मिस्टर राहुल गांधी!
Friday - June 7, 2019 10:30 am ,
Category : WTN HINDI
कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं!
लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक हार के बाद कांग्रेस में ‘विद्रोह’!
JUNE 07 (WTN) – लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ऐतिहासिक पराजय के बाद कुछ समय तक तो कांग्रेस में ख़ामोशी रही, लेकिन अब कांग्रेस में विद्रोह का दौर जारी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी सिर्फ़ 44 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी थी। 2014 में 10 साल की सत्ता विरोधी लहर के कारण कांग्रेस पार्टी की इतनी करारी हार हुई थी। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को उम्मीद थी कि मोदी सरकार को सत्ता विरोधी लहर का नुकसान उठाना पड़ेगा और एनडीए को बहुमत हासिल नहीं होगा।
लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व के सामने कांग्रेस पार्टी की सभी रणनीतियां असफल साबित हुईं और कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में फ़िर से बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा। लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेसियों को काफ़ी विश्वास था कि एनडीए की हार होगी और कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनेगी। लेकिन कांग्रेसियों के सभी सपने टूट गये।
दरअसल, कांग्रेसियों को अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी से काफ़ी उम्मीदें थी कि वे एक कुशल नेता हैं। लेकिन हक़ीकत यह है कि राहुल गांधी एक असफल नेता साबित हो रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राहुल गांधी खुद की पार्टी का नेतृत्व तो सही तरीक़े से कर नहीं पा रहे हैं, फ़िर तो उन्हें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेतृत्व सम्भालने में काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।
लोकसभा चुनाव में क़रारी हार के बाद राहुल गांधी कांग्रेस में हो रहे विद्रोह को सम्भालने में असफल साबित हो रहे हैं। हार के बाद राज्यों से व्रिदोह के स्वर फूटने लगे हैं। सबसे पहले बात करें राजस्थान की तो यहां पर कांग्रेस पार्टी में घमासान मचा हुआ है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट एक दूसरे को हार के लिए ज़िम्मेदार बता रहे हैं। वहीं मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ की कार्यप्रणाली के ख़िलाफ़ पूर्व केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस वर्किंग कमेटी में ही सवाल खड़े कर दिये थे, जहां पर कि खुद राहुल गांधी मौजूद थे।
अन्य राज्यों की तुलना में पंजाब में कांग्रेस ने काफ़ी अच्छा प्रदर्शन लोकसभा चुनाव में किया है, लेकिन वहां पर मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और उनके मंत्री नवजोत सिंह सिद्धु के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई जारी है। कहा जाता है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह शहरी इलाकों में हार के लिए नवजोत सिंह सिद्धु को ज़िम्मेदार मानते हैं, तो वहीं सिद्धु का कहना है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह को इसकी ज़िम्मेदारी लेना चाहिए। दक्षिण के राज्य तेलंगाना में भी कांग्रेस में विद्रोह के बाद पार्टी छोड़ने का क्रम शुरू हो गया है। पार्टी के 12 विधायक कांग्रेस छोड़कर सत्तारूढ़ टीआरएस में शामिल हो गये हैं।
इधर महाराष्ट्र में भी कांग्रेस के कुछ विधायक नाराज़ बताए जाते हैं। यह विधायक पार्टी से बगावत कर सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, महाराष्ट्र से लगे गुजरात में भी कांग्रेस पार्टी के 7 से 10 विधायक भाजपा के सम्पर्क में हैं और ये कभी भी मौक़ा देखकर भाजपा में शामिल हो सकते हैं। वहीं गोवा में भी कांग्रेस के कुछ विधायक भाजपा में शामिल हो सकते हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि कर्नाटक में जेडीएस के साथ सरकार चला रही कांग्रेस हमेशा से ही असमंजस की स्थिति में है। कई बार ख़बरें सामने आई हैं कि कांग्रेस पार्टी के विधायक भाजपा के सम्पर्क में हैं और कभी भी पार्टी छोड़ सकते हैं।
लोकसभा चुनाव में हार के बाद जिस तरह से कांग्रेस पार्टी में विद्रोह हो रहा है, उससे साफ़ जाहिर है कि राहुल गांधी के नेतृत्व पर अब कांग्रेसी विधायकों को विश्वास नहीं बचा है। आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस इतनी बुरी तरह से नहीं हारी थी, जितनी बुरी तरह से 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में हारी है।
साफ़ तौर पर यह राहुल गांधी की नाकामी है कि वे अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं में विश्वास पैदा नहीं कर पा रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी के अच्छे दिन फ़िर से आएंगे। ज़रूरत है कि राहुल गांधी आत्ममंथन करें कि आख़िर उनसे कहां ग़लती हो गई है जो उनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी को इतनी बुरी तरह से हार का सामना क्यों करना पड़ा है। वे पार्टी के लोगों को समझाएं कि एक बार फ़िर से कांग्रेस सत्ता में वापसी कर सकती है।
यदि समय रहते राहुल गांधी ने खुद को और अपनी पार्टी को मज़बूत नहीं किया तो आने वाले समय में कांग्रेस पार्टी छोड़ने वाले नेताओं की संख्या बढ़ती जाएगी। अब देखना होगा कि देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल को एक नई दिशा और दशा देने में राहुल गांधी कब तक सफल हो पाते हैं। राहुल गांधी को चाहिए कि कांग्रेस पार्टी को फ़िर से मजबूत करने के लिए वे ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ताओं से जाकर मिलें और पार्टी में जो भी ऐतिहासिक परिवर्तन करने हैं वो जल्द से जल्द करें।
JUNE 07 (WTN) – लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ऐतिहासिक पराजय के बाद कुछ समय तक तो कांग्रेस में ख़ामोशी रही, लेकिन अब कांग्रेस में विद्रोह का दौर जारी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी सिर्फ़ 44 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी थी। 2014 में 10 साल की सत्ता विरोधी लहर के कारण कांग्रेस पार्टी की इतनी करारी हार हुई थी। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को उम्मीद थी कि मोदी सरकार को सत्ता विरोधी लहर का नुकसान उठाना पड़ेगा और एनडीए को बहुमत हासिल नहीं होगा।
लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व के सामने कांग्रेस पार्टी की सभी रणनीतियां असफल साबित हुईं और कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में फ़िर से बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा। लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेसियों को काफ़ी विश्वास था कि एनडीए की हार होगी और कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनेगी। लेकिन कांग्रेसियों के सभी सपने टूट गये।
दरअसल, कांग्रेसियों को अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी से काफ़ी उम्मीदें थी कि वे एक कुशल नेता हैं। लेकिन हक़ीकत यह है कि राहुल गांधी एक असफल नेता साबित हो रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राहुल गांधी खुद की पार्टी का नेतृत्व तो सही तरीक़े से कर नहीं पा रहे हैं, फ़िर तो उन्हें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेतृत्व सम्भालने में काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।
लोकसभा चुनाव में क़रारी हार के बाद राहुल गांधी कांग्रेस में हो रहे विद्रोह को सम्भालने में असफल साबित हो रहे हैं। हार के बाद राज्यों से व्रिदोह के स्वर फूटने लगे हैं। सबसे पहले बात करें राजस्थान की तो यहां पर कांग्रेस पार्टी में घमासान मचा हुआ है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट एक दूसरे को हार के लिए ज़िम्मेदार बता रहे हैं। वहीं मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ की कार्यप्रणाली के ख़िलाफ़ पूर्व केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस वर्किंग कमेटी में ही सवाल खड़े कर दिये थे, जहां पर कि खुद राहुल गांधी मौजूद थे।
अन्य राज्यों की तुलना में पंजाब में कांग्रेस ने काफ़ी अच्छा प्रदर्शन लोकसभा चुनाव में किया है, लेकिन वहां पर मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और उनके मंत्री नवजोत सिंह सिद्धु के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई जारी है। कहा जाता है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह शहरी इलाकों में हार के लिए नवजोत सिंह सिद्धु को ज़िम्मेदार मानते हैं, तो वहीं सिद्धु का कहना है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह को इसकी ज़िम्मेदारी लेना चाहिए। दक्षिण के राज्य तेलंगाना में भी कांग्रेस में विद्रोह के बाद पार्टी छोड़ने का क्रम शुरू हो गया है। पार्टी के 12 विधायक कांग्रेस छोड़कर सत्तारूढ़ टीआरएस में शामिल हो गये हैं।
इधर महाराष्ट्र में भी कांग्रेस के कुछ विधायक नाराज़ बताए जाते हैं। यह विधायक पार्टी से बगावत कर सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, महाराष्ट्र से लगे गुजरात में भी कांग्रेस पार्टी के 7 से 10 विधायक भाजपा के सम्पर्क में हैं और ये कभी भी मौक़ा देखकर भाजपा में शामिल हो सकते हैं। वहीं गोवा में भी कांग्रेस के कुछ विधायक भाजपा में शामिल हो सकते हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि कर्नाटक में जेडीएस के साथ सरकार चला रही कांग्रेस हमेशा से ही असमंजस की स्थिति में है। कई बार ख़बरें सामने आई हैं कि कांग्रेस पार्टी के विधायक भाजपा के सम्पर्क में हैं और कभी भी पार्टी छोड़ सकते हैं।
लोकसभा चुनाव में हार के बाद जिस तरह से कांग्रेस पार्टी में विद्रोह हो रहा है, उससे साफ़ जाहिर है कि राहुल गांधी के नेतृत्व पर अब कांग्रेसी विधायकों को विश्वास नहीं बचा है। आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस इतनी बुरी तरह से नहीं हारी थी, जितनी बुरी तरह से 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में हारी है।
साफ़ तौर पर यह राहुल गांधी की नाकामी है कि वे अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं में विश्वास पैदा नहीं कर पा रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी के अच्छे दिन फ़िर से आएंगे। ज़रूरत है कि राहुल गांधी आत्ममंथन करें कि आख़िर उनसे कहां ग़लती हो गई है जो उनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी को इतनी बुरी तरह से हार का सामना क्यों करना पड़ा है। वे पार्टी के लोगों को समझाएं कि एक बार फ़िर से कांग्रेस सत्ता में वापसी कर सकती है।
यदि समय रहते राहुल गांधी ने खुद को और अपनी पार्टी को मज़बूत नहीं किया तो आने वाले समय में कांग्रेस पार्टी छोड़ने वाले नेताओं की संख्या बढ़ती जाएगी। अब देखना होगा कि देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल को एक नई दिशा और दशा देने में राहुल गांधी कब तक सफल हो पाते हैं। राहुल गांधी को चाहिए कि कांग्रेस पार्टी को फ़िर से मजबूत करने के लिए वे ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ताओं से जाकर मिलें और पार्टी में जो भी ऐतिहासिक परिवर्तन करने हैं वो जल्द से जल्द करें।