प्रधानमंत्री मोदी के सामने एस-400 का सौदा एक बड़ी ‘चुनौती’!
Saturday - June 15, 2019 3:59 pm ,
Category : WTN HINDI
भारत-रूस के बीच एस-400 ख़रीदी पर अमेरिका को ‘आपत्ति’
रूस से एस-400 के सौदे पर अमेरिकी की भारत को ‘चेतावनी’
JUNE 15 (WTN) – जब से नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं, तभी से वे भारतीय रक्षा तंत्र को मज़बूत करने की दिशा में लगातार ‘काम’ किये जा रहे हैं। राफेल फाइटर जेट से लेकर अपाचे लड़ाकू हेलिकॉप्टर के सौदे इसी का ‘उदाहरण’ हैं। भारतीय सीमाओं को ‘सुरक्षित’ करने की कोशिशों के बीच भारत, रूस से लम्बी दूरी की एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली ख़रीद रहा है। लेकिन भारत और रूस के बीच होने जा रहे इस रक्षा सौदे से अमेरिका को बड़ी ‘आपत्ति’ है।
दरअसल, अमेरिका का कहना है कि वो भारत की रक्षा ज़रूरतों को आधुनिक प्रौद्योगियों और साजो सामान के साथ पूरा करने में ‘मदद’ के लिए ‘तैयार’ है। लेकिन यदि भारत ने रूस से एस-400 मिसाइल रक्षा सिस्टम ख़रीदा तो अमेरिका द्वारा भारत को किये जा रहे सहयोग पर ‘असर’ पड़ सकता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एस-400 रूस का ‘सबसे आधुनिक’ सतह से हवा तक लम्बी दूरी वाला मिसाइल रक्षा सिस्टम है। साल 2014 में चीन ने इसे रूस से ख़रीदा था। चीन की ‘बढ़ती ताक़त’ को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने इस मिसाइल रक्षा सिस्टम को ख़रीदने में ‘रूचि’ दिखाई थी। प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से पिछले साल अक्टूबर में इस सिस्टम को ख़रीदने पर पांच अरब डॉलर में क़रार किया था।
भारत और रूस के बीच कूटनीतिक, रक्षा, आर्थिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध सालों से हैं। शीत युद्ध के समय भारत और रूस की ‘नज़दीकी’ के कारण कई बार अमेरिका ने भारत के ख़िलाफ़ ‘षड़यंत्र’ भी किये थे। लेकिन अब जबकि भारत, रूस से एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली ख़रीद रहा है, ऐसे में अमेरिका इस पर ज़ोरदार तरीक़े से ‘आपत्ति’ दर्ज करा रहा है और भारत को प्रतिबंध की ‘धमकी’ दे रहा है।
‘मज़बूत’ होते भारत से हथियारों के सौदे की ‘लालसा’ लिये अमेरिका का कहना है कि अब किसी अन्य देश की तुलना में अमेरिका, भारत के साथ सबसे ज़्यादा सैन्य अभ्यास करता है। ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि भारत की रक्षा ‘ज़रूरतों’ को पूरा करने के लिए अमेरिका तैयार है। ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि अमेरिकी कांग्रेस ने भारत को जो ‘अहम’ रक्षा साझेदार का दर्जा दिया है, उस पर अलग तरीक़े की रक्षा साझेदारी ट्रम्प प्रशासन चाह रहा है।
रूस से एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली ख़रीदी का सौदा होने के बाद अमेरिका बार-बार भारत को ‘याद’ दिला रहा है कि भारत और अमेरिका के बीच पिछले दस सालों में सैन्य सम्बन्ध नये आयाम पर पहुंचे हैं, तो ऐसे में भारत को रूस के साथ रक्षा सौदे नहीं करना चाहिए। अमेरिका जानता है कि भारत सालों से रूस से हथियार ख़रीदता आ रहा है, ऐसे में अब भारत को अमेरिका को ‘तरजीह’ देना चाहिए। भारत और रूस के बीच हुए एस-400 के सौदे के बाद अमेरिका का कहना है, “यह हमारी अपनी आपसी क्षमता को बढ़ाने की भारत की क्षमता को घटा देगा।”
वैसे ‘अप्रत्यक्ष’ रूप से ट्रम्प प्रशासन ने भारत को ‘धमकी’ दी है कि भारत को एक समय यह फ़ैसला लेना पड़ेगा कि वो रूस के साथ हथियार ‘तंत्र’ चुने या फ़िर अमेरिका के साथ रक्षा समझौतों का ‘मंच’ चुने। लेकिन ‘अप्रत्यक्ष धमकी’ के बाद ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि दस साल पहले हम भारत को उतने सैन्य साजो सामन की पेशकश नहीं करते थे, जितना हम (अमेरिका) आज देने के लिए तैयार हैं। अमेरिका के मुताबिक़, दस सालों में भारत-अमेरिका रक्षा व्यापार शून्य से 18 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। अमेरिका का कहना है कि वो भारत के साथ ‘बातचीत’ कर रहा है और उसकी कोशिश है कि भारत के साथ रक्षा सम्बन्ध किस तरह से आगे बढ़ते हैं।
अब यह भारत पर ‘निर्भर’ करता है कि वो इसे अमेरिका की ‘नसीहत’ समझे या फ़िर ‘धमकी’, क्योंकि रूस से एस-400 सौदे को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति भारत को प्रतिबंधों की धमकी भी दे चुके हैं। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों के मुताबिक़, भारत और रूस के बीच हुए एस-400 के सौदे को अमेरिका किसी भी तरह से ‘नज़रअंदाज़’ नहीं कर सकता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि रूस के इस सिस्टम के भारत में आने से भारतीय रक्षा प्रणाली काफ़ी ‘मज़बूत’ होगी। जब ऐसा होगा तो भारत को आने वाले समय में उन सैन्य साजो सामान की ज़रूरत नहीं पड़ेगी जो वो अमेरिका के ख़रीद रहा है। ऐसे में अमेरिकी कांग्रेस ने रूस से हथियारों की ख़रीद को रोकने के लिए CAATSA (Countering America's Adversaries Through Sanctions Act) नामक जो एक्ट बनाया है, इसी एक्ट के तहत अमेरिका भारत पर ‘प्रतिबंध’ लगा सकता है।
अब देखना होगा कि कितनी इच्छाशक्ति के साथ प्रधानमंत्री मोदी रूस के साथ एस-400 समझौते को अन्तिम रूप दे पाते हैं। भारत के पड़ोसी देश चीन के पास इस सिस्टम के होने से भारत को हमेशा ख़तरा बना रहेगा। ऐसे में भारत को भी इस सिस्टम की बहुत ज़रूरत है, यह ध्यान में रखते हुए कि चीन एक विस्तारवादी देश है। लेकिन रूस से एस-400 के सौदे के बाद देखना होगा कि अमेरिका के साथ भारत के रक्षा सम्बन्धों पर कैसा असर पड़ता है, और यदि अमेरिका प्रतिबंध लगाता है तो इससे भारत पर पड़ने वाले असर से प्रधानमंत्री मोदी भारत को कैसे सुरक्षित रखते हैं।
JUNE 15 (WTN) – जब से नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं, तभी से वे भारतीय रक्षा तंत्र को मज़बूत करने की दिशा में लगातार ‘काम’ किये जा रहे हैं। राफेल फाइटर जेट से लेकर अपाचे लड़ाकू हेलिकॉप्टर के सौदे इसी का ‘उदाहरण’ हैं। भारतीय सीमाओं को ‘सुरक्षित’ करने की कोशिशों के बीच भारत, रूस से लम्बी दूरी की एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली ख़रीद रहा है। लेकिन भारत और रूस के बीच होने जा रहे इस रक्षा सौदे से अमेरिका को बड़ी ‘आपत्ति’ है।
दरअसल, अमेरिका का कहना है कि वो भारत की रक्षा ज़रूरतों को आधुनिक प्रौद्योगियों और साजो सामान के साथ पूरा करने में ‘मदद’ के लिए ‘तैयार’ है। लेकिन यदि भारत ने रूस से एस-400 मिसाइल रक्षा सिस्टम ख़रीदा तो अमेरिका द्वारा भारत को किये जा रहे सहयोग पर ‘असर’ पड़ सकता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एस-400 रूस का ‘सबसे आधुनिक’ सतह से हवा तक लम्बी दूरी वाला मिसाइल रक्षा सिस्टम है। साल 2014 में चीन ने इसे रूस से ख़रीदा था। चीन की ‘बढ़ती ताक़त’ को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने इस मिसाइल रक्षा सिस्टम को ख़रीदने में ‘रूचि’ दिखाई थी। प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से पिछले साल अक्टूबर में इस सिस्टम को ख़रीदने पर पांच अरब डॉलर में क़रार किया था।
भारत और रूस के बीच कूटनीतिक, रक्षा, आर्थिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध सालों से हैं। शीत युद्ध के समय भारत और रूस की ‘नज़दीकी’ के कारण कई बार अमेरिका ने भारत के ख़िलाफ़ ‘षड़यंत्र’ भी किये थे। लेकिन अब जबकि भारत, रूस से एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली ख़रीद रहा है, ऐसे में अमेरिका इस पर ज़ोरदार तरीक़े से ‘आपत्ति’ दर्ज करा रहा है और भारत को प्रतिबंध की ‘धमकी’ दे रहा है।
‘मज़बूत’ होते भारत से हथियारों के सौदे की ‘लालसा’ लिये अमेरिका का कहना है कि अब किसी अन्य देश की तुलना में अमेरिका, भारत के साथ सबसे ज़्यादा सैन्य अभ्यास करता है। ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि भारत की रक्षा ‘ज़रूरतों’ को पूरा करने के लिए अमेरिका तैयार है। ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि अमेरिकी कांग्रेस ने भारत को जो ‘अहम’ रक्षा साझेदार का दर्जा दिया है, उस पर अलग तरीक़े की रक्षा साझेदारी ट्रम्प प्रशासन चाह रहा है।
रूस से एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली ख़रीदी का सौदा होने के बाद अमेरिका बार-बार भारत को ‘याद’ दिला रहा है कि भारत और अमेरिका के बीच पिछले दस सालों में सैन्य सम्बन्ध नये आयाम पर पहुंचे हैं, तो ऐसे में भारत को रूस के साथ रक्षा सौदे नहीं करना चाहिए। अमेरिका जानता है कि भारत सालों से रूस से हथियार ख़रीदता आ रहा है, ऐसे में अब भारत को अमेरिका को ‘तरजीह’ देना चाहिए। भारत और रूस के बीच हुए एस-400 के सौदे के बाद अमेरिका का कहना है, “यह हमारी अपनी आपसी क्षमता को बढ़ाने की भारत की क्षमता को घटा देगा।”
वैसे ‘अप्रत्यक्ष’ रूप से ट्रम्प प्रशासन ने भारत को ‘धमकी’ दी है कि भारत को एक समय यह फ़ैसला लेना पड़ेगा कि वो रूस के साथ हथियार ‘तंत्र’ चुने या फ़िर अमेरिका के साथ रक्षा समझौतों का ‘मंच’ चुने। लेकिन ‘अप्रत्यक्ष धमकी’ के बाद ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि दस साल पहले हम भारत को उतने सैन्य साजो सामन की पेशकश नहीं करते थे, जितना हम (अमेरिका) आज देने के लिए तैयार हैं। अमेरिका के मुताबिक़, दस सालों में भारत-अमेरिका रक्षा व्यापार शून्य से 18 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। अमेरिका का कहना है कि वो भारत के साथ ‘बातचीत’ कर रहा है और उसकी कोशिश है कि भारत के साथ रक्षा सम्बन्ध किस तरह से आगे बढ़ते हैं।
अब यह भारत पर ‘निर्भर’ करता है कि वो इसे अमेरिका की ‘नसीहत’ समझे या फ़िर ‘धमकी’, क्योंकि रूस से एस-400 सौदे को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति भारत को प्रतिबंधों की धमकी भी दे चुके हैं। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों के मुताबिक़, भारत और रूस के बीच हुए एस-400 के सौदे को अमेरिका किसी भी तरह से ‘नज़रअंदाज़’ नहीं कर सकता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि रूस के इस सिस्टम के भारत में आने से भारतीय रक्षा प्रणाली काफ़ी ‘मज़बूत’ होगी। जब ऐसा होगा तो भारत को आने वाले समय में उन सैन्य साजो सामान की ज़रूरत नहीं पड़ेगी जो वो अमेरिका के ख़रीद रहा है। ऐसे में अमेरिकी कांग्रेस ने रूस से हथियारों की ख़रीद को रोकने के लिए CAATSA (Countering America's Adversaries Through Sanctions Act) नामक जो एक्ट बनाया है, इसी एक्ट के तहत अमेरिका भारत पर ‘प्रतिबंध’ लगा सकता है।
अब देखना होगा कि कितनी इच्छाशक्ति के साथ प्रधानमंत्री मोदी रूस के साथ एस-400 समझौते को अन्तिम रूप दे पाते हैं। भारत के पड़ोसी देश चीन के पास इस सिस्टम के होने से भारत को हमेशा ख़तरा बना रहेगा। ऐसे में भारत को भी इस सिस्टम की बहुत ज़रूरत है, यह ध्यान में रखते हुए कि चीन एक विस्तारवादी देश है। लेकिन रूस से एस-400 के सौदे के बाद देखना होगा कि अमेरिका के साथ भारत के रक्षा सम्बन्धों पर कैसा असर पड़ता है, और यदि अमेरिका प्रतिबंध लगाता है तो इससे भारत पर पड़ने वाले असर से प्रधानमंत्री मोदी भारत को कैसे सुरक्षित रखते हैं।