क्या मोदी सरकार आरबीआई की स्वायत्ता को कर रही है कमज़ोर?
Tuesday - June 25, 2019 1:01 pm ,
Category : WTN HINDI
आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के इस्तीफ़े के बाद उठा ‘विवाद’
आख़िर क्यों जारी है आरबीआई में शीर्ष अधिकारियों के बीच ‘नीतिगत मतभेद’?
JUNE 25 (WTN) – क्या भारतीय रिज़र्व बैंक में सभी कुछ सही नहीं चल रहा है? हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि भारतीय रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के इस्तीफ़े ने इन 'आशंकाओं' को बढ़ाया है कि आरबीआई में इन दिनों सब कुछ सही नहीं चल रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि विरल आचार्य ने अपना कार्यकाल पूरा होने से क़रीब 6 महीने पहले ही 'निजी' कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है। दरअसल, 7 महीने के अन्दर दूसरी बार रिज़र्व बैंक के किसी शीर्ष अधिकारी ने अपना इस्तीफ़ा दिया है। इससे पहले दिसम्बर 2018 में आरबीआई के तत्कालीन गवर्नर उर्जित पटेल ने भी अपने पद से इस्तीफ़ा दिया था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि विरल आचार्य, उर्जित पटेल की 'टीम' का हिस्सा माने जाते थे।
उर्जित पटेल के बाद विरल आचार्य का इस्तीफ़ा साफ़ दिखाता है कि रिज़र्व बैंक के शीर्ष अधिकारियों के बीच इन दिनों सब कुछ 'सही' नहीं चल रहा है। कहा जा रहा है कि मोदी सरकार की नीतियों और आरबीआई गवर्नर के साथ आरबीआई के कुछ अधिकारियों के बीच कुछ 'नीतिगत मतभेद' हैं। जानकारी के मुताबिक़, पिछले दो बार से मौद्रिक नीति की समीक्षा के दौरान आर्थिक विकास और महंगाई, इन दोनों ही मुद्दों पर विरल आचार्य की राय आरबीआई गवर्नर की राय से थोड़ी 'अलग' थी।
दरअसल, उर्जित पटेल के इस्तीफ़े के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने शक्तिकांत दास को आरबीआई का गवर्नर बनाया था। कहा जाता है कि दास, प्रधानमंत्री मोदी के 'काफ़ी क़रीबी' हैं और नोटबंदी के समय उन्होंने मोदी सरकार का 'साथ' दिया था। शक्तिकांत दास की नियुक्ति के समय उनकी 'योग्यता' पर कांग्रेस ने सवाल खड़े किये थे। कांग्रेस ने कहा था कि एक अर्थशास्त्री की जगह एक नौकरशाह को आरबीआई गवर्नर बनाकर मोदी सरकार संस्थान (आरबीआई) की स्वायत्ता को 'कमज़ोर' कर रही है। कांग्रेस का आरोप है कि दास को प्रधानमंत्री मोदी ने आरबीआई का गवर्नर इसलिए बनाया, क्योंकि दास ने नोटबंदी के समय मोदी सरकार का 'साथ' दिया था।
लेकिन तमाम 'विरोधों' के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने शक्तिकांत दास के नाम पर 'सहमति' जताई थी। विपक्ष का आरोप है कि शक्तिकांत दास आरबीआई गवर्नर के रूप में आरबीआई की स्वायत्ता में सरकार की 'दखलंदाजी' को 'नज़रअंदाज़' कर रहे हैं। विपक्ष का तो यह भी आरोप है कि शक्तिकांत दास, गवर्नर के रूप में मोदी सरकार के 'एजेंडे' को लागू कर रहे हैं।
डिप्टी गवर्नर आचार्य के इस्तीफ़े पर कहा जा रहा है कि हाल की मौद्रिक नीति की बैठक में भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास और डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के बीच वित्तीय घाटे पर 'सहमति' नहीं बन पा रही थी। मीडिया से मिली जानकारी के अनुसार, इस साल अप्रैल महीने के शुरू में नई ब्याज दरों की घोषणा से पहले आरबीआई की मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक में शक्तिकांत दास और विरल आचार्य के बीच 'मतभेद' सामने आए थे। जैसा कि कहा जा रहा है कि शक्तिकांत दास देश के आर्थिक विकास के लिए रेपो रेट में कटौती करने के पक्ष में थे। लेकिन विरल आचार्य ने इसे लेकर बैंकों को 'सावधान' किया था। बैठक के आख़िर में समिति के छह सदस्यों ने 4-2 के बहुमत से रेपो रेट में कटौती करने का फ़ैसला लिया था।
यानी कि साफ़ है कि आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य और गवर्नर शक्तिकांत दास के बीच 'सामंजस्य' सही से नहीं बैठ पा रहा था। इससे पहले जब उर्जित पटेल ने गवर्नर पद से इस्तीफ़ा दिया था तो भी यही कहा जा रहा था कि उनका सरकार के साथ 'सामंजस्य' ठीक से नहीं बैठ पा रहा था, और इसी कारण से पटेल ने निजी कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दिया था।
यह 'अंदेशा' पहले से लगाया जा रहा था कि सरकार और आरबीआई के बीच 'तनाव' लगातार बढ़ता जा रहा है। सरकार के कथित हस्तक्षेप की ख़बरों की बीच आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने सरकार के इस तरह के 'हस्तक्षेप' को लेकर 'चेतावनी' भी दी थी। विरल आचार्य ने पिछले साल कहा था कि जो सरकारें, केन्द्रीय बैंक की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करती हैं, उन्हें जल्द ही या फ़िर देर से ही सही वित्तीय बाज़ार में दुष्परिणाम का शिकार होना पड़ता है। विरल के इस बयान के बाद आरबीआई और सरकार के बीच स्वायत्ता का झगड़ा सबके सामने आ गया था।
पहले उर्जित पटेल और अब विरल आचार्य के इस्तीफ़े के बाद मोदी सरकार विपक्ष के 'निशाने' पर है। विपक्ष का आरोप है कि भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार संस्थानों की स्वायत्तता को 'कमज़ोर' कर रही है। पटेल और आचार्य के अलावा कई अन्य अर्थशास्त्री भी अलग-अलग कारणों से अपने पद से इस्तीफ़ा दे चुके हैं। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) अरविन्द सुब्रमण्यन ने पारिवारिक कारणों का हवाला देते हए पिछले साल जून में अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था, जिसके बाद भी मोदी सरकार को विपक्ष ने 'कठघरे' में खड़ा किया था।
यानी कि साफ़ है कि मोदी सरकार और आरबीआई के बीच स्वायत्ता की कथित लड़ाई अब इस्तीफ़ों पर आ गई है। विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार संस्थानों की स्वायत्ता को कमज़ोर कर रही है, तो वहीं मोदी सरकार का कहना है कि उसकी ऐसी कोई भी 'मंशा' नहीं है। उर्जित पटेल और विरल आचार्य के इस्तीफ़ों के बाद मोदी सरकार पर सवाल उठ रहे हैं कि आख़िर क्या कारण है कि आरबीआई के बड़े अधिकारी सरकार की कथित दखलंदाज़ी से नाराज़ होकर इस्तीफ़ा दे रहे हैं। अब देखना होगा कि मोदी सरकार इन आरोपों के बीच अपनी 'सफाई' में क्या कुछ कहती है।
JUNE 25 (WTN) – क्या भारतीय रिज़र्व बैंक में सभी कुछ सही नहीं चल रहा है? हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि भारतीय रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के इस्तीफ़े ने इन 'आशंकाओं' को बढ़ाया है कि आरबीआई में इन दिनों सब कुछ सही नहीं चल रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि विरल आचार्य ने अपना कार्यकाल पूरा होने से क़रीब 6 महीने पहले ही 'निजी' कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है। दरअसल, 7 महीने के अन्दर दूसरी बार रिज़र्व बैंक के किसी शीर्ष अधिकारी ने अपना इस्तीफ़ा दिया है। इससे पहले दिसम्बर 2018 में आरबीआई के तत्कालीन गवर्नर उर्जित पटेल ने भी अपने पद से इस्तीफ़ा दिया था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि विरल आचार्य, उर्जित पटेल की 'टीम' का हिस्सा माने जाते थे।
उर्जित पटेल के बाद विरल आचार्य का इस्तीफ़ा साफ़ दिखाता है कि रिज़र्व बैंक के शीर्ष अधिकारियों के बीच इन दिनों सब कुछ 'सही' नहीं चल रहा है। कहा जा रहा है कि मोदी सरकार की नीतियों और आरबीआई गवर्नर के साथ आरबीआई के कुछ अधिकारियों के बीच कुछ 'नीतिगत मतभेद' हैं। जानकारी के मुताबिक़, पिछले दो बार से मौद्रिक नीति की समीक्षा के दौरान आर्थिक विकास और महंगाई, इन दोनों ही मुद्दों पर विरल आचार्य की राय आरबीआई गवर्नर की राय से थोड़ी 'अलग' थी।
दरअसल, उर्जित पटेल के इस्तीफ़े के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने शक्तिकांत दास को आरबीआई का गवर्नर बनाया था। कहा जाता है कि दास, प्रधानमंत्री मोदी के 'काफ़ी क़रीबी' हैं और नोटबंदी के समय उन्होंने मोदी सरकार का 'साथ' दिया था। शक्तिकांत दास की नियुक्ति के समय उनकी 'योग्यता' पर कांग्रेस ने सवाल खड़े किये थे। कांग्रेस ने कहा था कि एक अर्थशास्त्री की जगह एक नौकरशाह को आरबीआई गवर्नर बनाकर मोदी सरकार संस्थान (आरबीआई) की स्वायत्ता को 'कमज़ोर' कर रही है। कांग्रेस का आरोप है कि दास को प्रधानमंत्री मोदी ने आरबीआई का गवर्नर इसलिए बनाया, क्योंकि दास ने नोटबंदी के समय मोदी सरकार का 'साथ' दिया था।
लेकिन तमाम 'विरोधों' के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने शक्तिकांत दास के नाम पर 'सहमति' जताई थी। विपक्ष का आरोप है कि शक्तिकांत दास आरबीआई गवर्नर के रूप में आरबीआई की स्वायत्ता में सरकार की 'दखलंदाजी' को 'नज़रअंदाज़' कर रहे हैं। विपक्ष का तो यह भी आरोप है कि शक्तिकांत दास, गवर्नर के रूप में मोदी सरकार के 'एजेंडे' को लागू कर रहे हैं।
डिप्टी गवर्नर आचार्य के इस्तीफ़े पर कहा जा रहा है कि हाल की मौद्रिक नीति की बैठक में भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास और डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के बीच वित्तीय घाटे पर 'सहमति' नहीं बन पा रही थी। मीडिया से मिली जानकारी के अनुसार, इस साल अप्रैल महीने के शुरू में नई ब्याज दरों की घोषणा से पहले आरबीआई की मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक में शक्तिकांत दास और विरल आचार्य के बीच 'मतभेद' सामने आए थे। जैसा कि कहा जा रहा है कि शक्तिकांत दास देश के आर्थिक विकास के लिए रेपो रेट में कटौती करने के पक्ष में थे। लेकिन विरल आचार्य ने इसे लेकर बैंकों को 'सावधान' किया था। बैठक के आख़िर में समिति के छह सदस्यों ने 4-2 के बहुमत से रेपो रेट में कटौती करने का फ़ैसला लिया था।
यानी कि साफ़ है कि आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य और गवर्नर शक्तिकांत दास के बीच 'सामंजस्य' सही से नहीं बैठ पा रहा था। इससे पहले जब उर्जित पटेल ने गवर्नर पद से इस्तीफ़ा दिया था तो भी यही कहा जा रहा था कि उनका सरकार के साथ 'सामंजस्य' ठीक से नहीं बैठ पा रहा था, और इसी कारण से पटेल ने निजी कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दिया था।
यह 'अंदेशा' पहले से लगाया जा रहा था कि सरकार और आरबीआई के बीच 'तनाव' लगातार बढ़ता जा रहा है। सरकार के कथित हस्तक्षेप की ख़बरों की बीच आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने सरकार के इस तरह के 'हस्तक्षेप' को लेकर 'चेतावनी' भी दी थी। विरल आचार्य ने पिछले साल कहा था कि जो सरकारें, केन्द्रीय बैंक की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करती हैं, उन्हें जल्द ही या फ़िर देर से ही सही वित्तीय बाज़ार में दुष्परिणाम का शिकार होना पड़ता है। विरल के इस बयान के बाद आरबीआई और सरकार के बीच स्वायत्ता का झगड़ा सबके सामने आ गया था।
पहले उर्जित पटेल और अब विरल आचार्य के इस्तीफ़े के बाद मोदी सरकार विपक्ष के 'निशाने' पर है। विपक्ष का आरोप है कि भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार संस्थानों की स्वायत्तता को 'कमज़ोर' कर रही है। पटेल और आचार्य के अलावा कई अन्य अर्थशास्त्री भी अलग-अलग कारणों से अपने पद से इस्तीफ़ा दे चुके हैं। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) अरविन्द सुब्रमण्यन ने पारिवारिक कारणों का हवाला देते हए पिछले साल जून में अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था, जिसके बाद भी मोदी सरकार को विपक्ष ने 'कठघरे' में खड़ा किया था।
यानी कि साफ़ है कि मोदी सरकार और आरबीआई के बीच स्वायत्ता की कथित लड़ाई अब इस्तीफ़ों पर आ गई है। विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार संस्थानों की स्वायत्ता को कमज़ोर कर रही है, तो वहीं मोदी सरकार का कहना है कि उसकी ऐसी कोई भी 'मंशा' नहीं है। उर्जित पटेल और विरल आचार्य के इस्तीफ़ों के बाद मोदी सरकार पर सवाल उठ रहे हैं कि आख़िर क्या कारण है कि आरबीआई के बड़े अधिकारी सरकार की कथित दखलंदाज़ी से नाराज़ होकर इस्तीफ़ा दे रहे हैं। अब देखना होगा कि मोदी सरकार इन आरोपों के बीच अपनी 'सफाई' में क्या कुछ कहती है।