कांग्रेस के नये अध्यक्ष के सामने चुनौतियां ही चुनौतियां!
Wednesday - July 3, 2019 4:03 pm ,
Category : WTN HINDI
कांग्रेस में जारी है ‘मंथन’ का दौर
पार्टी को ‘एकजुट’ रखना नये कांग्रेस अध्यक्ष के लिए होगी सबसे बड़ी परीक्षा
JULY 03 (WTN) – एक तरफ़ राहुल गांधी हैं कि वे इस जिद पर अड़े हुए हैं कि वे अब कांग्रेस अध्यक्ष पद पर नहीं बने रहेंगे, तो वहीं दूसरी तरफ़ कांग्रेसी हैं कि जो उन्हें मना रहे हैं कि वो कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बने रहें। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह से हार के बाद कांग्रेस पार्टी में कुछ भी सामान्य नहीं चल रहा है। हार के बाद नाराज़ और निराश राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़े की पेशकश कर चुके हैं। राहुल गांधी पार्टी की हार के लिए कांग्रेस के नेताओं को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर ज़िम्मेदार ठहरा चुके हैं, जिसके बाद कांग्रेस में कोई भी नेता कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं है।
इस सबके बीच राहुल गांधी ने एक बार फ़िर से साफ़ कर दिया है कि वे अब कांग्रेस अध्यक्ष नहीं हैं, और पार्टी को नये अध्यक्ष का जल्द से जल्द चुनाव कर लेना चाहिए। राहुल गांधी ने यह भी साफ़ किया कि पार्टी का नया अध्यक्ष चुनने में उनकी कोई भी भूमिका नहीं है और ना ही होगी। राहुल गांधी ने कांग्रेस कार्यसमिति को उसकी ज़िम्मेदारी याद दिलाते हुए कहा कि कौन पार्टी का नया अध्यक्ष बनेगा यह फ़ैसला कांग्रेस कार्यसमिति को जल्द से जल्द करना चाहिए।
राहुल गांधी साफ़ कर चुके हैं कि वे अब कांग्रेस अध्यक्ष नहीं हैं, और कांग्रेस का जो भी नया अध्यक्ष बनेगा वो गांधी परिवार से बाहर का होगा। अब लगता है कि राहुल गांधी मानने वाले नहीं हैं, ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि जल्द ही कांग्रेस कार्यमसिति की बैठक बुलाई जा सकती है, जिसके बाद पार्टी के नये अध्यक्ष के नाम पर फ़ैसला हो सकता है।
लेकिन बड़ा सवाल है कि यदि राहुल गांधी नहीं तो फ़िर कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष कौन हो सकता है। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस पार्टी में योग्य नेताओं की कमी है। एक से बढ़कर एक अनुभवी और योग्य नेता कांग्रेस में हैं, लेकिन यह सभी जानते हैं कि कांग्रेस में सर्वोपरि गांधी परिवार ही है। ऐसे में किसी अन्य नेता का कांग्रेस का अध्यक्ष बनना पार्टी को कितना मज़बूत कर पाएगा यह एक बड़ा सवाल है।
कहा जा रहा है कि राहुल गांधी की जगह पर किसी दलित या आदिवासी नेता को कांग्रेस अपना अध्यक्ष बना सकती है। कहने को तो पार्टी का यह दांव अच्छा कहा जा सकता है, लेकिन ऐसा होने से क्या दलित या आदिवासी नेता कांग्रेस पार्टी में एकजुटता रख पाएगा यह देखने वाली बात होगी।
यह तो तय है कि कांग्रेस में अध्यक्ष वहीं बनेगा जो कि गांधी परिवार का क़रीबी होगा।
कहने को राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष नहीं रहेंगे, पर जो भी नया पार्टी अध्यक्ष बनेगा वो राहुल गांधी के दिशा निर्देश पर ही पार्टी में सभी फ़ैसले लेगा। पर परेशानी यह नहीं है कि कांग्रेस का नया अध्यक्ष कौन बनेगा, परेशानी यह है कि जो नया अध्यक्ष बनेगा वो कांग्रेस में खुद का वजूद रख पाएगा कि नहीं, और यदि उसने खुद का अस्तित्व रखने की कोशिश की तो कहीं कांग्रेस पार्टी का हाल 1991 से 1998 की समयावधि की तरह ना हो जाए।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि राहुल गांधी से पहले सोनिया गांधी 19 सालों तक कांग्रेस अध्यक्ष रहीं, इस दौरान पार्टी 10 साल सत्ता में भी रही। लेकिन सोनिया गांधी से पहले सीताराम केसरी और पीवी नरसिम्हा राव के समय कांग्रेस में कितनी फूट हुई थी यह किसी से छिपा नहीं है। 1991 से लेकर 1998 के दौरान गांधी परिवार का कोई भी सदस्य कांग्रेस अध्यक्ष नहीं था, और इसी दौरान कांग्रेस पार्टी में कई नेताओं ने अपनी अलग पार्टी बना ली थी। लेकिन बाद में सोनिया गांधी की दख़लंदाज़ी के बाद एक-एक कर अधिकांश नेताओं ने अपनी-अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर लिया था। यानी कि तय है कि कांग्रेस में यदि गांधी परिवार का कोई सदस्य अध्यक्ष नहीं बनता है तो पार्टी में एकता स्थापित होना मुश्किल ही नज़र आता है।
यह सभी जानते हैं कि कांग्रेस के नेताओं में एकता सिर्फ़ और सिर्फ़ गांधी परिवार के कारण ही है। सच कहा जाए तो गांधी परिवार ही कांग्रेस को एक रखे हुए है। राज्यों से लेकर केन्द्रीय स्तर तक कांग्रेस नेताओं में वर्चस्व की लड़ाई है, जिसके कारण कांग्रेस को कई राज्यों में विधानसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा है। राहुल गांधी नहीं तो कोई और कांग्रेस अध्यक्ष बनेगा यह तो तय है, लेकिन क्या नये अध्यक्ष का कांग्रेसी उतना ही सम्मान करेंगे और उसकी उतनी ही बात बनेंगे, जितना वो राहुल गांधी का सम्मान करते थे और उनकी बात मानते थे।
कांग्रेस का नया अध्यक्ष जो भी बने उसके सामने चुनौती होगी पार्टी को एकजुट रखने के साथ-साथ लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद हताश औऱ निराश हो चुके कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास जगाने की। लेकिन कहीं ऐसा ना हो कि कांग्रेस का नया अध्यक्ष गांधी परिवार का विश्वास जीतने में ही लगा रहे, और पार्टी के अन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं की तरफ़ ध्यान ही ना दे पाए। ख़ैर यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि कांग्रेस का नया अध्यक्ष जो भी बनेगा वो पार्टी को जीत की राह पर वापस ला पाता है कि नहीं, और पार्टी में एकजुटता रखने में सफल हो पाता है कि नहीं।
JULY 03 (WTN) – एक तरफ़ राहुल गांधी हैं कि वे इस जिद पर अड़े हुए हैं कि वे अब कांग्रेस अध्यक्ष पद पर नहीं बने रहेंगे, तो वहीं दूसरी तरफ़ कांग्रेसी हैं कि जो उन्हें मना रहे हैं कि वो कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बने रहें। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह से हार के बाद कांग्रेस पार्टी में कुछ भी सामान्य नहीं चल रहा है। हार के बाद नाराज़ और निराश राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़े की पेशकश कर चुके हैं। राहुल गांधी पार्टी की हार के लिए कांग्रेस के नेताओं को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर ज़िम्मेदार ठहरा चुके हैं, जिसके बाद कांग्रेस में कोई भी नेता कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं है।
इस सबके बीच राहुल गांधी ने एक बार फ़िर से साफ़ कर दिया है कि वे अब कांग्रेस अध्यक्ष नहीं हैं, और पार्टी को नये अध्यक्ष का जल्द से जल्द चुनाव कर लेना चाहिए। राहुल गांधी ने यह भी साफ़ किया कि पार्टी का नया अध्यक्ष चुनने में उनकी कोई भी भूमिका नहीं है और ना ही होगी। राहुल गांधी ने कांग्रेस कार्यसमिति को उसकी ज़िम्मेदारी याद दिलाते हुए कहा कि कौन पार्टी का नया अध्यक्ष बनेगा यह फ़ैसला कांग्रेस कार्यसमिति को जल्द से जल्द करना चाहिए।
राहुल गांधी साफ़ कर चुके हैं कि वे अब कांग्रेस अध्यक्ष नहीं हैं, और कांग्रेस का जो भी नया अध्यक्ष बनेगा वो गांधी परिवार से बाहर का होगा। अब लगता है कि राहुल गांधी मानने वाले नहीं हैं, ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि जल्द ही कांग्रेस कार्यमसिति की बैठक बुलाई जा सकती है, जिसके बाद पार्टी के नये अध्यक्ष के नाम पर फ़ैसला हो सकता है।
लेकिन बड़ा सवाल है कि यदि राहुल गांधी नहीं तो फ़िर कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष कौन हो सकता है। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस पार्टी में योग्य नेताओं की कमी है। एक से बढ़कर एक अनुभवी और योग्य नेता कांग्रेस में हैं, लेकिन यह सभी जानते हैं कि कांग्रेस में सर्वोपरि गांधी परिवार ही है। ऐसे में किसी अन्य नेता का कांग्रेस का अध्यक्ष बनना पार्टी को कितना मज़बूत कर पाएगा यह एक बड़ा सवाल है।
कहा जा रहा है कि राहुल गांधी की जगह पर किसी दलित या आदिवासी नेता को कांग्रेस अपना अध्यक्ष बना सकती है। कहने को तो पार्टी का यह दांव अच्छा कहा जा सकता है, लेकिन ऐसा होने से क्या दलित या आदिवासी नेता कांग्रेस पार्टी में एकजुटता रख पाएगा यह देखने वाली बात होगी।
यह तो तय है कि कांग्रेस में अध्यक्ष वहीं बनेगा जो कि गांधी परिवार का क़रीबी होगा।
कहने को राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष नहीं रहेंगे, पर जो भी नया पार्टी अध्यक्ष बनेगा वो राहुल गांधी के दिशा निर्देश पर ही पार्टी में सभी फ़ैसले लेगा। पर परेशानी यह नहीं है कि कांग्रेस का नया अध्यक्ष कौन बनेगा, परेशानी यह है कि जो नया अध्यक्ष बनेगा वो कांग्रेस में खुद का वजूद रख पाएगा कि नहीं, और यदि उसने खुद का अस्तित्व रखने की कोशिश की तो कहीं कांग्रेस पार्टी का हाल 1991 से 1998 की समयावधि की तरह ना हो जाए।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि राहुल गांधी से पहले सोनिया गांधी 19 सालों तक कांग्रेस अध्यक्ष रहीं, इस दौरान पार्टी 10 साल सत्ता में भी रही। लेकिन सोनिया गांधी से पहले सीताराम केसरी और पीवी नरसिम्हा राव के समय कांग्रेस में कितनी फूट हुई थी यह किसी से छिपा नहीं है। 1991 से लेकर 1998 के दौरान गांधी परिवार का कोई भी सदस्य कांग्रेस अध्यक्ष नहीं था, और इसी दौरान कांग्रेस पार्टी में कई नेताओं ने अपनी अलग पार्टी बना ली थी। लेकिन बाद में सोनिया गांधी की दख़लंदाज़ी के बाद एक-एक कर अधिकांश नेताओं ने अपनी-अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर लिया था। यानी कि तय है कि कांग्रेस में यदि गांधी परिवार का कोई सदस्य अध्यक्ष नहीं बनता है तो पार्टी में एकता स्थापित होना मुश्किल ही नज़र आता है।
यह सभी जानते हैं कि कांग्रेस के नेताओं में एकता सिर्फ़ और सिर्फ़ गांधी परिवार के कारण ही है। सच कहा जाए तो गांधी परिवार ही कांग्रेस को एक रखे हुए है। राज्यों से लेकर केन्द्रीय स्तर तक कांग्रेस नेताओं में वर्चस्व की लड़ाई है, जिसके कारण कांग्रेस को कई राज्यों में विधानसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा है। राहुल गांधी नहीं तो कोई और कांग्रेस अध्यक्ष बनेगा यह तो तय है, लेकिन क्या नये अध्यक्ष का कांग्रेसी उतना ही सम्मान करेंगे और उसकी उतनी ही बात बनेंगे, जितना वो राहुल गांधी का सम्मान करते थे और उनकी बात मानते थे।
कांग्रेस का नया अध्यक्ष जो भी बने उसके सामने चुनौती होगी पार्टी को एकजुट रखने के साथ-साथ लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद हताश औऱ निराश हो चुके कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास जगाने की। लेकिन कहीं ऐसा ना हो कि कांग्रेस का नया अध्यक्ष गांधी परिवार का विश्वास जीतने में ही लगा रहे, और पार्टी के अन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं की तरफ़ ध्यान ही ना दे पाए। ख़ैर यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि कांग्रेस का नया अध्यक्ष जो भी बनेगा वो पार्टी को जीत की राह पर वापस ला पाता है कि नहीं, और पार्टी में एकजुटता रखने में सफल हो पाता है कि नहीं।